Thursday, 2 February 2017

भक्तों को सच्चा बोध - साईबाबा का और उनके ऋणों का स्मरण !

हरि ॐ.

भक्तों को सच्चा बोध - साईबाबा का और उनके ऋणों का स्मरण !

श्रीसाईसच्चरित में अमीर शक्कर की कथा पढ रही थी तब एहसास हुआ की मेरे साईबाबा तो मुझे मुसीबतों से उबारने के लिए तो सदैव तत्पर रहतें ही हैं , किंतु क्या इस बात को ध्यान में रखकर मैं कभी मेरे साईबाबा को तहे  दिल से , सच्चे मन से ‘थँक्स’ कहता हूं या नहीं इस बात पर मुझे अवश्य ही गौर फर्माना चाहिए । अमीर शक्कर को जोडों की बीमारी से काफी परेशानी हो रही थी , तो साईबाबा मेरा दु:ख-दर्द जरूर मिटाएगें यह सोचकर अमीर शक्कर अपना कारोबार समेट कर शिरडी में आ जाता है और साईबाबा के दर्शन करके बीमारी का उपाय भी जान लेता है । साईबाबा ने अमीर शक्कर को नौ महीने तक चावडी में रहने के लिए सलाह दीऔर मस्जिद में आकर सामने से दर्श के लिए मना भी किया । अमीर ने काफी समय तक तो साईबाबा की बात मान ली, किंतु जब जोडों के दर्द से राहत पाने मिली तो अमीर को साईबाबा की सलाह में खोट दिखने लगा , मैं कितने दिनों से यहा पडा हूं अब मेरी बीमारी ठीक है तो मैं शिर्डी छोडके बाहर जाऊंगा । साईबाबा का शुक्रिया अदा करना तो दूर की बात , अमीर शक्कर ने तो साईबाबा की अनुमती भी ली नहीं और साईबाबा को बिना पूंछे, बिना बताए शिरडी से रात में भाग खडा हुआ । किंतु कोपरगाव की धर्मशाला में उसे और एक नयी मुसीबत ने घेरा । प्यासे को पानी पिलाने का पुण्य भी अमीर को रास नहीं आया और उसे बूढे फकीर बाबा की मौत हो गयी , जिसका गुनेहगार अमीर खुद बन सकता था । अपनी ही गलती के कारण अमीर मुसीबत में फिर एक बार घिर गया था , किंतु वो तो साईबाबा को ही दोषी मान रहा था - उलटा चोर कोतवाल को डांटे - ऐसा किस्सा बना था ।
यह कहानी से हमें पता चलता है कि मैं कितनी छोटी -मोटी गलतियाँ करता ही रहता हूं और उपर से उन गलतोयों के लिए अपने आप को दोषी न मानकर , मै अपने साईबाबा को ही दोष लगाता हू ।

साईबाबा तो हर कदम [अर मेरा साथ देने के लिए एक पांव पर खडे रहते ही है , बस्स मुझे याद रखना है कि जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई ।      
                                                                     
                                                           

हम आम इन्सान हैं, सामान्य गृहस्थाश्रमी मनुष्य हैं । हमसे छोटी-मोटी गलतियाँ होती ही रहती हैं। लेकिन क्या कभी हम यह सोचते हैं कि हमारे द्वारा की गयीं उन गलतियों के अनुपात में क्या हमें सज़ा मिलती है? जब कभी हम समय निकालकर सोचेंगे तब हमें पता चलेगा कि हमारे साईनाथ कितने क्षमाशील हैं। हमारी हर गलती के लिए यदि वे हमें सज़ा देंगे तो हमारा क्या होगा? हर कोई अपने आप से यह प्रश्‍न पूछेगा तो उसका उत्तर उसे खुद ही मिल जायेगा ।

उसमें भी मुझे केवल इस जन्म की गलतियाँ ही याद हैं और वह भी मुझे मेरी स्मरणशक्ति के अनुसार ही याद आ रही हैं। इस जन्म में याद न आने वालीं, लेकिन पिछले जन्मों में की गयी गलतियों का क्या? यह भी सोचिए कि मुझसे ग़लत हुआ है मग़र मुझे जो गलत ही नहीं लगा, उन ग़लतियों का क्या? श्रीसाईसच्चरित में ही हम चनबसाप्पा और वीरभद्राप्पा की कथा में पढतें हैं कि कैसे उनकी पिछले जन्म की गलतियो की सजा उन्हें अगले जन्म में भी जाकर भुगतनी ही पडती है ।
अब हम बाबा के क्षमाशीलता को जान सकते हैं कि ये साई अनंत क्षमाशील हैं, सचमुच उनकी क्षमा भी अनंत ही है। बाबा के द्वारा सदा से ही की जा रही इस क्षमा के लिए हम उन्हें चाहे कितना भी ‘थँक्स’ बोले तो भी वह कम ही है। वैसे तो हम बात बात में दूसरे लोंगो  को ‘सॉरी’ और ‘थँक्स’ कहना नहीं भूलते, सहज ही कहते रहते हैं। हमें यह बात जरूर सोचनी चाहिए कि जिस साईनाथ की क्षमा के कारण, करुणा के कारण हमारा जीवन सुंदर बना है, क्या उन्हें हम कभी ‘थँक्स’ कहते हैं? मुझे हमेशा मेरी पुकार पे दौड के आनेवाले मेरे साईबाबा को याद रखना चाहिए, उन्हें ‘थँक्स’ कहना चाहिए, एक बार नहीं बल्कि बार बार कहते ही रहना चाहिए । क्या सचमुच हम पर सदैव खुशी के बौछार लगानेवाले साईनाथ के ऋणों का स्मरण क्या हम रखते हैं? क्या हमें इस बात का एहसास होता है कि बाबा की क्षमा के कारण मेरे प्रारब्धभोग सौम्य हुए हैं?

