Showing posts with label News-cast Pratyaksha. Show all posts
Showing posts with label News-cast Pratyaksha. Show all posts

Friday, 11 May 2018

मेरे साईनाथ - काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप मेरे साईबाबा !

श्रीसाईसच्चरित के अध्याय ३ में हेमाडपंतजी बहुत प्यार से हमें हमारे साईनाथ की सत्ता के बारे में बतातें हैं कि - जो खुद मेरे साईनाथ मे मुझे भी और साथ ही अपने सारे बच्चों को गवाही दी है - अपनी जुबान से !

काल के भी जबड़े में से।
निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा।
करते ही केवल मत्कथाश्रवण
(मेरी कथा का श्रवण)।
रोगनिरसन भी हो जायेगा॥
इस गवाही में यह मालूम हो जाता है कि मेरे साईबाबा की सिर्फ चराचर यानि सजीव , निर्जीव सूष्टी पर ही नहीं बल्कि काल पर भी सत्ता है। हम जानतें हैं कि काल की सत्ता तो हम सभी जीवों पर होती है, फिर भी काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप साईनाथ हमें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि काल के जबड़े में फँसे हुए अपने भक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा अर्थात उसकी रक्षा करूँगा। मृत्यु के जबड़े में फँसे हुए श्रद्धावान को छुड़ाने का सामर्थ्य केवल एकमात्र सद्गुरुतत्त्व के पास ही होता है, अन्य किसी के भी पास नहीं होता।
                                                                         
     

इसी बात का प्रमाण हेमाडपंतजी हमें अध्याय २३ में शामा के जीवन की एक कथा से देतें हैं । माधवराव देशपांडे उर्फ बाबा के लाडले शामा को सांप कांटता है और पूरे बदन में जहर फैलने लगता है । शामा को शिरडी वासी लोग उस वक्त की मान्यता अनुसार बिरोबा (यानि महादेव ) के मंदिर में ले जाना चाहतें हैं ताकि उनका जहर उतर जाए , पर शामा जाने से मना करता है। बाद में शामा के चाचा निमोणकर जी उन्हें बाबा की उदी देतें हैं , उसे भी शामा अस्विकार करतें हैं और सिर्फ अपने साई के चरणों में अनन्य भाव से शरणागती पाने जातें हैं द्वारकामाई में ।   वहां पर पहले तो साईनाथ बहुत क्रोधित होकर शामा को मशीदमाई की पगडंडी भी चढने से मना कर देतें हैं - साईनाथ स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देतें हैं कि हे ब्राम्हिन ! चल निकल जा यहां से , नीचे उतर जा । शामा जी ब्राम्हिन थे तो बाबा उन्हें उसीसे पुकारतें हैं । शामा फिर भी वहां से नहीं हट जाता, जो होना है वो मेरा हो जाएगा , किंतु मैं मेरे बाबा के चरणों को छोडकर कहीं ओर नहीं जाऊंगा , यह होता है निजभक्त - साईनाथ का निजभक्त !

अर्थात बाद में साईबाबा का गुस्सा , उनकी आज्ञा जहर को थी , और शामा  को थी ही नहीं इस बात का पता चलता है । हेमाडपंतजी हमें इस कथा का विशेष महत्त्व बतातें हैं कि मेरे साईनाथ ने ना तो कोई मंत्र का उच्च्चारण किया नाही अन्य मांत्रिक -तांत्रिक लोगों की तरह कोई चावल उतारा कें फेंकें नहीं थे , बस्स एक मात्र मेरे साईनाथ की आज्ञा - चल निकल जा नीचे उतर- यह वाक्य ही जहर उतारने के लिए पर्याप्त था । मेरे साईनाथ तो काल के भी काल है ।  काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप मेरे साईनाथ है - तो भला क्या काल उनके शब्दों को कभी धुतकार सकता हैं - कभी नहीं , ये कदापि मुमकीन नहीं । मेरे साईनाथ ही सत्यसंकल्प प्रभु है - उनका हर शब्द केवल सत्य ही सत्य होता है !

हेमाडपंत जी हमें  दूसरी कथा भी ऐसी बतातें हैं जो मेरे साईनाथ की काल पर सत्ता सिध्द करने के लिए पर्याप्त है ।  शामा की कथा में तो हम देखतें हैं कि साईबाबा ने एक मान्व के प्राणों की रक्षा काल के मुंह से की थी , किंतु ४७ अध्याय में हम सांप और मेंढक की कथा पढतें हैं जिस कथा में सांप के मुंह में एक मेंढक इस बुरी तरह से फंसा रहता हैं कि मानों अभी वह सांप उसको निगल जाएगा और वह मेंढक की मौत हो जाएगी । किंतु साईनाथ की आज्ञा सुनने मात्र से ही सांप वहांसे मेंढक को छोडकर भाग खडा हुआ था । यह कथा भी हमें बताती हैं कि मेरे साईनाथ की आज्ञा काल को भी सुननी ही पडती है , चाहे वो इंसान की मौत हो या चाहे किसी अन्य जीव मात्र की मौत हो , सब पर सत्त्ता चलाने वाले काल को मेरे साईनाथ के सामने सिर झुकाना ही पडता है ।

किंतु साईबाबा के शब्दों को हमें गौर से सुनना भी चाहिए - बाबा कहतें हैं कि काल के भी जबड़े में से। निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा। हमें तो सिर्फ भक्त पता होता है - जो साईबाबा को अपना मानता है, उनकी भक्ती करता है , उनका जप करता है, उनकी पूजा करता है । किंतु साईनाथ चाहतें हैं कि उनके बच्चों का उन्पर अटूट विश्वास हो, उनपर अडिग श्रध्दा हो और इसिलिए ऐसे भक्त को साईनाथ अपना निजभक्त बतातें हैं ।

मेरे साईनाथ मेरी रक्षा करने के लिए और हमारे साईनाथ हमारी रक्षा करने के लिए सर्वथा समर्थ तो हैं ही, परन्तु यह हमारे जीवन में सच होने के लिए, ‘क्या हम साईनाथ के ‘निजभक्त’ हैं’, इस बात का हमें विचार करना आवश्यक है। शामा की कथा तो हमें समझाती है कि साईबाबा का निजभक्त कैसा अटल होता है, अपने साईनाथ के चरणों में उसकी श्रध्दा , भक्ती कैसी अविचल होती है । मेंढक की कथा हमें बताती है कि भले मेरी भक्ती की ताकद कम पड जाए तो भी मेरा साईनाथ - मुझे काल के जबडे से भी निकाल सकता है, इतनी उसकी सत्ता काल पर है ।

इस निजभक्त के बारे में अधिक सविस्तर स्वरूप से मैंने एक बहुत ही सुंदर लेख पढा - जिससे मुझे समझ में आया कि मेरे साईनाथ किसे अपना निजभक्त मानतें हैं , मुझे साईनाथ का निजभक्त बनने के लिए क्या करना चाहिए, मेरी साईनाथ के चरणों में किस तरह की भक्ती होनी चाहिए । मुझे पूरा यकीन है कि आप भी जरूर जानना चाहेंगे , तो चलिए पढतें  है- साईनाथ के निजभक्त होने का राज और प्रयास करतें हैं - हम साईनाथ के निजभक्त बन जाएं ऐसा -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay3-part13/

करते ही केवल मत्कथाश्रवण।
रोगनिरसन हो जायेगा॥

साईनाथ यहां हमें उनकी कथाओं का महत्त्व बता रहें हैं - भीमाजी पाटील की कथा में हम देखतें हैं कि नाना चांदोरकरजी ने साईनाथ के बारे में जो बातें बतायी , उससे ही भीमाजी ने शिरडी जाकर साईनाथ के दर्शन करने की ठान ली थी । हेमाडपंतजी बडी खुबी के साथ हमें यह बात विदीत करतें हैं कि भीमाजीने नाना  को खत लिखा , नाना का स्मरण यानि साईनाथ का स्मरण । वो ही शुभशकुन भी था और वो ही रोग का निरसन भी था । साईनाथ की कथा यानि साईनाथ की लीलाओं का बखान यानि साईनाथ का नाम का जाप । सिर्फ यह करने से भी रोग का निरसन हो ही जाएगा  किंतु क्या मेरे मन में उतना विश्वास है, उतना मेरे मन में साईनाथ पर भरोसा है? हम सामान्य मानव है, हमारे मन में सौ तरीके के बुरे खयाल , संशय , तर्क-कुतर्क आतें ही रहतें हैं जो हमारे विश्वास को कमजोर बनाती है । इसिलिए सिर्फ साईनाथ की ही कथा मुझे सुननी चाहिए, सिर्फ और सिर्फ मेरे साईनाथ के चरणों पर ही मुझे विश्वास रखना चाहिए, मुझे किसी भी अन्य की कथा नहीं सुननी चाहिए , मुझे मेरे मन की कथा भी नहीं सुननी चाहिए , मुझे मेरे खुद से ही जादा भरोसा मेरे साईनाथ पर रखना चाहिए , जैसे शामा ने रखा था , काका दीक्षित ने रखा था , म्हालसापती ने रखा था । तभी मेरे साईनाथ मेरे रो का निरसन करेंगे ही - १०८ % सत्य!         

