Friday, 5 May 2017

मेरे सदगुरु श्रीसाईनाथ का निजकर याने श्रीसाईसच्चरित का निर्माण - हेमाडपंतजी का एहसास !

ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय़ नम: । का

श्रीसाईसच्चरित यह एक महान अपौरूषेय ग्रंथ है । अपौरूषेय ग्रंथ याने परमेश्वर के आविष्कार से जो ज्ञान अपने आप सहजता से प्राप्त हो जाता है और उस ज्ञान से जो ग्रंथ निर्माण होता है ऐसा ग्रंथ ! चारो वेद , श्रीमद्भगवद्गीता , भागवत , ज्ञानेश्वरी , श्रीसाईसच्चरित ये सारे अपौरूषेय ग्रंथ है ।

हेमाडपंत पूर्णत: विनयशील थे और ‘इस संपूर्ण चरित्र के कर्ता एवं करवाने वाले मेरे सद्गुरु श्रीसाईनाथ ही हैं’ इस बात का पूरा-पूरा एहसास उन्हें था। इसिलिए हेमाडपंत  बार बार यह बात दोहरातें हुए नहीं थकतें हैं कि श्रीसाईसच्चरित यह मैंने नहीं लिखा बल्कि मेरे सदगुरु श्रीसाईनाथ ने ही लिखवाया  है मुझसे , मेरे साईबाबा का निजकर मेरे सिर पर था इसिलिए यह ग्रंथ लिखा गया ।

हेमाडपंतजी  के मन में कभी भी यह बात नहीं आयी कि यह  ग्रंथ मैं खुद लिख रहा हूं ।सत्य एवं वास्तव की स्मृति हेमाडपंत के मन में कितनी जागृत है, यह बात श्रीसाईसच्चरित के एक लेख को पढकर समझने में आसानी हो जाती है -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part17/


अध्याय २ में हेमाडपंत लिखतें हैं -
‘साधु संत अथवा श्रीहरि। किसी श्रद्धावान का हाथ पकड़कर ।
अपनी कथा स्वयं ही लिखते हैं। अपना हाथ उसके सिर पर रखकर॥

ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय़ नम: ।

इस ओवी के बारे में उपर निर्देशित लेख में लेखक महोदय बतातें हैं कि ‘निजकर सिर पर रखकर’ (अपना हाथ उसके सिर पर रखकर) इस बात का अनुभव हेमाडपंत को अच्छी तरह स हो चुका था। जब तक उस साईनाथ का हाथ मेरे सिर पर है, तब तक मेरी लेखनी चलती रहेगी। केवल लेखनी ही नहीं बल्कि मेरा हाथ, मन एवं बुद्धि इन्हें भी वे ही चलानेवाले हैं; इसीलिए ‘सद्गुरु साईनाथ का मेरे सिर पर रहनेवाला हाथ’ यही इस चरित्र-लेखन की सच्चाई है।

यहां पर लेखक हमें संत ज्ञानेश्‍वरजी की कथा सुनाकर दिखलातें हैं कि  परमात्मा का निज-कर (अपना हाथ) कैसे होता है?
संत ज्ञानेश्‍वरजी का उपहास करना चाहनेवाले कुछ लोगों ने ज्ञानेश्‍वर को उन्हीं के नाम का भैंसा दिखलाकर ‘इसका नाम भी ज्ञाना है, तो क्या यह भैंसा वेदमंत्रों का उच्चारण कर सकेगा?’ इस प्रकार का प्रश्‍न किया।
ज्ञानेश्‍वरजी ने अपनी कृति से ही उन्हें उत्तर दिया। जिस पल उस भैंसे के सिर पर ज्ञानेश्‍वरजी ने अपना हाथ रख दिया, उसी क्षण वह भैंसा वेदों की ऋचाओं का पाठ करने लगा। परन्तु यह तब तक ही होता रहा जब तक उस भैंसे के सिर पर संत ज्ञानेश्‍वर का हाथ था। जिस क्षण उन्होंने उस भैंसे के सिर पर से अपना हाथ उठा लिया, उसी क्षण उस भैंसे का बोलना बंद हो गया।

यही है उस परमात्मा का निजकर और यह कथा निश्‍चित ही हेमाडपंत को अच्छी तरह से याद थी। इसीलिए साईनाथ ने उनके सिर पर रखे हुए अपने निज-कर का यानी साई के हाथ का हेमाडपंत को सदैव स्मरण रहा।

हेमाडपंत कभी भी अंहकार से या गर्व से श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ मैंने  लिखा ऐसे कहते हुए हमें पूरे श्रीसाईसच्चरित में , पूरे के पूरे ५२ अध्यायों में एक बार भी नजर नहीं आता , बल्कि वो हर बार इसी बात को बताते हैं कि मेरे साईनाथ ने मेरा हाथ पकडकर , मुझे अपनी कलम बनाकर यह ग्रंथ लिखवाया है ।
साईनाथ ही स्वंय लिखनेवाले भी है , और लिखवा लेनेवाले भी है यह हेमाडपंत की भावना है और उसे वह अध्याय ३ में बयान करतें हैं -
कैसा बजेगा पावा या पेटी इस की चिंता मैं नहीं करता , बल्कि यह चिंता मेरे साईनाथ करतें हैं ।

अध्याय ३२ में हेमाडपंत लिखतें हैं -
हेमाड साईंसी शरण । अपूर्व हें कथानिरुपण । 
साईच स्वयें करी जैं आपण । माझें मीपण फिकें तैं ।। १६९।।
तोच या कथेचा निवेदिता । तोच वाचिता तोच परिसता । 

तोच लिहिता आणि लिहविता । अर्थबोधकताही तोच ।।१७० ।।
साईच स्वये नटे ही कथा । तोच इये कथेची रुचिरता । 

तोच होई श्रोता वक्ता । स्वांनदभोक्ताही तोच ।। १७१ ।।
अध्याय ४० में हेमाडपंत लिखतें हैं -
तोचि कीं साई अनुमोदिता । तोच तो माझा बुध्दिदाता ।
तोच मूळ चेतना चेतविता । तयाची कथा तोच करी ।। १३।।
कीं हा हेमाड निजमतीं । रचितो हा विकल्प न धरा चित्तीं । 