दुख, तकलीफ़ में तो सभी भगवान को याद करते हैं और सुख में भूल जाते हैं। परन्तु जो नियमित रुप से यह प्रार्थना करता है उसे सुख में भी भगवान का विस्मरण नहीं होता और फिर ऐसे नित्यप्रति भगवान का स्मरण करने वाले के हिस्से में दुख आयेगा कैसे?
यहां एक कथा स्मरण हुई कि साईबाबा के एक भक्त भगवानराव कुलकर्णी ने साईबाबा को एक बार सवाल पूछा था कि बाबा आप न होने पर हम आप को कहां ढूढेंगे , कहा पा सकते है  ? तब साईबाबा मे बडा प्यारा सा जबाब दिया था कि भग्या जहां पर आनंद होगा वहां पर तुम मुझे जरूर पाओगे ।  भगवानराव बहुत ही सीधे सादे इंसान थे, उन्हें यह बात सुनकर बडा दुख हुआ कि मेरे साईबाबा सिर्फ जहां पर आनंद हैं वहीं पर ही मोजूद होंगे ।  उन्होंने फिर साईबाबा से पूछा  कि बाबा जहां पर दुख होगा वहां पर आप नहीं रहोगे क्या ? साईबाबा ने बडे प्यार से कहा अरे भग्या , जहां पर मैं हू वहां पर दुख हो ही नहीं सकता ।  

हमें भी बाबा को ‘थँक्स’ कहते रहना चाहिए और दूसरी तरफ मुझे  साईनाथ के आने वाले अनुभवों को अपने आप्तों को अपने मित्रों को सुनाते रहना चाहिए। उनका गुणगान करते ही रहना चाहिए। यह इसके साथ ही बाबा से ‘थँक्स’ कह दिया ‘धन्यवाद’ कह देनाही पूरा नहीं हुआ बल्कि ‘थँक्स’ के अनुसार वृत्ति थी हेमाडपंत के अनुसार होनी चाहिए। यह हेमाडपंतजी हमें कौनसी वृत्ती  का आचरण करने प्रेरीत करतें हैं यह जानिए -   

http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part 3 /

जब मैं साईबाबा का, मेरे भगवान का नाम सुमिरन रोक लेता हूं तभी विपति मुझ पर टूट पडती है ।
यह बात तो संत तुलसीदासजीने सुंदर कांड में बतायी है कि साक्षात महाप्राण हनुमानजी ने  भगवान श्रीरामजी से कही है -
कह हनुमंत बिपति प्रभु साई ।जब तव सुमिरन  भजन न होई।

मनुष्य से पाप कब होता है? उत्तर बिलकुल आसान है। सद्गुरुतत्त्व का, भगवान का विस्मरण होने से ही पाप होते हैं। मेरे बाबा का स्मरण मुझे है इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है- साईनाथ मेरी हर एक क्रिया को, हर एक विचार को, हर एक उच्चारण को देखते ही हैं, उनसे कुछ भी नहीं छिपा है, मेरी कृतियों की पूरी की पूरी खबर उन्हें उसी क्षण होती ही हैं, इस बात का स्मरण रखना।

बाबा के स्मरण का एहसास ही मुझे मेरे पापों से परावृत्त करता है। बाबा के स्मरण के साथ उनका ‘धाक’ भी (उनके मेरे साथ होने का आदरयुक्त भय) मेरे साथ निरंतर होता ही है और बाबा के इस धाक के कारण ही मेरा मन कोई भी पापकर्म करने से परावृत्त हो जाता है। परन्तु जिस पल बाबा का विस्मरण होता है, उसी क्षण बाबा का ‘धाक’ भी मन में नहीं रह जाता और मनुष्य पापकर्म करता है।

जिस पल अमीर शक्कर ने सोचा कि रत के अंधेरे में साईबाबा को बिना बताए , मैं छुपकर भाग जाऊंगा उसी पल उस के हाथसे सदगुरु का विस्मरण हो गया , साईबाबा का धाक मन में नहीं रहा और अमीर शक्कर के हाथों से बाबा की बात न मानने का , साईबाबा को फसाने का पाप कर्म हो गया और उसका कडवा फल स्वरूप परिणाम भी भुगतना पडा ।

हेमाडपंत दूसरे अध्याय की शुरुवात में ही हमें समझातें हैं कि -
इसीलिए साई का धन्यवाद। चाहा यथामति करूँ विशद।
होगा वह भक्तों के लिए बोधप्रद। पापोपनोद होगा।

बाबा को ‘थँक्स’ कहने में ही सच्चा ‘बोध’ है। हेमाडपंत स्वयं यह अनुभव करते हैं और हम भक्तों को भी पापमुक्ति का सच्चा मार्ग दिखाते हैं, हमारे प्रारब्धभोगों को खत्म करने की मार्ग दिखाते हैं। दर असल हेमाडपंत के माध्यम से साईनाथ ही यह सब कुछ कर रहे हैं।