Tuesday, 16 January 2018

चौबीस घंटे मेरे लिए तत्पर रहनेवाला मेरा सच्चा साथी केवल एकमात्र ‘ मेरे साईनाथ - मेरे परमात्मा’ !

हमारी जिंदगी में हम देखतें हैं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की मदद करता है। उसे आधार देता है। अगर वह उसका मित्र है, साथी है तो उसकी बातें सुनेगा, उसे सलाह भी देगा, गलती होने पर अपनी राय बतायेगा, लेकिन कोई भी मनुष्य किसी दोसरे मनुष्य की बातें एक हद तक ही सुनेगा, जब तक वह उसके साथ रहता है , लेकिन उसके बाद? क्या इस बात पर हमें गौर फर्माना चाहिए । आखिर उस दूसरे मनुष्य की खुद की कुछ मर्यादा तो होती ही है और वहीं तक वह दूसरे मनुष्य की सहायता कर सकता है। केवल अकेले ये परमात्मा ही ऐसे हैं जो मेरे लिए सब कुछ, किसी भी समय करने के लिए तैयार एवं तत्पर रहते हैं, परन्तु हमें वे दिखाई नहीं देते अथवा दिखायी देने पर भी हम उन्हें अनदेखा करते रहते हैं।

श्रीसाईसच्चरित में हेमाडपंत जी हमें एक ऐसे सच्चे साथी से हमें मिलवातें हैं जो हमारा साथ कभी नहीं छोडता, एक पल भी नहीं , दिन के पूरे चौबीस घंटे वह मेरा साथ निरंतर करता रहता है, मैं चाहूं तो भी और या ना चाहूं फिरभी । कोन है वो? मन में सचमुच खलबली मच जाती है ना यह जानने के लिए कौन मुझ से इतना बेहद , बेपनाह प्यार करता है, मेरी सहायता करता है , मेरा साथ देता है ? तो वह है मेरे साईनाथ , मेरे मालिक, मेरे परमात्मा ! मेरे द्वारा की जाने वाली हर एक कृति को देखने वाले, मेरे हर एक आँसू को पोंछने वाले और मेरी छोटी से छोटी खुशी में भी आनंदित होनेवाले, इतना ही नहीं बल्कि मेरी हर एक उचित एवं मर्यादाशील कृति की प्रशंसा करनेवाले केवल ‘वे’ ही एक हैं, होते हैं और आगे भी होंगे ही। यानि सिर्फ वर्तमान में ही नहीं, मेरे भूतकाल और भविष्य़काल में भी, मेरे जीवन के हर कदम पर , हर पल में मेरे साईनाथही मेरा सच्चा साथी बनकर, मेरा साथ निभातें हैं ।   
                                                                     
हेमाडपंतजी पहली बार शिरडी में साईनाथ के दरशन करने आए थें , तब साठेजी के वाडे में (मकान में ) उनकी बालासाब भाटे जी के साथ बहस होती है कि मनुष्य के जीवन में गुरु की आवश्यकता है या नहीं ? साईनाथ तो उअस वक्त उनके साथ नहीं थे , साठे जी के वाडे में मौजूद , फिर भी साईनाथ काका दीक्षित से पूंछतें हैं कि -

वाडे में क्या चल रहा था।
किस बात पर बहस चल रही थी।
क्या कहा इन ‘हेमाडपंत’ ने।
मेरी ओर देखते हुए कहा॥    

साठेजी के वाडे से मसजिदमाई काफी दूर थी , जहां पर साईनाथ बैंठे हुए थे, किंतु साईनाथ - जो हर मनुष्य के साथ हर पल मौजूद रहता ही है , उससे भला कोई बात कैसे छुप सकतीं हैं ? इसिलिए हेमाडपंट जी को इस बात की जानकारी देने , उन्हें महसूस करवाने साईबाबा यह बात कहतें हैं । वाद-विवाद या बहस करना बुरी बात हैं , जो हमेशा हमारा नुकसान करता हैं , हमारे मन को गलत राह पर भटकने के लिए मजबूर कर देता है। 

यह वाद -विवाद क्या होता है, क्यों होता हैं , इससे हम कैसे दूर रह सकतें हैं और सच्चा संवाद क्या होता हैं, वह किसके साथ होता है या हमें करना चाहिए इस के बारे में हाल ही में एक बहुत ही सुंदर लेख पढ्ने मिला -




इस लेख में लेखक महोदय ने बताया है कि हेमाडपंतजी हमें कौन से वाद -विवाद के बारे में बताना चाहतें हैं - सामान्य मनुष्य के जीवन में वाद-विवाद अकसर नियमित रूप में चलते ही रहते हैं। मानव के मन में यह द्वन्द्व बहुत बार चलता रहता है कि ‘क्या इस दुनिया में भगवान हैं? यदि हैं तो भी वे मुझे दिखायी नहीं देते? यदि दिखायी भी दें तो क्या ज़रूरी है कि वे भगवान ही होंगे? और यदि वे भगवान हैं तो फिर वे मेरे लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं? दूसरों का जीवन कितना सरल और सुंदर है और मेरे जीवन में कितनी सारी समस्यायें आन पड़ी हैं?’ इस प्रकार की अनगिनत बातों को लेकर मनुष्य अपने आप से और दूसरों से बहस करता है या कराते रहता है।

लेखक हमें गौर फर्माने के लिए भी सूचित करतें हैं कि  जहाँ पर भगवान या ईश्वर , परमात्मा पर विश्‍वास ही न हो वहाँ पर तो वाद-विवाद चलता ही रहेगा। ‘इस दुनिया में ईश्‍वर हैं, वे नहीं है ऐसी स्थिति हो ही नहीं सकती’ यह विश्‍वास सर्वप्रथम जिस पल दृढ़ होता है, उसी क्षण से आगे होने वाले वाद-विवादों की समस्याओं का समाधान होना आरंभ हो जाता है। जिस क्षण ‘वे’ हैं ही यह विश्‍वास दृढ़ होगा, उसके पश्‍चात् तुरंत ही ‘वे राम, वे कृष्ण, वे ही साई बनकर आते हैं और वे केवल हमारे लिए ही आते हैं’, और हमें इस बात का पता भी चल जाता हैं ।

लेखक जी हमें समझातें हैं कि जिस क्षण से वाद-विवाद का अंत होता है वही से संवाद शुरू हो जाता है।  वो बतातें हैं कि मनुष्य-मनुष्य के बीच चलने वाला वाद-विवाद तो शायद खत्म भी हो जाता है। परन्तु मन ही मन चलने वाला यह वाद-विवाद का झमेला अर्थात स्वयं का ही स्वयं के साथ चलने वाला यह विवाद लम्बे समय तक चलते ही रहता है और ऊपर कहेनुसार इस विवाद का मुख्य कारण होता है, दृढ़ विश्‍वास का अभाव और जिस क्षण यह अभाव भाव में परिवर्तित हो जाता है, उसी क्षण से इस विवाद पर रोक लग जाता है। इस दुनिया में ईश्‍वर है अथवा नहीं, इससे आरंभ होनेवाला वाद-विवाद, यदि ईश्‍वर पर दृढ़ विश्‍वास निर्माण हो जाता है तो ‘वे’ होते ही हैं और ‘वे’ मेरे लिए ही और मेरे ही होते हैं, इस संवाद में परिवर्तित हो जाता है।  
  