म्हणोनि श्रोतयां करितो विनंती । गुणदोष माथीं मारूं नका ।।१४ ।।
गुण तरी ते साईचे । दोष दिसलिया तरीते त्याचे । 

मी तो बाहुलें साईखड्याचें । आधारीं नाचें सूत्राच्या ।। १५।।
सूत्रधाराहातीं सूत्र । त्याला वाटेल तें तें चित्र ।

रंगीबेरंगी अथवा विचित्र । नाचवील चरित्रसमन्वित ।। १६ ।।

स्पष्ट्ता से हेमाडपंत इसी बात को उजागर करतें हैं कि साईनाथ ने ही मुझे अनुमोदन दिया ग्रंथ लिखने के लिए, साईनाथ ही मेरे बुध्दी में मैं क्या लिखूं इस बात को दाता बनाकर प्रदान करतें हैं , वो ही मुझ में ग्रंथ लिखने की चेतना जागृत करवातें हैं , श्रीसाईनाथ जी खुद ही अपनी कथा आप बता रहें हैं , इसिलिए हेमाडपंत अपनी मती से  , अपनी बुध्दि से लिख रहें हैं ऐसा विकल्प अपने मन में तनिक भी आने मत दिजिए । मैं तो सिर्फ मेरे श्रीसाईनाथ के हाथों की कठपुतली हू , वो मुझे जैसे नचाने चाहतें हैं वैसे ही मैं नाचता हूं , उनके सूत्रों के अनुसार ।

और यही है उस सत्य एवं वास्तव को देखने की हेमाडपंत की दृष्टि। परमात्मा का निजकर सिर पर पड़ते ही जब भैंसा भी बोलने लगता है, तो वहाँ मनुष्य का बोल सकना यह स्वाभाविक बात है, इसका हेमाडपंत को सदैव स्मरण था और इसीलिए बाबा ने हेमाडपंत से स्वयं का चरित्र लिखवाया।

ॐ साईराम .

Saturday, 29 April 2017

साईकथा सुनते ही - जीवोंका तत्काल दुर्दिन हर जाए !

                                                         ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय़ नम: ।

हेमाडपंतजी श्रीसाईनाथ की कथाओंका , उनकी लीलाओं का बखान करते बिलकुल नहीं थकतें हैं। वो बार बार हम श्रोताओं को समझाते हैं कि मेरे साईबाबा की सिर्फ कथाएं भी सुन लो तो आप के कर्म पाश भी टूट जातें हैं सिर्फ मेरे साईबाबा की अगाध कृपादृष्टी से  और  साथ में आप की बुध्दी को मेरे साईबाबा की करूणा मयी  दृष्टी से बुध्दी भी सुप्रकाशित हो उठती है ,और तो और श्रवण करनेवाला सभी सुख निर्विशेष रूप से पाता है।                                                                                                                                                                                                            

श्रवणार्थियों का कर्मपाश। तोड़ देती हैं ये कथाएँ विशेष।
बुद्धि को देती सुप्रकाश। निर्विशेष सुख सकल॥

जब मैं यह पढती थी तो इस साईबाबा के कथा श्रवण का इतना गहरा महत्त्व समझ में नहीं आया था अब तक । पर जब मैंने इस ओवी के अर्थ के बारे में एक
मेडीया पर एक लेख पढा तो सोच में डूब गयी । 
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part16/
इस लेख में लेखक महोदयजी बता रहें हैं कि 

 श्रीसाईसच्चरित की कथाएँ भाविक श्रोताओं के कर्मपाश तोड़ देती हैं, प्रारब्ध का नाश कर देती हैं। इन कर्मपाशों को यानी कर्मबंधों को ये कथाएँ ‘अशेष’ रूप से तोड देती हैं अर्थात् एक भी पाश को बाकी नहीं बचने देती हैं।
यह पढतें ही याद आयी ३४ वे अध्याय में पढी हुई नाशिक जिले के मालेगांव नामक एक ग्राम में रहनेवाले एक डॉक्टर की कथा ।  उसके नन्हे से  भतीजे को हाड्याव्रण नामक बहुत ही दुर्धर ( जल्दी न ठीक होनेवाली ) बीमारी ने जकड लिया था ।  वो स्वंय एक डॉक्टर था और उसका दोस्त भी डॉक्टर था , किंतु वो उस बीमारी की दवा दे नहीं पाया । देश विदेश के सारे उपचार करवाएं , सारे देव देवताओं के , कुलस्वामी के हाथ पैर जोडने पर भी कुछ रास्ता नहीं मिला और फिर किसी ने शिरडी के साईबाबा के बारे में बताया और उस अवलिया के पास उस भतीजे को लेकर उसके मां -बाप गए और फिर उस नन्हे लडके की बीमारी को  साईबाबा ने सिर्फ पैर के उपर से अपना हाथ फेरकर बिना किसी दवा के अपने बचनों से ठीक किया था । बाद में उस हाड्याव्रण की जख्म पर बाबा ने दी हुई उदी से ही सब कुछ ठीक हुआ था । अब साईबाबा की इस लीला को उस डॉक्टर  ने सुना था मालेगाव में और साईबाबा को मिलने जाने का तय भी किया था । किंतु बाद में उस डॉक्टर के मन में किसी ने साईबाबा के बारे में कुछ (गलत बात ) बताकर विकल्प डाल दिया था । तो वो डॉक्टर ने साईबाबा के दर्शन को जाने का अपना बिचार छोड दिया और आगे मुंबई चला गया ।  पर देखिए साईबाबा की कथा सुनी है तो साईबाबा ने खुद ही उस डॉक्टर के प्रारब्ध वश उसे साईबाबा को मिलने में जो बाधा पैदा हो गयी या रूकावट आ गयी उसको दूर किया याने उस डॉक्टर के कर्म पाश तोडकर उसे सपने में अशरीर वाणी से अपने पास बुलावा भेजा ।