साईबाबा को ‘थँक्स’ कहने से या साई का धन्यवाद करने से इंसान को दूसरे भी कई लाभ होतें हैं यह मैंने महसूस किया एक श्रीसाईसच्चरित संबंधी लेख पढकर , क्या आप जानना नहीं चाहोगे अन्य लाभों के बारे में ? तो चलिए साईबाबा को सिर्फ धन्यवाद करने से हमें क्या कुछ हासिल नहीं होता यह जानने की कोशिश करतें हैं -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part4/

भक्तों को सच्चा बोध कौन सा होना चाहिए? तो ‘साईनाथ का और उनके ऋणों का  स्मरण बनाये रखना’ यही सच्चा बोध है। यह बोध किस कारण होता है? तो बाबा को ‘थँक्स’ कहने से।

हेमाडपंत इस अध्याय के आरंभ में ही साईनाथ को ‘थँक्स’ कहकर हमारे उद्धार का बड़ा ही सहज एवं आसान मार्ग हमें दिखा रहे हैं। बाबा से बात करते रहें, उन्हें अपनी हर बात बताते रहें, अपनी होने वाली हर गलती के लिए मन:पूर्वक उनसे ‘सॉरी’ कहें और साथ ही उनके उस नि:स्वार्थ प्रेम के लिए, लाड़-दुलार के लिए, उनके हम पर होने वाले ऋणों का स्मरण कर उन्हें ‘थँक्स’ भी कहें।

Friday, 20 January 2017

भगवान श्रीकृष्ण उवाच - संत सचेतन माझ्या मूर्ती ।

प्रतिमा माझ्या अचेतन व्यक्ती । संत सचेतन माझ्या मूर्ती ।
दृढ भावें केल्या त्यांची भक्ती । ते मज निश्चितीं पावली ॥१॥

केल्या प्रतिमा निजकल्पना उत्तम । संत प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ।
चालतेंबोलतें परब्रह्म । अतिउत्तम साधुसेवा ॥२॥
                                                                  - एकनाथी भागवत  

                                                                   

संत ह्याच माझ्या सचेतन मूर्ती आहेत असे साक्षात परमात्मा भगवंत श्रीकृष्णाचे उद्गार आहेत असे आपल्याला संत श्रेष्ठ एकनाथ महाराज सांगतात असे वाचनात आले आणि एकदम आठवली ती माझ्या आवडत्या श्रीसाईसच्चरितातील हेमाडपंताची अध्याय १४ मधील ओवी.

ऐसे हे महासाधुसंत । जयांच्या बोलात वर्ते भगवंत । 
काही न अप्राप्य तया विश्वांत ।  काही न अज्ञात तयातें । । ६१ । । 


श्रीसाईसच्चरितात सुरुवातीलाच उपोद्घात मध्ये स्वत:ला बाबांचे एक लेकरू म्हणविणारे साईबाबांचे परम भक्त काकासाहेब दीक्षित म्हणजेच श्री हरी सीताराम दीक्षित लिहीतात की श्रीसाईसच्चरित यातील ओव्या एकनाथ  महाराजांच्या ओवींच्या धाटणीवर असून, ग्रंथ वाचत असताना नाथ महाराजांच्या वाणीचे वारंवार स्मरण होते.

आपण आता बघू या की हेमाडपंत आपल्याला संत एकनाथांच्या ओवीचाच भावार्थ कसा उलगडवून देतात ते आणि मग आपल्या ध्यानात येते की संत वा सदगुरु हाच माझ्या सचेतन मूर्ती असे भगवान श्रीकृष्ण का म्हणाले असावे.        

ऐसे हे महासाधुसंत । जयांच्या बोलात वर्ते भगवंत । 
काही न अप्राप्य तया विश्वांत ।  काही न अज्ञात तयातें । । ६१ । । 



ही अध्याय १४ मधील ६१वी ओवी. अध्याय १३ मध्ये भीमाजी पाटीलांची कथा सांगून झाल्यावर हेमाडपंत म्हणतात असे हे कृपाळू संत ,उदयकाळ प्राप्त होतांच केवळ दर्शनाने सुध्दा भवाच्या जंजाळातून मुक्ती करवितात, भवसागरातून पार नेतात, काळालाही मागे परतवितात आणी आपण आता पुढील कथेंत संतासंताची एकात्मता पाहू या , जेथे स्वस्थ चित्ताने परिसणार्‍या (ऐकणार्‍या ) श्रोत्यांना साईंची व्यापकता कळून येईल.