यह बात हम दामू अण्णा कासार के कथा में अच्छी तरह से महसूस कर पातें हैं । दामू अण्णा का एक मित्र उअसके साथ रूई (कपास) का ब्यापार करने के लिए पूंचता हैं ? दामू अण्णा के मन में वो व्यापार करें या नाकरें , इस बात पर वाद-विवाद चलता रहता है काफी समय तक , किंतु वह तय नहीं कर पातें हैं , इसिलिए जिस साईनाथ को वो अपना  मानतें हैं , उनसे सलाह मांगतें हैं खत लिखकर , शिरडी भेजकर । साईनाथ जो मेरा सच्चा साथी है , वो दामू अण्णा को रुई का ब्यापार न करने की सलाह देतें हैं , किंतु पैसे के मोह से दामू अण्णा उसे नहीं मानना चाहतें । वो खुद साईनाथ से मिलने चले आतें हैं , साईबाबा से पूंछने की हिम्मत जुटा नहीं पातें , किंतु बिना बात किए हुए भी साईनाथ उनके मन की बात भांपकर उन्हें गलत रास्ते पर जाने से रोंक देंतें हैं और इसीसे दामू अण्णा कासार धंदे में होनेवाले हानी से बाल बाल बच जातें हैं । 

दामू अण्णा का साईनाथ से लगातार संवाद ही चल रहा था, पहले तो साईनाथ की बात मानने से दामू अण्णा कतरातें हैं , उनके मन में वाद-व-वाद शुरु हो जाता हैं , किंत्य बाद में साईनाथ के कृपा से ही वह बच जातें हैं, उनका कोई भी नुकसान नहीं होता - यह मुमकीन हुआ सिर्फ और सिर्फ इसिलिए के दामू अण्णा ने साईबाबा से संवाद शुरु किया था ।

दूसरी ओर भागोजी शिंदे जिनको सारे गांव ने धुतकारा था, दूर रखा था, जिससे सारे गाव ने नाता तोड दिया था, संवाद छोड दिया था, उनसे भी सिर्फ और सिर्फ साईनाथ ने , भागोजी ने उन्हें अपना मानने पर, अपना भगवान , अपना परमात्मा मानने पर, ऊस भागोजी के अपने साईनाथ ने ही संवाद शुरु रखा था, अपने चरणों में पनाह दी थी ।

भक्त प्रल्हाद के खुद के अपने पिता ने भी उनसे शत्रुता निभायी थी, फिर भी उसने महविष्णु को ही अपना माना, उनसे ही अपना संवाद शुरू किया, तब प्रल्हाद को उनके अपने भगवान महाविष्णु ने ही उनसे
खुद का संवाद  बना दिया था ।

इसिलिए मुझे भी और साथ ही साथ हर मनुष्य़ को भी इसी परम सत्य का स्विकार करना चाहिए कि  चौबीस घंटे मेरे लिए तत्पर रहनेवाला मेरा  सच्चा साथी केवल एकमात्र ‘ मेरे साईनाथ -मेरे परमात्मा’ है और मुझे मेरे साईनाथ से हमेशा संवाद बनाए रखना है ।

Friday, 1 December 2017

हमारे जिंदगी में सदगुरु साईनाथ की आवश्यकता !!!

साईनाथ के बारे में कोई हमें बता देता है या हमारे मन में साईनाथ के प्रति प्रेम भाव होता है तो हम साईनाथ के दर्शन के लिए साई मंदिर में जातें हैं, शिरडी जातें हैं , कोई कोई साईबाबा के लिए गुरुवार का उपवास भी रखतें (करतें) हैं और ऐसे ही साई भक्ति में हम एक एक पगडंडी पें पैर रखकर साईनाथ की ओर खिंचें चलें जातें हैं । साईनाथ की कृपा से हमारे जिंदगी में कुछ अच्छे बदलाव आने लगतें हैं , हमारी मुसीबतें साईनाथ की कृपा से ही चुटकी बजातें ही हल हो जाती हैं और फिर हमें अंहकार होने लगता हैं कि यह सब तो मेरी भक्ति के कारण हो रहा है, यह सब मैं साईबाबा के लिए इतना उपवास रखता हूं, शिरडी जाता हूं , या हर गुरुवार साईनाथ के मंदिर में जाकर फूल-माला-नारियल चढाता हूं आ मनत पूरा करने के लिए मैं साईनाथ को सोने का मुगुट पहनाता हूं इसिलिए यह सब अच्छा हो रहा हैं । 

धीरे धीरे मेरे मन में अंहकार का इतना पनपने लगता है कि वो केवल बीज ना रहकर बडा पेड बन जाता है , जो मेरे खुद के लिए बहुत ही हानीकारक होता है । 

साईनाथ तो अंतरज्ञानी हैं , वो तुरंत ही हमारे मन की बात जान लेतें हैं , वो बहुत ही दयालू है और अपने बच्चों की गलतियां ना हो इसिलिए उन्हें सही मार्ग दिखलाना भी चाहतें हैं , साथ ही में हमें माफी दिलाना भी जानतें हैं - किंतु यह बातें तभी संभव हैं जब हमें हमारी गलतियों का एहसास हो । सच बात तो यही हैं कि हमारे भगवान साईनाथ की अकारण करूणा (बिना वजह की गय़ी कृपा) , उनका बिनाहिसाब किया जानेवाला ढेर सारा अनगिनत प्यार यही एक कारण है कि हमारी जिंदगी में उनकी कृपा प्राप्त हो जाती हैं । पर हम हमारे अंहकार की धुनी रमाने में इतना मशगूल हो जातें हैं कि जाने-अनजाने में हम यही बात कों अनसुना अनदेखा करतें हैं ।

हेमाडपंत यही हमारी गलती अपने खुद  के अनुभव से हमें दिखाकर सावधान कर देना चाहतें हैं कि मैंने मेरे साईनाथ के प्रथम दर्शन में ही बहुत कुछ पाया जो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, या जिसकी मैंने कलपना भी नहीं की थी । किंतु उसी वक्त मेरा अंहकार मुझे गलत रास्ते पर भटकाने लगा कि साईनाथ की कृपा या उनके दर्शन यह तो मेरे ही पूर्व जन्मों के पुण्यकर्मों के कारण साईमहाराज मुझें मिलें हैं -
पूर्व जन्मों के न जाने कितने पुण्यकर्मों के कारण।
ये जो साईमहाराज हैं, वे मुझे मिले ॥

यानि हेमाडपंत यह कबूल करतें हैं कि मेरे अंहकार के कारण कहीं तो मैं भटक गया और मुझे साईनाथ की कृपा ना दिखतें हुए , मेरा खुद  का बड्डपन दिखने लगा । और जब अंहकार मानव के मन में प्रवेश करने लगता है तो वहां भगवान साईनाथ एक पल भी नहीं रुकतें ।
संत कबीरजी भी यही बात आदमी को समझातें हैं कि -
प्रेम गली अति सांकरी । ता में दो ना समाय ।
तू है तो मैं नाही । मैं हूं तो तू नहीं ।

अर्थ - मेरे मन की जगह में प्रेम की  इतनी छोटी गली है कि वहां एक वक्त सिर्फ एक ही रहता है  , एक तो मैं खुद (मेरा अंहकार) या फिर मेरा भगवान , मेरे सदगुरु , जब मैं रहता हूं , तो मेरा भगवन , मेरे सदगुरु वहां रह नहीं सकतें और अगर मेरे सदगुरु, मेरे भगवन (मेरे साईनाथ ) को मैं जगह दे दूं तो मुझे खुद के अंहकार को निकालना पडता है । 
हेमाडपंत खुद के स्वानुभवा से हमें यह बात अच्छी तरह से ध्यान में आतीं  हैं कि - 
सुबह साईनाथ का दर्शन पाया, चरणधूली का सौभाग्य प्राप्त होने के बावजूद रात में हेमाडपंत गुरु की आवश्यकता क्या इस अपने अंहकार में भूल जातें है कि साईनाथ ने उन्हें क्या कुछ नहीं दिया सिर्फ एक बार के दर्शन में । हेमाडपंत बालासाब भाटे से वाद करतें हैं कि आदमी अपने कर्म करके उसका फल पाता है , गुरु होने ना होने से उसकी जिंदगी में कुछ बदलाव नहीं आ सकता । साईनाथ तो यह बात तुरंत ही जान जातें हैं । इसिलिए अपने बच्चे को गलत अंहकार के मार्ग में भटक जाने से रोकने कि लिए , उनका नाम गोविंदपंत बदलकर हेमाडपंत भी रख देतें हैं और उन्हें इस बात का एह्सास भी दिला देतें हैं कि तू जो अंहकार से बहस कर रहा है , तू जो गुरु की आवश्यकता नहीं समझ रहा है  वह कितनी बडी गलती है ।

यह इतनी महत्त्वपूर्ण बात हर वक्त श्रीसाईसच्चरित पढतें हुए मेरे समझ में नहीं आ रही थी किंतु एक लेख पढकर वह ध्यान में आ गयी - वह लेख आप भी पढेंगे
तो शायद साईनाथ की कृपा , उनकी आवश्यकता , गुरु का महत्त्व ध्यान में आने के लिए बहुत आसानी होगी -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part50/