हेमाडपंतजी और भी एक बात पर गौर फर्मातें हैं कि मेरे साईबाबा की ये कथाएँ बुद्धि को सुप्रकाश देती हैं अर्थात् इनके माध्यम से वह वरेण्य भर्ग ( पापदाहक तेज  )बुद्धि को प्राप्त होता है। और यह पापदाहक तेज बुद्धि के द्वारा मन में प्रवेश करके पापों के बीजों को जला डालता है। वैसे तो परमेश्‍वरी ‘भर्ग’ इस ऐश्‍वर्य को प्राप्त करना इतना आसान नहीं है; परन्तु श्रद्धावानों के लिए साई की कथाओं का सहज सरल मार्ग ही यह भर्ग प्राप्त करवाने वाला होता है। पापबीज और पापों के परिणाम इस प्रकार के पाप-समुच्चय का नाश इस परमेश्‍वरी भर्ग से ही होता है। मालेगाव का वो डॉक्टर साईबाबा की कथा सुनकर भी जान नहीं पा रहा था, साईबाबा की महानता को नहीं स्मझ पा रहा था , साईबाबा के इशारे का अर्थ नहीं समझ पा रहा था  तब साईबाबा ने उसकी बुध्दी को सुप्रकाशित 
 करने के लिए लगातार तीन रात को वोही बाणी उसे सुनाई दी गयी "अभी तक मुझपर अविश्वास है क्या आपका ? " बाद में उसी डॉक्टर के  एक बीमार मरीज को ठीक करवाने का उसका बिचार सत्य में परिवर्तित करके उस डॉक्टर को साईबाबा ने अपने पास खिंचकर बुला लिया । याने साईबाबा ने सिर्फ उनकी कथा सुनने पर डॉक्टर के सारे कर्म पाश तोड दिए थे , एक पाश भी बाकी बचने नहीं दिया था ।           

हेमाडपंत हमें पूरे विश्‍वास के साथ बता रहे हैं कि मेरे साईनाथ की कथाओं का भावपूर्वक श्रवण करने से यह भर्ग - पाप का नाश करनेवाला परमेश्वरी तेज से साईनाथ हमारी झोली आसानी से भर देतें हैं ।  हेमाडपंतजी बदे प्यार से हमें यह भरोसा देतें हैं कि हर एक को निर्विशेष सुख, शाश्‍वत सुख अर्थात आनंद की प्राप्ति करवाने वालीं ऐसी ये कथाएँ हैं। इन कथाओं का यह सहज, सुंदर, आसान मार्ग ही हम जैसे सभी सामान्य मानवों के लिए उचित है। हेमाडपंत ने इन कथाओं की महिमा का अनुभव लेकर उन्हें समझकर ही साईसच्चरित की रचना हम सब श्रध्दावानों के लिए करने का निश्‍चय किया था । 

हेमाडपंत आगे बतातें हैं कि मेरे साईबाबा के नाम के चार अक्षर भी क्या कुछः नहीं कर सकतें ?  

‘कान में पड़ते ही चार अक्षर। तत्काल ही जीवों का दुर्दिन जाये हर।
संपूर्ण कथा सुनते ही सादर। भावार्थी तर जाये भव पार।’


‘साईनाथ’ ये चार अक्षर और कथा के चार अक्षर कानों में पड़ते ही तत्काल जीवों का दुर्दिन टल जाता है। अर्थात इस कथा के चार अक्षर कानों में पड़ते ही प्रारब्धभोग अर्थात कठिन काल दूर हो जाता है, प्रारब्ध का अंधकार दूर हो जाता है।
भीमाजी पाटील ने अपने दोस्त नाना चांदोरकरजी का कहा माना और साईनाथ इस चार अक्षर को अपनी दवा मानकर चले आए शिरडी तो साईबाबा ने भी तत्काल उस बीमार , दुखियारे , जीव का दुर्दिन हर दिया था ।  

उपर बताए गए लेख में लेखक महोदय इस बात को सुस्पष्ट करके दिखलातें हैं कि
दुर्दिन इस शब्द का अर्थ है- दिन के होते हुए भी अंधकारमय स्थिति का हमारे जीवन में होना । इस साईरूपी सूर्य के सामने होते हुए भी हम ही अपने प्रारब्ध के कारण, अपने अहंकार के कारण अपने जीवन में अंधकार उत्पन्न करते हैं। हम मन के सारे दरवाज़े बंद करके, प्रकाश को अपने से दूर कर देते हैं। इस कथा के चार अक्षर कानों में पड़ते ही सारे के सारे दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं और प्रकाश के कारण सब कुछ प्रकाशित हो उठता है। फ़िर पूरी कथा सुनने पर अन्य अवरोध भी दूर हो कर साईनाथ के गोकुल में, तेज:लोक में प्रवेश अवश्य ही मिलता है अर्थात भावार्थी भव से पार हो जाता है। सर्वसामान्य जीवात्मा, जो अपना उद्धार चाहते हैं, उनके लिए साईनाथ ने ही भवसागर के पार ले जाने वाले इस मार्ग को हेमाडपंत के माध्यम से प्रकाशित किया है।

मालेगाव के डॉक्टर ने भी इस बात का अनुभव किया और वो विजापूर में प्रमोशन लेकर चले गए ।

१३ वे अध्याय में पढी हुई भीमाजी पाटील की कथा यही  बात को साबित करती है -
जुन्नर के नारायण गाव में  रहनेवाले भीमाजी पाटील - जिन्हें क्षय ( टी. बी. ) की बीमारी ने पूरी तरह जकड लिया था ।  सभी प्रकार के बैद्यजी से दवा हो गयी थी, देवी देवताओं की मन्नत मांग चुके थे , पर कोई भी राह नहीं मिल रही थी और वे अपनी जिंदगी से ऊब गए थे । ऐसे में उन्हें अपने दोस्त नानासाब चांदोरकरजी की याद आती हैं ।  बस्स वो ही पल उनके लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण बन जाता है ।  अर्थात साईबाबा के परम भक्त रहनेवाले नानासाब चांदोरकर उन्हें तुरंत ही शिरडी आकर उनके सदगुरु साईबाबा के दर्शन लेने की सलाह देतें हैं ।  जैसे ही भीमाजी शिरडी में साईबाबा के दर्शन लेतें हैं और साईबाबा की वाणी उनके अपने ही मुख से सुनतें हैं वैसे ही भीमाजी की व्यथा का हटना शुरु हो जाता है ।  हर पांच मिनट में मुंह में आनेवाला खून का नामोनिशान मिट जाता है ।  इतना ही नही वो अपने पैरों पर खुद चलकर जा सकें ।

भीमाजी की कथा हमें दिखलाती हैं कि उनके जीवन में मौत का खोंफ छा गया था , कोई भी इलाज न होने के कारण उनका जीवन अंधकार से घिर गया था और साईबाबा ने उन्हें उनका जीवन लौटाकर जीने की नई उम्मीद से उनका जीवन सुप्रकाशित किया था ।

हम भी श्रीसाईसचरित की साईबाबा की कथाएं पढकर हमारा जीवन सुख , शांती , तृप्ती और समाधान से भर सकतें हैं जरूर १०८ % सही मायनो में !    