येथे प्रत्येक अध्यायांत हेमाडपंत श्रोत्याला आणि श्रध्दावान भक्ताला वेगवेगळ्या भूमिकां मधून बोध घडवित आहेत. श्रोता म्हणजे जो भक्तीमार्गावर चालू इच्छितो आणि अजून साईनाथांच्या चरणी संपूर्ण विश्वास यायला वेळ लागू शकतो असा एक वर्ग. श्रध्दावान भक्त म्हणजे साईनाथ कोण, साईबाबा कोण आहेत ह्याचे ज्याला आकलन झाले आहे आणि ज्याने साईबाबांच्या ठायी आपला दृढ विश्वास ठेवला आहे, शेंडी तुटो की पारंबी , मी माझ्या साईंचे चरण सोडणार नाही, व्यावहारिक जगाशी , लोक काय बोलतात ह्याच्याशी मला देणे घेणे नाही असा एक वर्ग जसे दीक्षित काका , चांदोरकर , दासगणू , शामा , लक्ष्मीबाई, बायजाबाई ! असे मला वाटते.
आता त्या काळची परिस्थिती पहा , हिंदू -मुस्लीम दुही माजली आहे, भक्तीचा लोप होत चालला आहे आणी अशा खडतर काळात हा परामात्त्मा , साक्षात ईश्वर प्रकटला आहे. त्याला मानवाला त्याची हरवलेली भक्ती परतवून द्यायची आहे, देवयान पंथावर आणायचे आहे.
परंतु सामान्य माणूस हा सगुण साकाराला देव म्हणून स्विकारतो का सहजासहजी? नाही , जसे राम अवतारात त्याला वनवासी म्हणूनच हिणवले गेले, कृष्ण अवतारात त्याला गवळ्याचे पोर म्हणून हिणवले गेले , म्हणजेच माणसाला निर्गुण निराकाराला देव म्हणून पूजायची , स्विकारायाची तयारी असते , दगडांत देव पाहणे सोपे असते , कारण "तो" काही बोलत नाही, चालत नाही , आपल्याला मनाविरूध्द वागायची आज्ञा करीत नाही . परंतु प्रत्यक्षात "तो" अवतरतो देह धारण करून , मानवी स्वरूपात का तर त्याच्याच लेकरांनी "त्या" चे आचरण पाहून स्वत: तसे वागावे . अध्याय ११ मध्ये हे सगुण साकाराचे महत्त्व हेमाडपंत आपल्याला मनाच्या कळीवरून अतिशय सुंदर रीत्या पटवून देतात.
पूजक जेथवर साकारू । देहधारीच आवश्यक गुरु  । 
निराकारास निराकारू । हा निर्धार शास्त्राचा ।। १० ।।
न करितां सगुणाचे ध्याना । भक्तिभाव कदा प्रकटेना । 

आणि सप्रेम जंव भक्ति घडेना । कळी उघडेना मनाची ।। ११ ।।
तें उमलल्याविण कांहीं । केवळ कर्णिकेस गंध नाहीं ।

 ना मकरंद ना भ्र्मर पाहीं  । तेथ राहील क्षणभरी ।।१२ ।।                                                                           - अध्याय ११ , श्रीसाईसच्चरित 
असे असले तरी देखिल त्याही काळी स्वत:ला विद्बान समजणारे, आपल्या पांडित्याचा दंभ मिरवणारेही होतेच. म्हणूनच हेमाडपंत साईनाथांना स्वत: देव , भगवंत मानीत असले तरीही कुठेही तुम्ही त्याला देव माना असा आग्रह धरीत नाही, पण त्याच वेळी ते स्वत:ची भूमिका आवर्जून  मांडायला कचरतही नाही. दशग्रंथी ब्राम्हण असलेले खापर्डे सारखीं मोजकी मंडळी होती , पण बहुसंख्य समाज हा साईबाबांना फकीर समजून , कफनी घालतात , मशिदीत राहातात , हिंदूना बाटवितात, लोकांच्या दारी भिक्षा मागतात, दक्षिणा घेतात असे आरोप करून डावलत होता. हेमाडपंतांना अशा सार्‍या समाजाला आणि येणार्‍या कलियुगाच्या काळातही सदगुरुंना स्विकारण्यासाठी मानवाची मनाची भूमिका घडवायची होती, त्यात भक्तीचे बीज पेरायचे होते , जी साईनाथांचीच इच्छा होती आणि म्हणूनच "श्रीसाईसच्चरित" हा अपौरूषेय ग्रंथ प्रकटला साईंच्या अनिरूध्द कृपेतून आणि हेमाडपंताकडून विरचिते झाला.
प्रवचनांत ऐकले होते की हा ग्रंथ सात वेगवेगळ्या पातळ्यांवर कार्य करतो.
हेमाडपंत स्वत:ची भूमिका ठामपणे मांडतातच की कुणा काही वाटू माझ्यासाठी हा माझा साक्षात भगवंतच आहे
कोणी म्हणोत भगवद् भक्त   । कोणी म्हणोत महाभागवत । 
परी आम्हांसी ते साक्षात भगवंत । मूर्तिमंत वाटलें ।। २५ ।।
                                                          - अध्याय ११ , श्रीसाईसच्चरित 


पण दुसर्‍या क्षणी ते साईबाबांची  संत म्हणूनही ओळख सांगतात , गुरु म्हणूनही दावितात , त्याच क्षणी नियत आणि अनियत गुरुं मधला फरकही स्पष्ट करतात , तर इतर मायिक देवां मध्ये आणि माझ्या साईबाबां मध्ये कसा फरक आहे हेही सांगायला ते विसरत नाही. कोणाला जसे स्विकारायचे तसा स्विकारा , पण "तो" हा "तो"च ! हेही ते स्पष्ट्पणे सांगतात .
इतर देव सारे मायिक । गुरुचि शाश्वत  देव एक ।
चरणीं ठेवितां विश्वास देख l 'रेखेवर मेख मारी' तो ll ४ ll
                                                           – अध्याय १०, श्रीसाईसच्चरित