लेखक महोदय ने बडी आसानी से समझाया है कि हमारे साईनाथ हमारी जिंदगी आनंद , समाधान से भर जाएं, हमें कभी भी कोई भी मुसीबत का सामना ना करने पडे, इसिलिए हमारे  लिए कितने प्रयास करतें हैं । वो अच्छी तरह जानतें हैं कि सारे मुसीबतों की जड, सारे दु:खों की वजह अभक्ती, अश्रध्दा होती है और आदमी के जीवन में अंहकार भरा हो तो वो कभी भी भगवान की कृपा को स्विकार नहीं कर सकता, वो अपने आप खुद ही सारे दरवाजे और खिडकियां बंद कर देता हैं , अपने अंहभाव से वह दूसरे इंसानों से हमेशा झगडें कर बैठता हैं , अपने आप को सही बतलाने के लिए वह दूसरों से वाद करता हैं , वो खुद के बडपन के सामने भगवान की कृपा को भी अनदेखा कर सकता है । यह सारी गलतियां सिर्फ अंहकार से उत्पन्न होती हैं - फिर वह चाहे तामसी अंहकार हो य राजसी अंहकार हो या फिर सात्त्विक अंहकार ही क्यों न हो ।

लेखक बतातें हैं कि - साईबाबा के सामर्थ्य के प्रति हेमाडपंत के मन में किंचित् मात्र भी शंका नहीं थी। वो पूरी तरह सहमत भी थे कि साईबाबा ही मेरे राम हैं, ये मेरे साईनाथ ही साक्षात् ईश्‍वर हैं। साईबाबा के प्रति भी उनके मन में तिलमात्र भी संदेह नहीं था। पर दूसरी ओए हेमाडपंत के मन में यह बात भी थी कि मेरे पूर्वजन्मों के संचित के कारण ही, पूर्वजन्म की भक्ति के कारण ही बाबा से मेरी मुलाकात हुई। इस प्रकार के स्वकर्तृत्त्व का अहं हेमाडपंत के मन में सिर उठा रहा था । इस का मतलब हेमाडपंत के मन से अभी तक अहंकार का बीज पूर्णरूप से नष्ट नहीं हुआ था। साईबाबा से मुलाकात होना, उसमें प्रेम का, आनंद का श्रेष्ठ अनुभव प्राप्त होना इसमें कही तो मेरे कर्तृत्व का अहम हिस्सा जुटा है और  यही (अंह)भाव तब तक बना हुआ था और इसी अहंकार के कारण ही उन्होंने बालासाब भाटे जी से वादविवाद का आरंभ किया ।हेमाडपंत स्वयं ही इसके बारे में कहते हैं-
अंग में दुर्घट देहाभिमान। यहीं से वादावादी का जतन।
अहंभाव की यही पहचान। ना हो इसके बगैर वाद कहीं॥

हेमाडपंत हम सब श्रध्दावानों को सचेत कर देतें हैं कि हमारे सब के साथ ही अकसर यही होता है। सद्गुरु का दर्शन होता है, उनसे मुलाकात होती है। सेवा का अवसर भी मिलता है, साईनाथ का अनुभव भी आता है और फिर हम सोचते हैं कि मेरी भक्ति ही इतनी थी इसीलिए यह सब कुछ मुझे प्राप्त हुआ।

‘भगवान की कृपा से ही मुझे सामर्थ्य प्राप्त हुआ, मुझे दिशा मिली और इसीलिए भगवान की कृपा से ही मुझे ये सब कुछ प्राप्त हुआ है। इस में मेरा कर्तृत्व कुछ भी नहीं है।’ इस सत्य से मैं अपने अहंकार के कारण दूर चला जाता हूँ। ‘मेरी भक्ति-सेवा के कारण ही मुझे यह सब कुछ प्राप्त हुआ है’। इस अंहकार के कारण हम उन्मत्त हो जाते हैं और अपने भगवान से दूर हो जाते हैं। इस अहंकार की चरमसीमा है रावणवृत्ति। इसीलिए भक्तों में इस अहंकार को भगवान शेष नहीं रहने देते हैं। सदगुरु की आवश्यकता इसिलिए होती है कि कभी भी हमारे मन में  बसे , पनपने वाले अंहकार रूपी रावण वृत्ति की चरण सीमा पर हम ना पहुच जाए । सद्गुरु का अनुग्रह होने पर जड़मूढ़ भी सभी संकटों को पार कर भवनदी को सुखरूप पार कर जाता है और सद्गुरु का अनुग्रह न होने पर वेदशास्त्रव्युत्पन्न पंडित होने पर भी वह प्रगति नहीं कर सकता ।

संत तुलसीदास विरचिते सुंदरकांड में हनुमानजी सीता मां को प्रभु श्रीराम की महिमा , अपने भगवान अपने गुरु की महिमा बतातें हुए कहतें हैं कि
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुध्दि बिसाल । प्रभु प्रताप तें गरूडहि खाई परम रघु ब्याल ।।  
साक्षात हनुमान महाप्रभु भी सदगुरु से , अपने भगवान श्रीराम से कैसे बर्ताव करना है , उनके सामने  अपने अंह भाव को मिटाकर कैसी शरणता स्विकार करनी है यह खुद के आचरण से बता देतें हैं -
सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछु मोरि प्रभुताई ।  
 
बालासाहेब भाटे ने ‘सद्गुरु सिवाय अन्य कोई चारा ही नहीं है, सद्गुरु की ज़रूरत हर किसी को होती ही है-  यह हेमाडपंत से बताई हुई बात को हमें भी अपने मन में थान लेना चाहिए । हमारे साईनाथ भगवान की कृपा से ही हमें  यह सब कुछ प्राप्त हुआ है। यह सब कुछ उसने ही मुझे दिया है’ यही भाव साईनाथ के प्रति मन में धारण करने से अंह रावण का मर्दन हो सकता है ।

Monday, 27 November 2017

मेरे साईनाथ का दर्शन ......





हेमाडपंत की शिरडी में श्री साईनाथ से हुई पहली मुलाकात यह उनके जीवन को पूरी तरह से बदल देनेवाली एक महत्त्वपूर्ण घटना थी ।  उन्होंने यह महसूस किया था कि मेरे साईनाथ का , मेरे सदगुरु का प्रेम कितना अकारण (बिना वजह ) होता है,  बिना किसी लाभ से किए हुए प्यार की  एक अत्यंत सुंदर अनुभूती के वे साक्षी बने थे । हेमाडपंत ही हमें उस अद्भुत तत्त्व को विशद करतें है कि भक्तिमार्ग में भक्त यह भगवान के पास नहीं जाता बल्कि भगवान ही भक्त के पास आते हैं। भगवान जब मेरे पास आते हैं, उस समय ‘उठकर बैठने में’ देर नहीं करनी चाहिए। जो भगवान की दिशा में प्रथम कदम उठाता है, उसके कदम उठते ही भगवान सौ कदम चलकर उसके पास आ पहुँचते हैं। बाबा स्वयं वाडे के कोने तक हेमाडपंत के प्रेम से खींचे चले आये, यही साईनाथ की भक्तवात्सल्य हेतु घटित होनेवाली लीला है।

यही बात हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि मेरे भगवान मेरे लिए स्वयं तकलीफ़ उठाकर मुझसे मिलने के लिए आ पहुँचते हैं।
  