Monday, 24 April 2017

अनंता तुला रे कसे रे स्मरावे।अनंता तुला रे कसे रे नमावे ।।

अनंता तुला रे कसे रे स्मरावे ।। अनंता तुला रे कसे रे नमावे ।।
अनंत मुखांचा शिणे शेष गाथा । नमस्कार साष्टांग श्रीसाईनाथा ।। १ ।।

खरेतर श्री मोहनीराज पंडित ह्यांनी लिहिलेल्या नमनाष्टकाची ही प्रथम ओवी , जी शिरडीनिवासी सदगुरु श्रीसाईनाथांसाठी आहे. परंतु  सदगुरुतत्त्व हे अनादि, अनंत आणि कायम एकच असते. त्यामुळे सदगुरु साईनाथांसाठी लिहिलेल्या ह्या ओवीतही सदगुरु अक्कलकोटनिवासी श्रीस्वामी समर्थ आजोबांचेच दर्शन घडते आणि स्मरतात त्या बखरीमधील कथा ज्या स्वामींच्या अनंतत्वाची खूण पटवितात. 
                                                                
सामान्य माणूस आपल्या पोटापाण्याची खळगी भरताना , उदरनिर्वाहाच्या मागे सतत धावत पळत असतो आणि ह्याच जीवनाच्या रामरगाड्यात त्याला आपल्यासमोर साक्षात परब्र्म्ह अवतरले आहे ह्याचे देखिल ना  भान राहात , ना जाणीव होत , ना अंतरीची खूण पटत मनाच्या तर्क -कुतर्क, वाद-विवाद, शंका-कुशंका ह्यांच्या गदारोळातून ... आणि म्हणूनच जेव्हा जेव्हा "तो" भगवंत , परमात्मा सगुण साकार बनून मानवी रूपाने ह्या वसुंधरेवर अवतरतो तेव्हा तेव्हा सामान्य मानवाला ते पचनी पडणे खूप कठीण होऊन बसते. "तो" दिसतो माझ्यासारखा .माझ्यासारखा चालतो-बोलतो, खातो-पितो, उठतो-बसतो मग मी "त्या" ला कसे बरे माझा परमात्मा, माझा भगवंत , माझा परमेश्वर म्हणून मी स्विकारू हा गहन प्रश्न मानवाच्या मनाला वारंवार पडतच राहतो आणि संभ्रमात टाकीटाच राहतो. पण "लाभेवीण प्रेम " करणारी ही सदगुरुमाऊली इतुकी करुणानिधान असते की आपल्या लेकरांच्या अनंत चुकांना पदरात घालून , जराही न रागावता "ती" भक्तवत्सल सदगुरुमाय आम्हांला आपल्या चरणांशी ठाव देतेच देते, आणि आपल्या क्षमेच्या , अकारण कारूण्याच्या , अगाध प्रेमाच्या पदरात घेतेच घेते.

अक्कलकोटचे श्री स्वामी समर्थ (प्रकटकाल : इ.स. १८५६-१८७८)

आज २४ एप्रिल २०१७ -  मराठी कॅलेंडर मध्ये आज श्रीअक्कलकोट स्वामी महाराज पुण्यतिथी अशी नोंद आहे. अक्कलकोट निवासी, सद्गुरु दत्त अवतारी श्री स्वामी समर्थ महाराजांच्या १३९ व्या पुण्यतिथी उत्सवाची बातमी वाचली आणि जाणवले ते परम सत्य ! वास्तविक पाहता इसवी सन १८७८ मध्ये स्वामींनी समाधिस्त होऊन आपला सगुण साकार अवतार संपविला असे भासवले, परंतु आजतागायत प्रत्यक्षात स्वामी भक्तांच्या पाठीशी सतत उभे राहून, भक्तांना "हम गया नही जिंदा है " याच आपल्या अभिवचनाची प्रचिती सातत्याने  देत आहेत.

" अनसूयो अत्रिसम्भूतो दत्तात्रेयो दिगंबरा | स्मर्तुगामी स्वभक्तानां उध्दरता भवसंकटात् ||"
शरणागतवत्सल, प्रणतपाळ, भक्तवत्सल असा "तो  परमात्मा " आपल्या भक्ताने स्मरण करताच धावून येतोच , नव्हे नव्हे "तो" स्मरणासवेच प्रकटतो - अशी समर्थांची ख्याती भक्तगण आजही अनुभवीत आहेत आणि म्हणूनच येथे आवर्जून स्मरते  ती संत एकनाथांची अभंग रचना -

"तुज सगुण म्हणू की निर्गुंण रे सगुण निर्गुण तूचि गोविंदु रे"

देहात राहून सगुण साकार स्वरूपाने विचरो वा निर्गुण निराकार बनून अनंतात विचरो सदगुरु हा कायम आपल्या भक्तांजवळच असतो.

"तेज रुपाने आजही जागृत, स्वामी समर्थ महाराज समाधीत | माथा ठेवुनी साद घालिता झणी मिळतो प्रतिसाद, अवलिया स्वामी समर्थ आजोबा , अवलिया स्वामी समर्थ आजोबा "

अक्कलकोटास श्रीस्वामी समर्थ निवास करीत असताना श्रध्दावान दर्शनासाठी येत आणि पुन्हा "सगुण साकार रूपातील " अवतरलेल्या साक्षात परब्र्म्हाला न जाणून "निर्गुण निराकाराला" भेटण्यासाठी धाव घेत. तेव्हा आपल्या लेकरांची ही वणवण पाहून स्वामी समर्थांचे अंत:करण कळवळत असे. "कुठे शोधिसी रामेश्वर अन कुठे शोधिसी काशी , हृदयातील भगवंत राहिला हृदयातून उपाशी " ही आर्तता आपल्या भक्ताला उमगावी म्हणून स्वामीच मदतीला धावून येत असत.