"तो" साक्षात ईश्वर आहे हेच ते पदोपदी पटवून द्यायचा प्रयास करतात. "तो" माणसासारखा दिसतो, वेशभूषा धारण करतो, फाटके तुट्के कपडे घालतो, भिक्षा मागायला तुमच्या दारात येतो म्हणून तुम्ही त्याला तुमच्या सारखा सामान्य माणूस समजू नका ही कळकळ आहे, तळमळ आहे, जो ऋषी-मुनींना हजारो वर्षांच्या कठोर, उग्र तपानंतर ही क्षणैक काळ दिसतो , ज्याचे दर्शन अप्राप्य आहे असा ’तो’ माझा महाविष्णू, परम शिव आमच्या उध्दारासाठी आज माणूस बनून आलाय "त्या"ला जाणा , "त्या" अवघा स्विकारा, एकमात्र "त्या" ला शरण जा , त्यातच आपल्या सर्वांच्या "मानव" देहाचे, नरजन्माचे खरे प्रयोजन आहे ही हेमाडपंताची अटाटी आहे , जी "त्या"च "साई-निवास" मध्ये आपण बापूंच्या मीनावैनींमध्ये अनुभवली होती.
आज अनुभवसंकीर्तन , बापूंचे गुणसंकीर्तन करणारे जाणतात की सर्वसामान्यांना बापूंची महती पटविणे हे म्हटले तर किती सोपे आणि म्हटले तर किती शिवधनुष्य पेलण्याचेच कार्य आहे.
हेमाडपंत सांगू इच्छितात ते ह्याच कळकळीने , तळमळीने की "तो" मानवी देहात आहे की तुमच्या माझ्यासारखा आहे, दिसतो, वागतो, बोलतो ह्यापलिकडे जाऊन "तो " खूप विलक्षण आहे, "तो" संताचे आराध्य असलेला महासंत, संतावसंत , महान भगवंत आहे "त्या"ला जाणा , संत, साधु ज्याला नमन करतात वारंवार , लोटांगण घालतात ज्याच्या पदी "तो" हा महान परमेश्वर आहे.
परंतु जसे आपल्याला सदगुरु अनिरूध्द  बापूंनी स्वत:च सांगितले, ग्रंथात सहीनिशी  लिहीले के मी अनिरूध्द आहे. होतो आणि  अनिरूध्दच राहणार. मी कोणाचाही अवतार नाही . तसेच सदगुरु म्हणा वा भगवंत म्हणा त्याच्या सगुण साकार देहधारी प्रत्येक अवतारात "तो" हेच सांगतो. राम कधीही म्हणाला नाही मी भगवंत आहे , ना कृष्ण म्हणाला , ना साई . पण त्यांचे श्रध्दावान जाणतात की हा "तो"च !

परि हासता , स्मित दिसता ह्यासी ओळखिले थोरांनी ! 
हाचि नववा नववा आगळा सजीव बनला पंढरीचा पुतळा !
काय गरज होती गौळीबुवांना हाच पंढरीचा राणा असल्याची ग्वाही देण्याची , काय गरज होती येवल्याच्या आनंदनाथांना "हा हिरा " म्हण्ण्याची ! कारण "त्या"ची "तो" देहात असताना होत असलेली उपेक्षा त्यांना सहन झाली नाही म्हणून त्यांचे जीव कळवळले.
म्हणूनच मीना वैनी ( हेमाडपंताची नातसून) सांगून गेल्या "जे आले ते तरूनी गेले , जे न आले ते यसेच राहिले "

महासाधुसंत हा शब्द अर्थांच्या पलिकडचा आहे, भावनेतून , मनाच्या प्रेमाच्या गाभार्‍यातून शोधायचा ! श्रीसाईसच्चरित हे असेच अर्थापलिकडचे , शब्दातीत आहे त्याला फक्त "त्या" एकमेव प्रेम करणार्‍या अद्वितीय प्रेमसागराच्या प्रेमात न्हाऊनच अनुभवावे लागते. शब्दांच्या पलिकडचे असे हे "त्या"चे प्रेम आपण फक्त पित राहायचे , बापूच आपल्याला आपल्या भावानुसार "त्या"चे नितनवे रंग दावित राहतात. मला जे आजवरच्या प्रवचनांतून जाणवले कधी स्पष्ट रूपाने "त्या"ने आमच्या समोर मांडले तर कधी अव्यक्त रूपाने , भावभावनांच्या नात्यांतून , रंगातून , ते मांड्ले. ज्याच्या बोलांत वर्ते भगवंत ह्याचाच मला भावलेला अर्थ म्हणजेच "तो" हाच आमचा भगवंत आणि अशा "त्या" भगवंतालाच तर अगम्य , अशक्य , अज्ञात, अप्राप्य असे ह्या विश्वांत काही नसतेच ना? मलाच ही "त्या" साईची वाणी समजून घेता आली पाहिजे. सामान्यपणे माणसाला वा असुरांना वा अन्य कोणाही सजीवाला जीवनांत काही न काही प्राप्त करून घ्यायचे असतेच ना आणि
ते अप्राप्य असते म्हनून तर सर्व खटाटोप चालू असतो. मग असा कोण आहे ज्याला ह्या विश्वांत अप्राप्य असे काहीच नाही , तर Yes "तो" आहे माझा एकमेव भगवंत , माझा देव , माझा साईच ! हो माझ्या साईबाबांना  ह्या जगात अज्ञात असेही काही नाही .मानवाच्या वा जीवाच्या असंख्य जन्मांचा एकमेव सांगाती - "तो" काय फक्त "महासाधुसंत ह्या शब्दाने व्यापता येऊ शकतो का तर मुळीच नाही . "तो" अनादी, अनंत , अगम्य , वेदही ज्याला "नेति नेति" मह्णून थकले असा "तो" हेमाडपंताची ही मोठी लबाडी आहे की ते शब्दांच्या अतर्क्य शैलीतून आम्हांला "त्या"चे अगम्य रूपाचे विवीध पैलू दावतात उलगडून तरीही "त्या"चीच मर्यादा पाळून , बंधन पाळून , कुठेही directly "त्या"च्या इच्छेनुसार तुमचे कर्मस्वातंत्र्य अबाधित राखून , तुम्हाला कोणताही दबाव आणून "त्या"ला देव म्हणा , भगवंत म्हणा असे न सांगता सहज रीत्या, प्रेमाने गळी उतरवितात - हा संतापेक्षाही वेगळा, हा साधुंहून निराळा, हा गुरु हून निराळा, हा महासाधुसंताहून आगळा - हाच "तो" नाही का बरे?