अध्याय ५१ में हम काका दीक्षितजी की कथा  पढतें हैं कि उनकी साईनाथ जी से पहली भेंट , पहली मुलाकात कैसी हुई थी ? काकासाब दीक्षित को १९०९ साल तक ’साई’ नाम भी मालूम नहीं था , पर बाद में जब साईनाथ जी का दर्शन हुआ तो दीक्षित ने इस तरह साईनाथ को अपने मन में बसा लिया कि वे साईबाबा के परम भक्त बनकर सारे लोगों में मशहूर हो गए । काका  दीक्षित को उनके मित्र नाना चांदोरकर ने साईबाबा के बारे में बताया था और तभी से काका दीक्षितजी के मन में साईनाथ का दर्शन करने की प्यास जगी थी ।धारा सभा की चुनाव के वक्त वह लोगों से मत मांगने हेतू अहमदनगर में काका मिरीकर के पास जा पहुंचें थे । तब वहां पर माधवराव देशपांडे शिरडी से आ पहुंचे थे , मानो साईनाथ ने खुदही उन्हें वहां भेजा था जैसे नाना चांदोरकर की बेटी की प्रसूती के समय उदी और आरती लेकर रामगीर बुवा को स्टेशन से नाना के घर पहुंचाने तांगेवाला राजपूत बनकर खुद साई ही दौडे थे , ना? वैसे ही दीक्षित काका मिरीकरजी के घर पहुंचने से पहले ही साईनाथ खुद तसबीर रूप से वहां जा पहुंचे थे , उस की तसबीर याने वो खुद होते ही है - यही भाव खुद साई ने बालाबुवा सुतार को समझाया था - बालाबुवा सुतार ने साईनाथ की तसबीर को प्रणाम किया था चार साल पहले और जो बात वह खुद भूल ही चुकें थे , पर साईबाबा ने बताया था इसकी और मेरी चार साल पुरानी इसके साथ पहचान है ।
उसी स्वरूप से काका दीक्षित ने जब साईनाथ की तरफ जाने का पहला कदम उठाया , तब भगवान साईनाथ खुद सौ कदम आहे चलकर उन्हें मिलने अहमदनगर पहुंचे थे , और वो भी एक तसबीर रूप से । बाबा का भक्त मेघा बाबा की जो तसबीर की पूजा घर में करता था , उसकी कांच टूट गई थी और उसे दुरुस्त करवाने शिरडी से वो तसबीर अहमदनगर लाई गई थी - याने खुद मेरे साईं काका को मिलने हेतू सौ कदम चलकर खुद अहमदनगर आ पहुँचे थे ।

इस परमात्मा के , भगवान के मिलन में ब्याकुल हुए भक्त की उसके भगवान के साथ , सदगुरु के साथ पहली मुलाकात का महत्त्व , उस पहले दर्शन में ही खुद को उसके हाथ कैसे सौंप देना हैं , कैसे समर्पित करना है इस के बारे में एक बहुत ही सुंदर लेख पढने में आया ,
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part49/

यह लेख में लेखक महोदय ने हेमाडपंत की साईनाथ से पहली मुलाकात का वर्णन किया है और बताया है कि हेमाडपंत की शिरडी में श्री साईनाथ से हुई पहली मुलाकात यह उनके जीवन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। इस पहली मुलाकात में ही उन्होंने भक्तिमार्ग का बहुत महत्त्वपूर्ण मकाम प्राप्त कर लिया।
जो पढकर लगा हमें किस तरह से मेरे भगवान से, मेरे सदगुरु से मिलना चाहिए ? मेरा भाव कैसे होना चाहिए ,मेरे मन में कितनी प्यास, कितनी लगन, कितनी तडप होनी चाहिए उसे मिलने की ....
यहां संत मीराबाई का एक पद याद आ गया -

ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन । 
वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी ॥

महलों में पली, बन के जोगन चली ।
मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ॥

कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं,
मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी ।

हेमाडपंत इसी भावोत्कटता से साईनाथ को मिले थे , बस! अब तो बस यही एक! मेरे भगवान! मेरे सखा! यही मेरे सर्वस्व!’ इसी दृढ़भाव के साथ हेमाडपंत बाबा के प्रति अनन्य-शरण हो जाते हैं। इस भगवान के दर्शन कैसे करने चाहिए, यही हमें हेमाडपंत के आचरण से पता चलता है। हेमाडपंत अपनी उस प्रथम मुलाकात में ही साई का दर्शन लेते समय अपनी आँखों के रास्ते भगवान के इस सगुण साकार रूप को अपने दिल में उतार लेते हैं, दृढ़ कर लेते हैं, वह भी हमेशा के लिए!

सचमुच साई के इस दर्शन से हेमाडपंत की स्थिति उन्मनी हो चुकी है। अब बाबा सामने हों या ना हों परन्तु हेमाडपंत को अब अपनी आँखों के सामने सदैव ये साई ही नज़र आने लगते हैं। ‘जहाँ देखे वहाँ पूरणकाम।’ संत एकनाथजी के अभंग की इस पंक्ति के अनुसार अब हेमाडपंत के लिए संपूर्ण सृष्टि ही साईमय हो चुकी है। सभी रूपों में ये साईनाथ ही विराजमान है। यही अभंग दोहे के रूप में औरंगाबादकर के मुंह से साईनाथ ने सुनाया था हेमाडपंतजी को -
गुरुकृपांजन पायो मेरे भाई । रामबिना कछु मानत नहीं ।।
अंदर रामा बाहर रामा । जहां देखे वहां पूरनकामा ।।
जागत रामा सोवत रामा । सपने में देखत सीताराम ।।
एका जनार्दनी अनुभव नीका । जहां देखे वहां राम सरीखा ।।

मन में खयाल आया कि क्या मैंने कभी मेरे साई का ऐसा दर्शन किया है ? अगर नहीं, तो कम से कम अभी यह लेख पढने के बाद तो  मुझे हेमाडपंतजी से यह बात जरूर सिखनी चाहिए कि मुझे मेरे साईबाबा से , मेरे सईनाथ का दर्शन कैसे लेना चाहिए ? एक पल के लिए भी जिनकी झलक पा लेने के लिए योगीजन, ऋषिगण हजारों वर्ष, जन्म-जन्मातरों तक तपश्‍चर्या करते रहते हैं, ज्ञानी ज्ञानमार्ग का मुश्किल प्रवास करते हैं, वे भगवान स्वयं अपने ही अकारण कारुण्य के कारण मुझे दर्शन दे रहे हैं, यह जानकर हेमाडपंत के मन में बाबा के इस प्रेम के प्रति, परिश्रम के प्रति कृतज्ञता का भाव उमड़ पड़ता है।

मेरे साई की तो अनिरूध्द गती है , इसिलिए उसे पकड पाना बहुत कठिन है, यही बात स्वंय साईनाथ ने काका दीक्षित से भी कही थी - कि पंढरी का विठ्ठल पाटील बहुत भगोडा है उसे मेख मार के (अपने मन में, अपने दिल में ) अढल करना चाहिए ।
लेखक महाशय हमें हेमाडपंत जी का भाव आसान तरीके से समझातें हैं कि हेमाडपंत उअनके साईनाथ से हुई उअनकी पहली मुलाकात से हमें यही बताना चाहते हैं कि साईनाथ का दर्शन करते समय हम जितना भी बाबा का रूप को अपने मन में , दिल में उतार सकते हैं, उसे दृढ़ कर सकते हैं, उतना ही उसे दृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए। साई का दर्शन करते समय कम से कम उतने समय तक के लिए तो सब कुछ भूल जाना चाहिए, यहाँ तक कि स्वयं को भी भूल जाना चाहिए, केवल सामने इस साईनाथ को ही जी भरकर निहारते रहना चाहिए। नज़र से मन में उतारने की अधिक से अधिक कोशिश करनी चाहिए। आखिरकार यही तो ध्यान का पहला चरण होता है ।

हेमाडपंत भी यही बात अपने दिल में उतारने को कह रहें हैं कि साई के पास जब तुम आते हो, तब तुम्हारे जीवन में उस व़क्त चाहे अनेक प्रॉब्लेम्स् क्यों न हों, तुम यदि कुछ माँगना भी चाहते हो, तुम्हें कुछ मन्नत माँगनी हो; जो कुछ भी है, वह सब कुछ बाद में, सबसे पहले कहना चाहिए- हे साईनाथ! मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है। हमें कुछ न कुछ माँगना तो अवश्य पड़ता है, लेकिन बाबा के समक्ष खड़े रहने पर, उनका दर्शन करते समय पहले जी भर कर उन्हें निहारना है, उन्हें अपनी आँखों में उतारना है और कम से कम उतनी देर के लिए सब कुछ भूलकर हमें बाबा को ही बाबा से माँगने आना चाहिए। हे साईनाथ, मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है!

बाबा से बाबा को ही माँगना चाहिए। किसी और से नहीं माँगना है, क्योंकि बाबा के पास कोई भी दलाल नहीं हैं, एजंट नहीं हैं। साथ ही केवल बाबा ही स्वयं ही स्वयं को पूर्णत: भक्त को दे देनेवाले हैं, अन्य कोई भी मुझे साई नहीं दे सकता। इसीलिए अन्य किसी से कहकर, अन्य कोई एजंट ढूँढ़कर भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

हे साईनाथ , तेरी अगाध अनिरूद्ध गति की थाह पाना तो नामुमकीन है किंतु तेरी कृपा से तेरा रूप ही हमारे दिलों में उतार दें और तेरे ही चरणों में  हमें  पनाह दे दे -

                                                                                   


                                       सब सौंप दिया है जीवन का भार तुम्हारे  हाथों में ....