मंगेश पाडगांवकरांनी मानवाची हीच व्यथा अगदी यथार्थपणे आपल्या गीतातून मांडिली आहे.
झाड फुलांनी आले बहरून तू न पाहिले डोळे उघडून
वर्षाकाळी पाउसधारा तुला न दिसला त्यात इशारा
काय तुला उपयोग आंधळ्या दीप असून उशाशी
कुठे शोधिसी रामेश्वर अन कुठे शोधिसी काशी


सदगुरुमाऊली अशीच कल्पवृक्षापेक्षाही  अमूल्य असे तृप्तीचे , समाधानाचे , सौख्याचे वर्षांवरूपी मेघ
वर्षविण्या सदातुर  होऊन  अचिंत्यदान घेऊन आपल्या उशाशीच उभी असते , पण आपण तिला नाकारून दूर दूर तीर्थक्षेत्री वणवण करीत फिरतो, अशा आपल्या वागण्याने किती कष्टवितो आपण आपल्या सदगुरुरुमाऊलीला ?  ह्याची मात्र आपल्याला तमा नसते ना आपल्या खिजगणतीत असते.

अक्कलकोट स्वामी समर्थांच्या बखरीत हीच गोष्ट आपल्याला प्रकर्षाने आढळते ४५ व्या कथेत . श्री गोपाळबुवा केळकर आपल्याला बखरीतील ह्या कथेतून सांगतात ती परशुराम सेवेकर्‍याची गोष्ट ! एक वेळ परशुराम सेवकरी याचे मनात आलें की आपण काशीस जावें. म्हणून ते श्रींची आज्ञा  घेण्याकरितां श्रींजवळ आले व त्यांनी प्रार्थना केली . श्रींनी उत्तर दिलें,: संतचरणांची माती तीच माझी भागीरथी." हे ऐकून परशुराम ह्यानें काशीस जाण्याचा बेत रहित केला.

परंतु ह्याच कथेत केळकर बुवा म्हणतात की प्रत्यक्ष निधान चोळाप्पाचे घरीं असून चोळाप्पाची तीर्थयात्रा किंवा पिराची शेरणी वाटणें चुकलें नव्हतें . चोळाप्पाची कुलदेवता तुळजापूरची देवी असून , एक वेळ चोळाप्पा कुटूंबासह यात्रेस निघाला. बाळाप्पास आपल्या बरोबर येण्यास त्यानें आग्रह केला. बाळाप्पा हा स्वामींचा नि:स्सीम भक्त असल्या कारणाने श्रींच्या आज्ञेवाचून तो कोणतीही गोष्ट करीत नसे. त्याने चोळाप्पास स्वामींची आज्ञा  घ्यावी म्हणजे आपण येण्यास तयार आहों असे सांगितले. चोळाप्पा बाळाप्पाचा हात धरून स्वामी आजोबांकडे गेला व तुळजापूरास जाण्याविषयीं आ  मागितली. स्वामी म्हणाले," डोंगरावर चढून उकिरडे उकरण्यास जा ." हे ऐकून श्रींची सेवा सोडून तुळजापूरांस जाण्यांत कांहीच अर्थ नाही , असे समजून बाळाप्पा गेला नाही. चोळाप्पा मात्र गेला.
येथे केळकर बुवा म्हणतात कर्म , उपासना ,  न-क्र्माक्र्मानें साधन साधकानें करावें उगीचच ढोंग करून पोट भरणें महाराजांस आवडत नसे.
काय तुला उपयोग आंधळ्या दीप असून उशाशी
कुठे शोधिसी रामेश्वर अन कुठे शोधिसी काशी


आपणही असेच सदगुरुच्या दारी शरण जातो आणि "तो "आपल्या कानी कपाळी ओरडून सांगत असताना "त्या" एकाचे ठायी अनन्य शरणागत होण्याचे सोडून निर्गुण निराकार परमेश्वराला शोधण्याचा अट्टाहास करून ऊर फुटेस्तोवर धावाधाव करतो कधी ह्या देवाच्या दारी तर कधी त्या देवाच्या दारी ! येथे आठवल्या त्या एका अभंगाच्या ओवी " बापूपायी ठेवू एकविध भाव नको धावाधाव अन्य कोठे "! किती सत्य वर्णिले आहे माझ्यासाठी माझा सदगुरुच माझी माय आणि माझा बाप आहे , तर मी कशाला अन्य दारी जाण्याची आटाटी करू ?

केळकर बुवा बखरीमधील ४४व्या कथेत मुंगी -पैठणच्या विठाबाईची गोष्ट सांगताना हेच तत्व प्रतिपादन करतात. ह्या विठाबाई मुंगीपैठणच्या राहणार्‍या अक्कलकोतास श्रींच्या दर्शनास येतात . पंढरपूरास आषाढी एकादशीस जाण्याचा त्यांचा बेत असतो व त्या आपला बेत स्वामींचे सेवेकरी गणपतराव व बाळाप्पा ह्यांना सांगतात , तेव्हा ते दोघेही श्रीसमर्थांची स्वारी राजवाड्यांत असून दर्शन मिळत नसल्याने, बाहेर कंटाळवाणे दिवस काढण्यापेक्षा पंढरीस जावें असा विचार करून जाण्यास तयार होतात. पुढें विठाबाई स्वामींच्या दर्शनास जातात तेव्हा स्वामी विठाबाईच्या तोंडाकडे पाहून म्हणतात ," काय ग , विठोबाचा लंड धरण्यास अजून गेली नाहीस?" तेव्हा बाईस आपली चूक उमगते व ती उघडपणें स्वामींपुढे तशी कबूली देते ," आपण चालतें-बोलतें विठोबा असून मी पंढरीस कशास जाऊं?"  नंतर विठाबाई बाळाप्पा व गणपतराव सेवेकर्‍यांस झालेली हकिगत सांगून पंढरपूरास जाण्याचा बेत रहीत करते.