हा भगवंत असाच आहे करून सवरून नामानिराळा राहणारा , "तो" मी नव्हेच असे सांगणारा म्हणूनच "तो" मनमोहन, जगाला भुलवितो सांगून "संत माझ्या सचेतन मूर्ती " 


संदर्भ :
           १. एकनाथी भागवत 
           २. श्रीसाईसच्चरित

Tuesday, 17 January 2017

साईबाबा के सच्चे श्रध्दावान की पहचान ।

हरि ॐ. 

                                                   ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम: । 

मेरे सदगुरु साईनाथ, मेरे साईबाबा  के ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ मिलाना यही  साईबाबा के सच्चे श्रध्दावान की पहचान हो सकती है इसका पाठ हमेशा से ही श्रीसाईसच्चरित का हर एक अध्याय पढाता ही है । हेमाडपंतजी अपने खुद के आचरन से ही हमें यह सींख देतें हैं कि बाबा के ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ कैसे मिलाना है ।  साईबाबा की धूलभेट के तुरंत बाद ही साठे जी के मकान में गोविंद रघुनाथ दाभोलकरजी (इस श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ के लेखक महोदय ) ने गुरु की आवश्यकता क्या ? इस विषय पर तात्यासाब नूलकर जैसे महान साईभक्त से बहस  की थी रात में और सुबह ही साईनाथजी से भेंट के उपरांत ,उन्होंने दाभोलकरजी का उपहास करके उन्हे "हेमाडपंत" नाम से संबोधन किया था ।  अर्थात सब के अंतर्यामी  साईबाबा ने दाभोलकरजी को उनके भूल का एहसास करवा दिया था, पर बाद में जिंदगी भर दाभोलकरजी इस बात को भूला नहीं पाए थे ।  मेरे सदगुरु साईबाबा ने मुझे मेरी गलती का एहसास दिलाकर जो भी नाम मुझे दिया है वो ही मेरा सच्चा नाम है , मुझे मेरे साईबाबा के ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ मिलाना ही है , चाहे कोई भी हालात हो । इसिलिए दाभोलकरजी ने साईबाबा की मुलाकात के बाद हेमाड्पंत यही नाम स्विकार किया , अपनी आगे की पूरी जिंदगी में ।

जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में साईबाबा के ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ मिलाया वही  हेमाडपंत हमें बतातें हैं कि बाबा ने कहा कि आज ये उपासना करनी है कि तब हमें बिना जिझक, बिना कुछ सोचे बाबा को तुरन्त जी कहना ही है।  वही हेमाडपंत जी हमें खुद के आचरण से यह बात बार बार दिखलातें भी हैं कि बाबा ने कहा दफ्तर रखो तो मैंने दफ्तर रखना शुरु किया, बाबा ने ग्रंथ लिखने को कहा तो मैंने अपनी काबिलयत को बिना सोचे बाबा का कहना मानकर ग्रंथ लिखना आरंभ कर दिया, बाबा ने कहा शामा के पास जाकर १५ रुपये दक्षिणा लेकर आओ तो तुरंतही साईबाबा के चरणों की सेवा छोडकर हेमाडपंतजी शामा के घर चले गए , इतनाही नहीं बल्कि साईबाबा ने सपने में अध्याय ४० में संन्यासी रूप में आकर बताया कि आज दोपरह होली के दिन मैं तुम्हारे घर  भोजन करने आऊंगा , तो हेमाडपंतजी ने अपनी पत्नी से साईबाबा के लिए जादा खाना बनाने के लिए बेजिझक कहा भी था , ना तो रिश्तेदारोंकी परवाह की थी ना किसीका लिहाज किया था , मेरे साईबाबा ने कहा तो मेरे साईबाबा आज मेरे घर जरूर पधारेंगे भोजन के लिए - अटूट विश्वास था क्यों कि हमेशा सेही उन्होंने अपने साईबाबा के  ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ मिलाना ही सिखा था । 

यही बात हमें साईबाबा के सच्चे श्रध्दावानों के आचरण में भी नजर आती है।  अध्याय २३ में हम पढतें हैं कि साईबाबा ने कहा कि ‘बकरे को काटो’ तो दिक्षितजी ने तुरंत ही ‘जी’ कहा था । काका साहेब दिक्षित जैसे भक्त का नाम लिए बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते, कारण उन्होंने इस ‘जी’ को अपने स्वयं के आचरण में पूरी तरह से घोल लिया था। इस तरह ‘जी’ वाला भक्त हो तब बाबा उसके लिए स्वयं विमान लेकर आते हैं और उसके अंतिम समय को मधुर बना देते हैं। नानासाहेब चांदोरकर से हमें इस ‘जी’ को सीखना चाहिए। बाबा ने ‘ज्ञान’ से पहले अवग्रह करके श्‍लोक का अर्थ समझाते ही नाना ने तुरंत ही ‘जी’ कहा। नानासाहेब स्वयं संस्कृत के सिद्ध विद्वान होकर भी बाबा के उपदेश के प्रति उनके मन में जरा सी भी शंका निर्माण नहीं हुई जब कि आज तक के सभी पाठों में अवग्रह नहीं था। यह बात उन्हें पूर्णरुप से पता थी। फिर भी बाबा के उपदेश के प्रति उनके मन में जरा सी शंका पैदा नहीं हुई, उन्होंने तुरन्त हा ‘जी’ कहकर उस बात का स्वीकार कर लिया। हम मात्र नाना द्वारा कही गई यह बात सच है या झूठ, इसी झमेले में फँस कर रह जाते हैं।