Thursday, 24 August 2017

सदगुरु साईनाथ के भक्ति का महत्त्व !

श्रीसाईसच्चरित में हेमाडपंत अपने खुद के अनुभव से बताते हैं कि अगर कोई गुरु के रहते हुए  भी कोई सामान्य मानव के जीवन में मुसीबतें आने लगती हैं , तो उस इंसान को गुरु की आवश्यकता समझ में नहीं आती ।  हेमाडपंत बिना कुछ छुपाए, अपने स्वंय के अनुभव से बतातें हैं कि उनके खुद के मन में सदगुरु के भक्ति का महत्त्व समझ में नहीं आया था पहली बार । हेमाडपंतजी बतातें हैं कि उनके एक दोस्त के इकलौते बच्चे की लोनावला जैसे शुध्द हवा के स्थान में बिना किसी लंबी बीमारी के बिना यकायक मौत हो जातीं हैं, जबकि उस वक्त उसके पास उअसके गुरु बैठे हुए थे । तो यह देखकर हेमाडपंत का जी विचलित हो गया कि अगर गुरु के होते हुए भी संकट आ सकतें है, तो गुरू को मानने की क्या आवश्यकता है? अगर अपने नसीब में जो होनी लिखी है , वो होकर ही रहने वाली है और गुरु भी अगर उसे बदल नहीं सकतें हैं तो गुरु के होने न होने से कुछ फरक नहीं पडता ऐसा उन्होंने अपना विचार कर लिया था , जो गलत था , किंतु उन्हें उसका एहसास तब नहीं हुआ था ।
हम भी देखतें हैं कि आम तौर पर हमारे मन में भी गुरु के बारे में बहुत सारी गलतफहमियां होती है , जैसे हेमाडपंतजी के मन में थी  ।  तब मान लो अगर हमें भी साईबाबा की भक्ति के बारे में , साईबाबा के भक्तों पर होनेवाली रहम नजर , उनकी कृपा के बारे में मालूम नहीं होता और कोई साई भक्त हमें बताता है कि मेरे साईबाबा इतने महान है, वो इतने कृपालु है, दयालू है , तो क्या हम आसानी से मान जातें हैं ? बहुत बार हमें यही लगता है कि हम किसी का बौरा नहीं सोचते, बुरा नहीं करतें , हम हमारा काम इमानदारी से, पूरी वफा से करतें हैं फिर हमें सदगुरु की जीवन में क्या आवश्यकता है ?
                                                                           


श्रीसाईसच्चरित में हम शेवडे वकिल की कहानी में पढते है कि सपटणेकर नाम के उनके एक दोस्त थे , उन्हें शेवडे ने वकिली की परीक्षा देते समय अपने विद्यार्थी दशा में साईबाबा की भक्ति के बारे में , साईबाबा की महानता के बारे में बताया था किंतु सपटणेकर ने नहीं माना , बाद में कितने साल गुजर गए, उनकी शादी हो गयी, और फिर इकलौता बेटा कंठरोग से गुजर गया और उनका चित्त अस्थिर हो गया और ऐसी स्थिती में उन्हें अपने दोस्त शेवडे वकिली ने बतायी बात याद आती है और वह शिरडी जाते है।  किम्तु जब तक उनके मन में सदगुरु साईनाथ के प्रति होनेवाला संदेह, झूठी गलतफहमियां दूर नहीं होती, साईनाथ उन्हें अपनी शरण में नहीं लेते ।  वैसे ही गुजरात के खेडा जिले के ब्राम्हण मेघा की कहानी बतलाती है कि अपने गुरु साठे ने बताया इसिलिए मेघा जाने के लिए बहुत मुश्किल से तैय्यार हो जाता है , पर उसके मन में साईबाबा के प्रति होनेवाला संदेह मित नहीं जाता , साईनाथ उसेअपने करीब भी आने नही देते, प्रलय रूद्र के समान  भयावह रूप धारण करतें हैं ।बाद में मेघा जब अपनी  गलती का एहसास होने के बाद वापिस शिरडी जाता है, तब उसे सच के बारे में पता हो जाता   है और वह साईबाबा को अपना गुरु मान लेता है । 

इस के बारे में हाल हि में एक लेख पढा जो सदगुरु के भक्ति का महत्त्व सुंदरता से वर्णन करता है -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part35/

यहां पर लेखक महोदयजी बता रहें है कि कर्म का अटल सिद्धान्त जब चुक नहीं सकता है, तो फिर सद्गुरु की क्या आवश्यकता? इस प्रकार के प्रश्‍न हमारे मन में भी उठते ही हैं। परन्तु यहीं पर हमें ध्यान देना चाहिए कि कर्म के अटल सिद्धान्त के अनुसार जो भोग मेरे हिस्से में आते हैं, उन भोगों की शुरुआत होते ही हमारे सहनशक्ति के अनुसार उचित कर्म करवा कर पुण्य का, भक्ति का संचय बढ़ाना, यह काम केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं। प्रारब्धभोग की तीव्रता को कम करना, उसे सहन करने की शक्ति प्रदान करना और उस भोग से पुन: बुरे प्रारब्ध का जन्म न हो और साथ ही उचित पुरुषार्थ करवाकर भक्ति की जमापूँजी बढ़ाना, यह कार्य केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं।

वैसे ही एक जगह से दूसरी जगह अगर मुझे प्रवास करना है और मै भक्ति मार्ग पर हू, सदगुर साई के चरणों में शरण हूं तब साईनाथ ही मेरे पूरे प्रवास के लिए जिम्मेदारी अपने सर पे उठा लेतें हैं  । ३३वे अध्याय में नाना चांदोरकरजी के घर उनकी बेटी की डिलिव्हरी आसानी से नही होती तब वह साईनाथ को पूरे मन से पुकारने लगतें हैं , तब साई उनके बेटी के लिए उदी और "आरती साईबाबा " यह आरती देकर रामगीर बुवा को भेजतें हैं ।  रामगीर बुवा के प्रवास के लिए पैसे की तजवीज भी साईनाथ ही करतें हैं , रास्तें में देर ना हो इसिलिए खुद तांगेवाला बनकर आतें हैं और गुड और पापडी खाने देकर खाने का भी इंतजाम कर देतें हैं ।
 
दूसरी ओर अमीर शक्कर की कहानी में जब वह साईबाबा की बात न मानके, उनसे  जाने के लिए अनुमति लिए बिना रात में अहमदनगर भाग जाता है और फिर कैसी भयावह परिस्थिती  में फंस जाता हैं ।  पानी पिलाने जैसा पुण्य़ कर्म भी जान लेनेवाला गुनाह बन जाता है । 

सदगुरु हमारी जीवन नौका को बिना पानी में डूबे पैल तीर में पहुंचा देतें हैं , बीच में मंझदार में कभी नही छोडतें , इसिलिए मुझे सदगुरु साईनाथ की भक्ति दिल-दिमाग सेकरनी चाहिए ।    

         

Monday, 21 August 2017

साईनाथ से संवाद करने - मन की पारदर्शकता जरूरी !



ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम: ।
साईनाथ से प्रत्यक्ष संवाद करने के लिए मन में भोलाभाव होना, अपने मन में  पारदर्शकता होना अती आवश्यक है। जब मैं अपने मैं को मेरे  साईनाथ के चरणों मे सौंपने की सोचता हू और मेरे मन में यह बात ठान लेता हू तब साईनाथ भी मेरा भार उठाने खुशी खुशी तैयार हो जातें हैं । साईनाथ मेरा भला-बुरा मुझसे भी अधिक अच्छी तरह से जानते हैं क्यों कि वोही सर्वज्ञ है, वो ही त्रिकालदर्शी भी है । मेरे लिए कोई चीज अगर अनुचित है तो मुझसे पहले मेरे साईनाथ जानतें हैं ।  

तात्या कोते पाटील की मां बायजाबाई साईबाबा को अपना पुत्र मानकर ही प्रेम करती थी  । तात्या साईनाथ को मामा कहकर पुकारतें थे और साईनाथ भी अपने भांजे का बहुत खयाल रखतें थे और प्यार भी करतें थे । तात्या पाटील एक दिन बाजार जाने निकलतें हैं और साईबाबा से अनुमती लेने जाते है ।  बाबा उन्हें जाने से रोकना चाहतें हैं पर तात्या को तो जाने की जल्दी पडी रहती है । बाबा के मना करने पर भी तात्या मानते नही और जल्दबाजी में निकल पडतें हैं और कितना बडा हादसा हो जाता है , फिर भी साईनाथ उनका बाल तक बां का नही होने देतें । तात्या को आगे चलकर क्या अनहोनी घटित होनेवाली है इसकी जरा सी भी नहीं पडती फिर भी बाबा की कृपा उन्हें बचा लेती है । यह बात स्पष्ट करती है कि तात्या को उनके लिए उस वक्त उचित क्या ? इस बात का पता  चल नही रहा था 