१६८वी कथा सांगते की एका मराठी साधूस मंगळवेढ्यास स्वामी समर्थांनी दर्शन देऊन सांगितले ,"द्वारकेस जाऊन पैशाच्या आकृतीच्या खापरकुट्या कर, म्हणजे  तुला विठोबा भेटेल ! त्या प्रमाणें तो द्वारकेस जाऊन तसें करू लागल्यावर त्याला भगवंताने तीन वेळ प्रत्यक्ष विठोबाच्या रूपानें दर्शन दिलें

१६९ व्या कथेंतून अलवणीबुवांना जगन्नाथाला स्वामींनी कटीवर हात ठेवून सांगितलेले सत्य वचन की " सर्व स्थानें आमचीच आहेत ! " ह्याच गोष्टीची प्रचिती देतात की सदगुरुंच्या चरणांशीच सर्व तीर्थक्षेत्रे वास करतात. म्हणूनच आधी जराही प्रसिध्दी नसलेले अक्कलकोट श्रीस्वामी समर्थांच्या पदस्पर्शाने पुनीत झाले, पावन झाले आणि मग तेथे यात्रा अहोरात्र वाहू लागली.

तीच गोष्ट शिरडी निवासी साईनाथांची - श्रीसाईसच्चरितात अध्याय २६ मध्ये हेमाडपंत वर्णितात -
दैव शिर्डींचें , म्हणूनि झालें । बाबा तेंथे आगमन आपुलें ।
 पुढें तेथेंचि वास्तव्य केलें । क्षेत्रत्व आणिलें त्या स्थाना ।।२१ ।।
धन्य शिरडीचें सुकृत । कीं हा साई कृपावंत ।
करी या स्थळां भाग्यवंत । अलंकृत निजवास्तव्यें ।। २२।।
ह्याच अध्यायांत हेमाडपंत ह्याचाच पुनरूच्चार करतात -
सन एकोणीसशें दहा सालीं । दासगणूंचीं कीर्तनें झालीं ।
श्रीसाईनाथांची कीर्ति पसरली । यात्रा वाढली शिरडीची ॥५९॥
कुग्राम परी भाग्यें थोर । शिरडी झाली पंढरपूर ।
महिमा वाढला अपरंपार । यात्रा अपार लोटली ॥६०॥ 


अशा ह्या माझ्या सदगुरुंच्या निवासी म्हणजेच शिरडीत , माझ्या साईबाबांच्या पायीच माझी सर्व तीर्थक्षेत्रें आहेत असा भाव हेमाडपंत अत्यंत प्रेमाने वदतात अध्याय ४ मध्ये -
शिर्डीच आम्हां पंढरपूर । शिर्डीच जगन्नाथ द्वारकानगर ।
 शिर्डीच गया काशी विश्वेश्वर । रामेश्वरही शिर्डीच ।।५९ ।।
शिर्डीच आम्हां बद्रिकेदार । शिर्डीच नाशिक - त्र्यंबकेश्वर ।

 शिर्डीच उज्जयिनी महाकाळेश्वर । शिर्डीच महाबळेश्वर गोकर्ण ।।६० ।।   

ह्यावरून आम्हांला सर्व सदगुरु एकच गोष्ट सातत्याने सांगतात की -
अवतीभवती असून दिसेना शोधीतोस आकाशी
कुठे शोधिसी रामेश्वर अन कुठे शोधिसी काशी


सदगुरुंच्या चरणींच माझी सर्व तीर्थक्षेत्रे आणि माझे इष्ट देव, दैवत आहे असा अनन्य शरणागतीचा भावच आम्हांला ह्या भवसागरातून तरून जाण्यास  पर्याप्त आहे, ह्याच भावनेने सदगुरुंना भक्तांनी पूजावे म्हणून अन्य कोणत्याही तीर्थक्षेत्री न जाऊ देऊनही श्रीस्वामी समर्थांनी आपल्या सेवेकर्‍यांच्या इच्छा अक्कलकोटलाच बसल्या जागी पुरविल्याचे बखर सांगते - १७१व्या कथेंत रामशास्त्री सेवेकर्‍याला कार्तिकस्वामींच्या दर्शनाला जाऊ न देतां स्वामींनी अक्कलकोटला  कार्तिक पौर्णिमेच्या दिवशी सहा तोंडे असलेल्या कार्तिकस्वामींच्या रूपाने दर्शन दिले. 

१३९ व्या कथेंत गारोडे येथे राहणारे सीतारामपंत नेने आपल्याला रामाचा साक्षात्कार व्हावा म्हणून राम-उपासना कडक रीतींने करीत होते व पुढे ते स्वामींची कीर्ती ऐकून अक्कलकोटास आले असतां त्यांना एके दिवशी दोन प्रहरी स्वप्नांत स्वामींनी रामरूपाने दर्शन देऊन त्यांच्या शंकाही दूर केल्या.

७५ व्या कथेत पुष्कळ वर्षेंपर्यंत श्रीगुरुदत्तात्रेयांचे दर्शन व्हावें म्हणून अनुष्ठान करणार्‍या एका गोसाव्यास तीन शिरें, सहा हात, सर्व हस्तांमध्ये कमंडलु, त्रिशूळ वगैरे धारण केलेले असे श्रीगुरु दत्तात्रेयांचे दर्शन दिधले होते.   
तसेच आंधळ्या सूरदासाला स्वामी समर्थांनी कृष्णाचे दर्शन दिधले होते दिव्य दृष्टी प्रदान करवून ...

अशा ह्या सदगुरु श्रीस्वामी समर्थांच्या चरणीं  अनन्य भावे सदा असो दंडवत -
ऐशा स्वामी समर्थांना । सदा असो दंडवत  ।
ऐशा स्वामी समर्थांना । सदा असो दंडवत  ।
ऐशा स्वामी समर्थांना । सदा असो दंडवत  ।
ऐशा स्वामी समर्थांना । सदा असो दंडवत  ।  

Wednesday, 19 April 2017

अणुकिरणोत्सर्गी आयोडीन -१३१ ची युरोप मध्ये गळती - आण्विक अपघाताची दाट चिंता?