हमारी जिंदगी में हम लोग अकसर साईबाबा की भक्ति तो करतें हैं , साईबाबा के मंदिर में जातें हैं , साईबाबा के नाम की माला जपतें है पर क्या हम यह बात कभी सोचतें हैं कि क्या मैं सही माईने में मेरे साईबाबा ने बताए हुए राह पर चल रहा हूं या नहीं , क्या मेरा बर्ताव , मेरा आचरण मेरे साईबाबा को पसंद है भी या नहीं ? राधाबाई को साईबाबा ने  उपवास करने से मना किया था , साईबाबा ने ३२ वे अध्याय में खुद के गुरु की कथा बताते हुए भी यही बात दोहरायी थी कि खाली पेट कभी भी भगवान की प्राप्ती नहीं हो सकती । फिर भी मैं हर गुरुवार को साईबाबा के नाम से ही उपवास रखता हूं , क्या यह मेरी बात से मेरे साईबाबा प्रसन्न होतें होंगे या नहीं? मेरे साईबाबा ने तेंडूलकरजी की पत्नी सावित्रीबाई के साथ वैद्यकीय पाठशाला में पढकर भी जोतिष्य की भविष्य़ बाणी सुनकर परीक्षा में न बैठने का निर्णय लेनेवाले उनके लडके बाबू को समझाया था कि जोतिष्य पर विश्वास ना रखें । फिर भी हमारे काम ना होने पर हम जोतिष्यों के पास हमारा भविष्य पूछने भागतें हैं , तो क्या हमारे साईबाबा हमसे नाराज नहीं होतं होंगे कि मेरे बच्चे मेरी दिखायी राह पर चलते नहीं और मेरी ‘हाँ’ में ‘हाँ‘ मिलाने के बजाय अपनी ‘हाँ’ में ‘हाँ‘ मिलाते रहते हैं और दु:खी होते रहतें हैं ।

मेरी भी आंखे इसके बारे में एक अच्छा लेख पढने के बाद खुल गयी , शायद मेरे साईबाबा ने ही मुझे सच्चे श्रध्दावान की पहचान से वाकिफ करवाया था ।  आप सारे साईबाबा के भक्तों से मैं यह बात बांटना चाहती हूं कि आप भी जान लिजिए कि साईबाबा से कैसे जुडना है ।हमें  कैसे साईबाबा के जी में हां जी मिलाना चाहिए ।    
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part2/
      
बाबा को ‘जी’ कहने की बजाय स्वयं के ही ‘हाँ’ में ‘हाँ‘ मिलाते रहते हैं। स्वयं के ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते रहने से ही हम काल के चक्र में फँस जाते हैं। बाबा को यदि हम ‘जी’ कहते तो हमें बाबा का सामीप्य प्राप्त करते हैं, जो स्वयं की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते रहता है, वह सदैव ‘चिन्ताग्रस्त’ रहता है और जो बाबा को ‘जी’ कहते रहता है, उसकी चिन्ता बाबा करते है उसे चिंता कभी नहीं सताती। 

चलिए फिर इस नये वर्ष की शुरुवात से ही हम अपने साईबाबा के सच्चे श्रध्दावान बनने का प्रयास करेंऔर सिर्फ हमारे साईबाबा  के ’हाँ ’ में ’हाँ  जी’ मिलाना सिखें और फिर हमारा बेडा तो हमारा साईबाबा पार लगा ही देगा - १०८% सही !

हेमाडपंतजी हमें ग्वाही देतें हैं कि
प्रयत्न करणे माझे काम । यशदाता तो मंगलधाम ।
अंती तोचि देईल आराम ।  चिंतेचा उपशम होईल ।

हरि ॐ .

Saturday, 17 December 2016

मेरे साईबाबा का आचरण - आत्मनिर्भरता का सबक ।

हरि ॐ

ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम:।

मेरे साईबाबा का आचरण - आत्मनिर्भरता का सबक ।

हाल ही में  १६ दिसंबर को हमारे पूरे भारत देश में विजयदिवस मनाया गया । १९७१ साल  में इसी दिन (१६ दिसंबर ) हमारे भारत देश  ने पाकिस्तान को हराकर इतिहास रचा था। आज ही के दिन हमारे सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग करके एक नए राष्ट्र को जन्म दिया था। आज यह नया राष्ट्र बंग्लादेश के नाम से जाना जाता है। इसी उपलक्ष्य में हर साल इस दिन को भारत में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।  



१९७१  के युद्ध में पाकिस्तानी सेना भारतीय फौजों के सामने सिर्फ १३ दिन ही टिक सकी। इतिहास की सबसे कम दिनों तक चलने वाली लड़ाइयों में से एक इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान के करीब ९३ हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था।