साईनाथ के दर्शन पाने हेतु नाशिक के प्रख्यात धुमाल वकील आते हैं तब साईबाबा उन्हें शिरडी से  बाहर  निफाड गांव जाकर तय हुए दिन कोर्ट का मुकदमा लडने नहीं  देते , और बाद में भी काफी दिन तक अपने पास ही रोख लेतें है शिरडी में । धुमाल वकील साईबाबा की अनुमती के बिना जाना उचित नहीं समझतें और बाद में पता चलता है के जज साहब कोर्ट में नही आ सकें थे । कोर्ट ने दी हुई तीन तारीख भी निकल जाती हैं और धुमाल वकील बाबा के रोकने पर शिरडी ही रूक जातें हैं  किंतु अंतिम निर्णय में उनके मुअकील की ही जय होती है  । इससे साईनाथ अपने बच्चों का, भक्तों का सदैव कल्याण ही करतें हैं , उन्हें विपदाओं से चार हाथ दूर ही रखतें हैं यह समझ में आता है ।

श्रीसाईसच्चरित में ऐसे कई उदाहरण हमें सिखातें हैं कि साईनाथ को हम अपना भार सौंप देतें हैं तो हमारा बेडा पार हो ही जाता है , भले हमें हमारे लिए क्या उचित है क्या अनुचित है इसकी पहचान ना भी हो । किंतु साईनाथ के प्रति हमारे मन में भोला भाव होना अत्यावश्यक होता है , तभी हम अपने परमात्मा से, सदगुरु से संवाद कर सकतें हैं ।  धुमाल वकील के मन में साईनाथ ने मना करने पर भी शंका- कुशंका नहीम पैदा होती ।  मेरे साईनाथ ने मुझे शिरडी में अपने पास रोक के रखा , इस में मेरी ही भलाई होगी, मेरे साईबाबा कभी भी मेरा अहित नही करेंगे, इस बात का पूरा भरोसा उन्हें था यानि साईबाबा के प्रति उनके मन में शुध्द भोला भाव ही था , इसिलिए द्वारकामाई की सिडी बाबा ने उन्हें चढने दी और उनका भला किया । यहां पर धुमाल वकील ने साईबाबा से संवाद कर लिया था    साईनाथ पर पूरा  भरोसा रखना , उनके चरणों में अपना सर रखना और उनके हाथों में अपनी जीवन की बागडोर संभालने देना , उनके हाथॊ में अपना भार सौंप देना इसी में मेरी सब भलाई है यह राज धुमाल वकील जान गए थे और उनके साईनाथ ने भी उनका यह विश्वास, भरोसा टूट्ने नही दिया ।
 
अगर हमारे मन में अगर झूठा अंहकार हो या कोई विकल्प हो या कोई शंका हो तो हमारे इस  परमात्मा से, हमारे साईनाथ से हम संवाद  नहीं कर सकतें  । संवाद करना तो दूर की बात फिर तो साईबाबा द्वारकामाई  की सीढी भी चढने नहीं देतें , दर्शन नहीं देतें । हाजी की कथा हमें दिखाती है कि झूठे अंहकार और गरूर से चूर हाजी के मन में भोला पन नहीं था, उसे मका-मदिना की यात्रा करने का अंहकार था तो साईबाबा ने पूरे  नौ  महिने तक उसे द्वारका माई में पैर भी रखने नही दिया था, दर्शन नहीं दिया था । 

साईबाबा से अगर मुझे संवाद करना है तो मेरा मन साफ होना चाहिए, मेरे मन में भोला भाव होना चाहिए । इसके बारे में एक लेख पढने में आया -
यहां पर लेखक महोदयजी ने बहुत सरलता से , आसानी से यह बात समझायी है । वे शामा का आचरित हमें दिखातें हैं । 

माधवराव देशपांडे अर्थात बाबा का लाड़ला शामा। शामा दिनभर बाबा की सेवा तो करते ही थे पर इसके साथ ही वे आने-जाने वाले भक्तों की सेवा भी बड़े अपनेपन के साथ करते थे। बाबा से प्रत्यक्षरुप में कोई भी बात पूछने का साहस आम तौर पर कोई भी नहीं कर पाता था। माधवराव के कान पर अपनी बात डालकर भक्त अपनी तकलीफ़े आदि बाबा तक पहुँचाते थे। माधवराव भी  बिना किसी स्वार्थ के यह काम बड़ी ही आत्मीयता के साथ करते थे ।

माधवराव बिलकुल सीधे -साधे, भोले भाले भक्त थे । इसीलिए अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और ऐसा उनका स्वभाव बिलकुल नहीं था। उनके आचरण में पारदर्शकता नजर आती थी । बाबा पर उनकी अनन्य निष्ठा थी ।बाबा के चरणों पर अपरंपार प्रेम था एवं बाबाके लिए निरंतर सेवा करना यही उनका जीवन हेतू था । इन्हीं गुणों से परिपूर्ण ये भक्त अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ अन्त:करण के थे। इसी कारण वे ‘माध्यम’ बने, बाबा एवं भक्तों के बीच होने वाले संवाद के।

शामा के इस गुण को हमें ध्यान में रखकर अपने जीवन में साईबाबा से संवाद करने सिखना चाहिए ।

हमारे परमात्मा के साथ संवाद होने के लिए इसी प्रकार की पारदर्शकता ज़रूरी है यह बात हमें माधवराव से सीखनी चाहिए। उस समय शिरडी में जैसे यह बात निश्‍चित होती थी कि शामराव के माध्यम से बाबा के साथ संवाद साध्य करना है। वापस लौटने की आज्ञा लेनी हो आदि। शामा इस भोली भाविकता का आदर्श था और इसीलिए बाबा को उनकी चाहत थी। यही भोलीभावना भगवान को अधिक अच्छी लगती है। और यही भोलापन भगवान के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद साध्य करने का माध्यम होता है। इसी भोली भावना के कारण ही माधवराव बाबा के साथ सरलता से पेश आते थे कारण उनके अंदर कोई भी परदा नहीं था।

हेमाड्पंतजी हमे बतलातें हैं कि द्वारकामाई की सीढ़ी केवल भोला भाविक ही चढ़ सकता है। अन्य कोई भी नहीं। हम देखते हैं कि कुछ लोगों को बाबा द्वारकामाई की सीढ़ी भी नहीं चढ़ने देते। जिनके पास जरा सा भी बिलकुल अत्यल्प भी भोलाभाव नहीं होगा ऐसा घमंडी इन्सान भला कैसे द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ेगा? मन में शंका, विकल्प आदि कुछ भी हो, साईं की परीक्षा लेने कोई भी आये परन्तु उसके मन में भोलाभाव है इसलिए बाबा उसे द्वारकामाई में प्रवेश करने देते हैं। जैसे कि काका महाजनी जहां काम करतें थे उसका मालिक - धरमसी , मन में साईनाथ की परीक्षा लेने की ठानकर आया था फिर भी साईनाथ ने उसे द्वारका माई में पैर रखने दिया , इअतना ही नही उसके मन की कुशंकाओं का भी समाधान किया । वही मेघा की कथा में जब पहली बार वो शिरडी में आता है तो मन में विकल्प लेकर कि साईनाथ तो मुस्लिम है , मैं उन्हें अपना गुरु कैसे मान लूं , तो साईबाबा उसे द्वारकामाई में आने से रोक देतें हैं    

‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाई की सीढ़ी है। हेमाडपंत बाबासे अनुमती माँगनेवाली कथा में सर्वप्रथम हमें इसी सत्य को उजागर करके दिखाते हैं। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा से प्रत्यक्षरूप में पूछने का साहस मुझमें नहीं था कारण यह मुझसे होगा या नहीं, मैं कहीं ‘छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ ना? इस तरह के विचार उनके मन में उठ रहे थे। इसके अलावा अपनी योग्यता के प्रतिकूल बाबा से यह पुछना उचित होगा क्या? ऐसा भी उन्होंने सोचा होगा। वे अपना स्थान अच्छी तरह से जानते थे और यही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। इसिलिए हेमाडपंत हमे बता सकतें हैं कि -