काही संस्थांनी हवेच्या नमुन्यांच्या केलेल्या चाचणींमधून आयोडीन- १३१ चे धक्कादायक प्रमाण युरोपीय प्रदेशांमधील हवेमध्ये आढळले, जे आर्क्टिकच्या ध्रुवीय प्रदेशातील संभाव्य  आण्विक अपघाताच्या धोक्याची इशाराघंटा वाजवित आहे जणू ! आयोडीन १३१  हे आयोडीनचे रेडीओऍक्टीव्ह आयसोटोप (Radioactive Isotope) अणुकिरणोत्सर्गी समस्थानिक आहे जे प्रामुख्याने ( न्युक्लिअर फिजन (न्युक्लिअर विखण्डन ) ह्या प्रक्रियेमध्ये वापरले जाते. 

मार्च २०११ मध्ये फुकुशिमा येथे जी आण्विक गळती झाली त्यातून वातावरणात खूप मोठ्या प्रमाणावर किरणोत्सार झाला सल्याचे निदर्शनास आले, ज्यात आयोडीन १२९ हे दीर्घकाळ टिकणारे ( १५.७ दशलक्ष वर्षे)  व वातावरणात हजारो वर्षे तग धरून राहणारे समस्थानिक होते आणि आयोडीन १३१ हे कमी काळ टिकणारे (८ दिवस) . परंतु दोन्ही आयोडीन १२९ आणि आयोडीन १३१ ही किरणोत्सारा दरम्यान मानवाला अत्यंत घातक असे बीटा पार्टिकल्स सोडतात ज्याने थायरॉईड कॅन्सर होण्याची जास्त शक्यता असते. थायरॉईड हे मानव निर्मीत रेडीओऍक्टीव्ह आयोडीन १२९ आणि आयोडीन १३१ विषारी पदार्थ शोषून घेते. प्रत्येक आण्विक आपत्ती किंवा अपघात हे हजारो विषारी पदार्थ , जड धातुची विषारी रेडीओऍक्टीव्ह द्रव्ये बाहेर उत्सर्जित करतातच , परंतु ह्यापैकी खूप कमींची मोजणी होते आणि चर्चा होते.

थायरॉईड ही मानवाच्या शरीरातील ग्रंथी रेडीओऍक्टीव्ह  आयोडीन आणि स्थिर आयोडीन असा फरक समजू शकत नाही. त्यामुळे रेडीओऍक्टीव्ह आयोडीन १२९ किंवा आयोडीन १३१ चे  प्रमाण जेव्हा प्रमाणित प्रमाणापेक्षा अधिक वाढते , तेव्हा थायरॉईड ही रेडीओऍक्टीव्ह  आयोडीनची समस्थानिके असलेले आयोडीन १२९ किंवा आयोडीन १३१ पेशींमध्ये शोषून साठवून ठेवते आणि ते थायरॉईड हार्मोनच्या वाढीसाठी वापरते, पुढे  हेच आजूबाजूच्या पेशींना प्रत्यक्ष धोका देते आणि पुढे त्यांची बेसुमार वाढ होऊन परिणाम स्वरूप कॅन्सर होऊ शकतो.

ह्याच कारणास्तव कोणतीही आण्विक गळती वा  रेडीओऍक्टीव्ह  किरणोत्सार हा धोकादायक म्हणून पाहिला जातो आणि त्याची गंभीर दखलही घेतली जाते. म्हणून अणुकिरणोत्सर्गी आयोडीन -१३१ ची युरोप मधील गळती -  ह्या आण्विक अपघाताची दाट चिंता व्यक्त केली जात आहे.         

आयोडीन -१३१ ह्या रेडीओऎक्टीव्ह पदार्थाचे कण रशियाच्या सीमेजवळील नोर्वे येथील स्वानहोव्ड येथे जानेवारी महीन्याच्या दुसर्‍या आठवड्यात साधारणपणे ९ ते १६ जानेवारी च्या दरम्यान आढळले. असेच Radioactive पदार्थ पुढे फिनीश लॅपलॅण्ड मधील रोवनिअमी (Rovaniemi in Finnish Lapland ), पोलंड, झेक रिपब्लिक , जर्मनी, फ्रान्स, स्पेन येथे पुढील २ आठवड्यातच  आढळले. म्हणजेच थोडक्यात जानेवारी महिन्याच्या शेवटापर्यंत अणु किरणोत्सर्गी आयोडीन -१३१ चे पुराव्यांचे प्रमाण अगदी नगण्य स्वरूपातले असले, आरोग्याला हानीकारक नसले तरी वाढलेले नक्कीच होते.
                                                                   
हवेत आढळलेले आयोडीन-१३१ चे प्रमाण हे खूप कमी तीव्रतेचे असल्यामुळे त्याने लोकांच्या आरोग्याला आणि वातावरणाला काही धोका नसल्याचे निश्चित झाले.
त्यामुळेच आपात्कालीन सज्जता पाहणार्‍या नॉर्वेजियन किरणोत्सार सुरक्षा विभागाच्या प्रमुख अधिकारी ऍसटरीड लिलॅण्ड (head of section for emergency preparedness at the Norwegian Radiation Protection Autority, Astrid Liland, ) ह्यांनी नॉर्वेने ही माहिती उघड न केल्याची कबूली  "बॅरण्टस ऑबझर्व्हर" ( Barents Observer ) ह्या इंटरनेट वेब सर्व्हीसला दिली. 

परंतु फ्रान्सने मात्र आपल्या नागरीकांना ही माहिती ताबडतोब उघड करून सांगितली.  
अशा परिस्थीतीत आयोडीन १३१ चे आढळलेले पुरावे हे कोणत्याही पूर्व काळात घडलेल्या आण्विक गळतीचे नसून ,नुकत्याच  झालेल्या आण्विक गळतीचे असल्याची दाट शक्यता वर्तवित होते. त्यामागील शास्त्रीय कारणही तसेच गंभीर आणि विचारांना चालना देणारे आहे. आयोडीन १३१ चे आयुष्यमान हे खूप कमी काळाचे म्हणजेच अवघ्या ८ दिवसांचेच असते त्यामुळे आयोडीन १३१ चे अंश सापडणे म्हणजे ते फक्त नुकत्याच घडलेल्या आण्विक गळतीमुळे होऊ शकण्याचीच दाट शक्यता दाखवित होते.  
       