आधुनिक सैन्य काल में इस पैमाने पर किसी फौज के आत्मसमर्पण का यह पहला मामला था। इस युद्ध में विजय के बाद पाकिस्तान की सेना ने बिना किसी शर्त के समपर्ण किया, १९७१ में हुए इस युद्ध में हमारे देश की तीनों सेनाओं ने संयुक्त ऑपरेशन चलाया था।



विजय दिन की बात चलती है , तो साथ ही में याद आता है २६ जुलाई ! हर साल २६ जुलाई को कारगिल दिन के रूप से मनाया जाता है , आज से सतरह साल पहले १९९९ में कारगिल में घुसपैठी हुई थी और हमारे जवानोंने जान की बाजी लगाकर ओपरेशन विजय में कामयाबी हासिल की थी। यह दिन हमेशा हमें आत्मनिर्भरता का पाठ उचित समय में सिखना कितना आवश्यक है इसकी याद दिलाता है।  
    
नेवीगेशन सिस्टम के लिए आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए काफी मायने रखती है। एक रिपोर्ट के अनुसार देशी नेवीगेशन सिस्टम आम आदमी की जिंदगी को सुधारने के अलावा सैन्य गतिविधियों,  आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी उपायों के रूप में यह सिस्टम बेहद उपयोगी होगा। खासकर १९९९ में सामने आई कारगिल जैसी घुसपैठ और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से इसके जरिये समय रहते निपटा जा सकेगा। यह बताया जाता हैं कि कारगिल घुसपैठ के समय भारत के पास ऐसा कोई सिस्टम मौजूद नहीं होने के कारण सीमा पार से होने वाले घुसपैठ को समय रहते नहीं जाना जा सका। बाद में यह चुनौती बढ़ने पर भारत ने अमेरिका से जीपीएस सिस्टम से मदद मुहैया कराने का अनुरोध किया गया था। हालांकि तब अमेरिका ने मदद मुहैया कराने से इनकार कर दिया था। उसके बाद से ही जीपीएस की तरह ही देशी नेविगेशन सेटेलाइट नेटवर्क के विकास पर जोर दिया गया, और अब भारत ने खुद इसे विकसित कर बड़ी कामयाबी हासिल की है । इसीके फलस्वरूप नेवीगेशन सिस्टम की आत्मनिर्भरता का महत्व उजागर हुआ और आज हमारा अपना भारतीय जीपीएस दुनिया में नाविक के नाम से जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदीजीने कहा कि सालों से मछुआरे और नाविक चांद-सितारों की गति से समुद्र में यात्राएं करते थे। यह उपग्रह उनको समर्पित है। 

मिसाईल मैन जिनकी पहचान है - हमारे भूतपूर्व प्रेसिडेंट ए.पी.जे. अब्दुल कलामजी ने भी हमें आत्मनिर्भरता की सींख हमेशा दी है  ।


आत्मनिर्भरता की  बात से साईबाबा के आचरण की याद आई कि कैसे हमारे सदगुरु हमें जिंदगी के जरूरी चीजोंका सबक अपने खुद के ही आचरण से देतें हैं।





श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ में हेमाडपंतजी पहले अध्याय में हमे साईबाबा के गेहू पिसने की कथा बतातें हैं । ऐसे तो साईबाबा के कितने सारे भक्त उस वक्त शिरडी गांव में मौजूद थे, अगर बाबा किसी भक्त से गेहू पिसकर आटा बनाकर देने के लिए कहते , तो क्या कोई भक्त नहीं देता था ? किंतु मेरे साईनाथ तो पूरी दुनिया को अपने आचरण से अच्छी बातों का सबक सिखलाने के लिए हमेशा तत्पर रहतें थें , तो भला बाबा क्यों कहेंगे किसी से अपना काम करने के लिए ? इसिलिए साईबाबा ने खुद ही गेहू पिसना शुरु किया था । वैसे भी हम देखतें हैं कि साईबाबा अपनी कफनी खुद सितें थे, चाहे ५० हो या १०० लोगोंका खाना पकाना हो तो भी साईबाबा खुद दाल, चावल , सब्जी लातें थे. नमक , मरची. तेल आदी मसाला भी खुद अपने हाथोंसे खरीदकर , पिसतें भी थें ।

यानि ये अनंत कोटी ब्रम्हांडो का राजाधिराज होकर भी अपने काम खुद करने की , आत्मनिर्भरता की सींख हमें अपने बच्चोंको खुद के आचरण से देता था ।
इसी कथा से उन्होंने हमें सिखाया की चाहे सांसरिक जिंदगी हो या अध्यात्म हो हर ईंसान को आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है। इसी साईबाबा के आत्मनिर्भरता के पाठ के बारे में एक लेख मैंने पढा और मेरे साईबाबा के अकारण प्यार, उनकी अनगिनत कृपा  का एक नया एहसास हुआ और मेरा साई मेरे लिए खुद कितना कष्ट उठाता था यह जानकर आंखे नम हो गयी । हमारे साई की हर एक बात हमें कोई ना कोई सींख जरूर देती है । आप साईभक्ती का , साईरस का पान यह लेख पढकर करने मत भूलिएगा ।
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay1-part38/

उस लेख में लेखकने मेरे साईबाबा की अनेक बातोंसे आज मुझे परिचीत करवाया और साईबाबा के चरणों में अधिक प्यार से मैं जुड गयी, शरणागत बन गयी । साईमहिमा का आनंद जितना उठायें उतना कम ही है , तो चलिए आनंद की ओर बढतें हैं ...
   
ओम साईराम

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

Samirsinh Dattopadhye 's Official Blog