अपने ‘मैं’ को अर्पित करते ही साई-चरणों में। सौख्य पाओगे तुम अपरंपार।
संपूर्णत: सुखमय हो जायेगा तुम्हारा संसार। अहंकार दूर हो जायेगा॥

अपने ‘मैं’ को साईं के चरणों में अर्पित करने पर साई की प्रेरणा जीवन में प्रवाहित होती है और इसी कारण हमारा हर एक निर्णय अचूक साबित होता है।


भक्त को हमेशा अपने मन में साई के प्रति भोला भाव ही रखना चाहिए और बस ये कहना है - सब सौंप दिया है जीवन का भार तुम्हारे हाथों में अब हार मिले या जीत मिलें उपहार तुम्हारे हाथो मेंऔर ऐसे शरणागत को साईनाथ कभी मायूस नहीं करतें , खाली हाथ तो कभी नहीं लौटातें क्यों कि उन्ही का यह वचन है कि
शरण मज आला आणि वाया गेला दाखवा दाखवा ऐसा कोणी ।  

जब हम अपना भार साई बाबा के हाथों मे सौंप देतें हैं तब उस हर एक निर्णय को अब ‘मैं’ नहीं बल्कि मेरे साई ही निश्‍चित करते रहते हैं। जिस तरह एक माँ अपने बच्चे के लिए सर्वोचित एवं सर्वोत्तम (APT) का ही चुनाव करती है, उसी तरह यह साईरूपी माता भी अपने बच्चे के लिए यानी मेरे लिए उचित का चुनाव करती रहती है। इसीलिए हमें अपने इस ‘मैं’ को बाबा के चरणों में ही अर्पित कर देना चाहिए। इसी में हमारा हित है, इससे हमें अपरंपार सौख्य प्राप्त होकर हमारा सारा जीवन ही सुखमय हो जाता है। सारा जीवन अर्थात ऐहिक जीवन के अन्तर्गत मन एवं बुद्धि के साथ-साथ पारलौकिक जीवन भी।

हेमाडपंत ने अपने इस ‘मैं’ को कब का श्रीसाई चरणों में अर्पित कर दिया था और इसी कारण साईप्रेरणा उनके जीवन में प्रवाहित हुई। साईप्रेरणा से ही साईसच्चरित विरचना की इच्छा उनके मन में जागृत  हुई। जब सद्गुरु से संबंधित ऐसा कोई कार्य करने की इच्छा मेरे मन में प्रकट होती है, तब इसके लिए प्रत्यक्ष रूप में उनकी अनुमती प्राप्त करना बहुत जरूरी है। यह साईनाथ का चरित्र है इसीलिए उनका अनुमोदन लेना बहुत ज़रूरी है यह बात हेमाडपंत भली-भाँति जानते हैं और वे हमें यही महत्त्वपूर्ण गुण सिखाते हैं कि कार्य चाहे कितना भी अच्छा और पवित्र क्यों न हो पर मुझे बाबा की प्रत्यक्षरुप में अनुमती लेकर ही उसे आरंभ करना है। बाबा के देहधारी होने पर उनसे प्रत्यक्षरुप में मिलकर उनके मुखसे अनुमति प्राप्त कर यह कार्य को आरंभ करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

मेरे मन में है इसलिए वह पूरा होगा ही, ऐसा न होकर हमारा विश्‍वास यह होना चाहिए कि बाबा के मुख से निकलेगा तो ही वह कार्य पूरा होगा, सुसंपूर्ण होगा यही इसके पिछे छिपा हुआ मर्म है। साईसच्चरित लिखना है यह मेरा संकल्प न होकर बाबा का ही संकल्प है यह बाबा के प्रत्यक्षरुप में कहने से ही स्पष्ट होगा। और बाबा का ही संकल्प पूर्ण सत्य है, यह बात हेमाडपंत अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिए हेमाडपंत निश्‍चय करते हैं कि इस कार्य के लिए बाबा की अनुमती प्राप्त करना बहुत ज़रूरी है। इसके बिना मैं मेरा कोई भी कार्य शुरु नहीं करूंगा । मुझे कुछ भी स्वेच्छा से , अपने मन से न करते हुए बाबा की इच्छा से ही करना है। हेमाडपंत का यह विशेष गुण हमारे लिए बहुत महत्त्व रखता है। बाबा जो भूमिका मुझे देंगे उसे मैं पूरी ईमानदारी के साथ निभाऊँगा, किसी अन्य की भूमिका कितनी भी अच्छी क्यों न हो परन्तु मैं उसे करने की कोशिश नहीं करूँगा कारण मेरे साईनाथ ही जानते हैं कि मेरे लिए उचित भूमिका कौन सी है?

हमारे परमात्मा के साथ संवाद होने के लिए इसी प्रकार की पारदर्शकता ज़रूरी है यह बात हमें माधवराव से सीखनी चाहिए। उस समय शिरडी में जैसे यह बात निश्‍चित होती थी कि शामराव के माध्यम से बाबा के साथ संवाद साध्य करना है। वापस लौटने की आज्ञा लेनी हो आदि। शामा इस भोली भाविकता का आदर्श था और इसीलिए बाबा को उनकी चाहत थी। यही भोलीभावना भगवान को अधिक अच्छी लगती है। और यही भोलापन भगवान के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद साध्य करने का माध्यम होता है। इसी भोली भावना के कारण ही माधवराव बाबा के साथ सरलता से पेश आते थे कारण उनके अंदर कोई भी परदा नहीं था। द्वारकामाई की सीढ़ी केवल भोला भाविक ही चढ़ सकता है। अन्य कोई भी नहीं। हम देखते हैं कि कुछ लोगों को बाबा द्वारकामाई की सीढ़ी भी नहीं चढ़ने देते। जिनके पास जरा सा भी बिलकुल अत्यल्प भी भोलाभाव नहीं होगा ऐसा घमंडी इन्सान भला कैसे द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ेगा? मन में शंका, विकल्प आदि कुछ भी हो, साईं की परीक्षा लेने कोई भी आये परन्तु उसके मन में भोलाभाव है इसलिए बाबा उसे द्वारकामाई में प्रवेश करने देते हैं। ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाईची की सीढ़ी है। हेमाडपंत बाबासे अनुमती माँगनेवाली कथा में सर्वप्रथम हमें इसी सत्य को उजागर करके दिखाते हैं। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा से प्रत्यक्षरूप में पूछने का साहस मुझमें नहीं था कारण यह मुझसे होगा या नहीं, मैं कहीं ‘छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ ना? इस तरह के विचार उनके मन में उठ रहे थे। इसके अलावा अपनी योग्यता के प्रतिकूल बाबा से यह पुछना उचित होगा क्या? ऐसा भी उन्होंने सोचा होगा। वे अपना स्थान अच्छी तरह से जानते थे और यही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है।

ढूँढ रहा था योग्य अवसर । बाबा से पूछने का न था साहस।
आ गए माधवराव ‘सीढ़ी’ पर। उन्हें बता दिया मन का भाव॥

यहाँ पर हेमाडपंत बड़े ही सुंदर तरीके से ‘माधवराव आ पहुँचे सीढ़ी पर’ यह पंक्ति लिखते हैं। यहाँ पार स्थूल रूप में वे द्वारकामाई के सीढ़ी तक आ पहुँचे यह तो एक अर्थ है ही, परन्तु इसके साथ ही ‘माध्यम’ बने यह अर्थ भी निकलता है।

भक्त और भगवान के बीच किसी एजंट व्यक्ति की ज़रूरत नहीं होती। यहाँ पर माधवराव यह रूपक है भक्त के मन में रहने वाले भोले भाव का।

सीढ़ी जिस तरह से दो मंजिलों को जोड़ने का माध्यम होती है, उसी तरह भक्त एवं भगवान को जोड़ने का काम करने वाला ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाई की सीढ़ी है। हम सभी को द्वारकामाई में जाकर दर्शन लेने की, बाबा के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद करने की बहुत इच्छा होती है। यह सब हो यही तो साईनाथ की भी इच्छा होती है, पर द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ने के लिए हमारे अन्त:करण में भोले भाव का होना अत्यन्त महत्त्चपूर्ण है। साईनाथ का भोला-भाविक ही द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ सकता है और साईनाथ के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद कर सकता है। यही तत्त्व हेमाडपंत यहाँ पर हमें दिखला देतें हैं ।

श्रीसाईसच्चरित यह हेमाडपंतजी ने साईनाथ के साथ किया हुआ एक संवाद ही है , है ना ? 

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

Samirsinh Dattopadhye 's Official Blog