अनेक संभाव्य शक्योपशक्यतेचा अभ्यास करूनही  गळतीचे कारण मात्र सापडू शकले नाही. काही संभाव्य कारणांचा अभ्यास केला गेला त्यापैकी -

१. ह्या गळतीच्या दरम्यान अमेरीकी हवाई दलाने WC-135 हे Constant Phoenix  एअरक्राफ्ट  युरोपला पाठवले होते असे आढळले. 
WC-135 हे अमेरीकन हवाई दलाचे Constant Phoenix  एअरक्राफ्ट हे वातावरणातील हवेच्या नमुन्यांमधील संभाव्य आण्विक  स्फोटाचे प्रमाण शोधून काढण्याच्या तसेच आण्विक घटनांना प्रतिसाद देता यावे , कोणत्याही प्रकारचे आण्विक उत्सर्जन घडत असल्यास ते कोणत्या प्रकारच्या आण्विक वा तत्सम शस्त्राच्या माध्यमातून घडत आहे हे शोधून काढणे, आणि स्फोटाची तीव्रता जाणून घेणे अशा  विशेष कार्याच्या उद्देशाने   निर्माण केले गेले आहे.

ट्विटर ह्या सोशल मिडीयावर U.S. Aircrafts Spots ह्यांनी प्रसिध्द केलेल्या मॅप नुसार  WC-135 चा मार्ग खालील दिल्याप्रमाणे आहे जे फ्लोरिडाहून निघून UK's Mildenhall airbaseवर उतरले .

                                                                       

अजूनही अमेरीकी मिलीटरीने "Constant Phoenix"  हे युरोपकडे का पाठविण्यात आले ह्याचे स्प्ष्टीकरण दिलेले नाही.  

२.  रशियाच्या आण्विक चाचणींचा धोका -
दुसर्‍या एका अंदाजानुसार रशियाने आर्क्टिक प्रदेशात आण्विक शस्त्रांची चाचणी पुन्हा सुरू केली असावी किंवा परमाणु बॉम्बची चाचणी करण्याची रशियाची नवी रणनैतिक खेळी असावी असा कयास बांधला जात आहे. परंतु परमाणु बॉम्बच्या चाचणीच्या संदर्भाला सहमती दर्शविणारे कोणतेही भूकंपीय पडसाद/पुरावे सापडले नाही.

अजून एका अनुमानानुसार  नॉर्वेच्या सीमेलगतच्या कारा समुद्र आणि कोला पेनिन्सुला ह्या भागातील मोठ्या प्रमाणावरील रशियाचा आण्विक कचरा आणि विघटन होऊ  घातलेल्या आण्विक पाणबुड्या ह्यासुध्दा ह्या सध्याच्या आण्विक गळतीचे कारण असण्याची संभाव्यता वर्तविली जाते.

शीत युध्दाच्या दरम्यान आणि नंतर  रशियाने प्रक्रिया न केलेल्या आण्विक वेसल्स. अणुभट्टीचे वापरलेले फ्युएल रॉड , किरणोत्सर्गी आण्विक कचरा हा आर्क्टिक प्रदेशात विल्हेवाट लावण्यासाठी डम्प केला आहे. बर्‍याच जणांनी हा किरणोत्सर्गी गळती करणारा आणि प्रदूषण वाढविणारा  टाईम-बॉम्बच  असल्याची संतप्त प्रतिक्रिया नोंदवली आहे.

३. आयोडीन १३१ चा औषधोपयोगी वापर -
काही मंडळी असा दावा करीत आहेत की आयोडीन १३१ चे हवेतील प्रमाण हे आण्विक अणुभट्टीतील आण्विक प्रक्रियेमुळे असू शकते तर काहींच्या मते आयोडीन १३१ हे समस्थानिक ( isotope ) हे मोठ्या प्रमाणावर औषधांमध्ये (कॅन्सरच्या प्रतिबंधात्मक औषधांमध्ये ) वापरले जाते आणि म्हणून जगातील बहुतांशी राष्ट्रे ही आयोडीन १३१ चे जागतिक पातळीवर उत्पादन देखिल करतात, त्याच्याशी हे निगडीत असू शकते.
आण्विक अणुभट्ट्यांचे चालक वा तत्सम संस्था ज्या आयोडीन १३१ चा औषधोपयोगी वापर करतात त्या ह्या किरणोत्सर्गी वापराचा बाह्य वातावरणात उत्सर्ग करण्यासाठी डिटेक्टरचा वापर करतात, ज्यामुळे ह्याची शक्यता खूपच नगण्य असावे असा मतप्रवाह आहे. 

सद्य स्थितीत होत असलेल्या आयोडीन १३१ च्या किरणोत्सर्गी गळतीचे मूळ शोढून काढण्याच्या निष्कर्षाप्रत पोहचताआले नाही असे चित्र दिसते आहे. जरी संबंधित राष्ट्रांचे एकमेकांवरील दोषारोप आणि नकारात्मक युक्तिवाद  काहीही असले आणि त्याचे आंतरराष्ट्रीय पातळीवर उमटणारे सूर काही असतील तरी देखिल सामान्य माणसाने आण्विक दुर्घटना ही अपघाताने घडलेली असो वा मानव निर्मीत असो , त्याकडे दुर्लक्ष करून चालणारे नाही . उलट अशा प्रकारच्या आण्विक गळतींपासून होणारे  विघातक परिणाम , त्यांपासून उद्भवणारा धोका जाणून घ्यायला पाहिजे आणि त्या आपत्तीला तोंड देण्याच्या व्यवस्थापनाची अद्ययावत सुसज्जता करूनच ठेवली पाहिजे आणि हेच वास्तवाला सभानतेने , सजगपणे सामोरे जाणे असेल जे समस्त मानवांना नैसर्गिक वा मानव -निर्मीत आपत्तींपासून तारू शकेलअसे वाटते.  

संदर्भ:

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

Samirsinh Dattopadhye 's Official Blog