Wednesday, 7 December 2016

साईबाबा से अपनापन कैसे निभाना ?

हरि ओम
ओम कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय नम:
कई दिनों से मोबाईल फोन के व्हाटसऍप (Whatsapp) के भिन्न भिन्न ग्रूपस में एक पोस्ट ( POST) पढने मिली रही थी जिस में  इक आदमी पूरे दिन में बहुत सी मुश्किलों का सामना करता है , और दिन भर की लगातार आनेवाली मुसीबतों से बहुत ही परेशान  हो उठता है ।  आखिर में उसका गुस्सा इतना बेकाबू होता है कि वो भगवान से ही इन परेशानियों की वजह पूछता है कि भगवान तूने मेरे साथ ऐसे क्यों किया ? तुमने मुझपर सुबह से लेकर रात तक इतनी मुसीबतें क्यों लायी ? क्यों मुझे परेशान किया? क्यों मैंने सोचा था या तय किया था वैसे कोई भी चीज सही तरीके से मेरे साथ क्यों हुई नहीं और फिर भगवान उस आदमी को हर किस्से में भगवान ने उसकी कैसी सहाय्यताही की थी, उसके मनसूबे भले ही नाकामयाब हुए या भले ही उसने सोचा या उसने चाहा वैसेही एक भी चीज ढंग से ना घटी , फिर भी भगवान की असीम कृपा से ही वो बाल बाल बच गया और अभी तक जिंदा हैं यह समझाया था।अर्थात वह भगवान पे आग बबूला हुआ आदमी अपनी नादानी मान लेता है और भगवान की कृपा से उसकी आंखे नम हो जाती है । यह कहानी हमें बतलाती हैं ,सीख देतीं हैं कि जो भी आदमी भगवान की भक्ति करता है , उसके चरणो में विश्वास रखता है, उस पर श्रध्दा रखता है, उसका भरोसा करता है उसे भगवान कभी भी मायूस नहीं करता, या खाली हाथ लोटाता नहीं हैं ।  हां यह बात जरूर है कि कभी कभी भगवान हम जो चाहते हैं वह हमें नहीं देतें हैं या देरी से देतें है , पर इसके पीछे भी उनका अनगिनत प्यार और कृपा ही छुपी रहती है, यह हमारा  भरोसा होना चाहिए ।

साईबाबा के ग्यारह वचनों में सबसे महत्त्वपूर्ण वचन है -
मेरी शरण आ खाली जाए , हो कोई तो मुझे बताए ।
( शरण मज आला आणि वाया गेला । दाखवा दाखवा ऐसा कोणी  । )

मेरे साईबाबा , हमारे साईबाबा हमेशा हमें बतातें हैं कि जो भी मेरी शरण में आता है, मेरी पनाह में आता है , उसे मैं कभी भी खाली हाथ लौटाता नहीं हूं । अगर हम साईबाबा की भक्ति करतें हैं और उनकी शरण में गए हैं तो हमें हमारे साईबाबा पर १०८ % भरोसा होना ही चाहिए कि भले ही दुनिया इधर की उधर हो जाए , हमें हमारे साईबाबा हर हालात में संभालने वाले हैं ही ।यही विश्वास साईबाबा के भक्तों में था ।

श्रीसाईसच्चरित लिखनेवाले हेमाडपंतजी यही बात हमें उजागर कर देतें हैं - चाहे वो आंखों में इलाज के लिए साईबाबा ने  बिब्बा कूट कूट कर डाला हो या मलेरीया (हिवताप) जैसे न ठीक होनेवाले बुखार के लिए लक्ष्मी मां के मंदिर के नजदीक काले कुत्ते को दही-चावल खिलाने को साईबाबा ने कहा हुआ बाला शिंपी हो या कृष्णाष्टमी का उत्सव मनाने शिरडी आए हुए काका महाजनी को तुरंत बिना उत्सव मनाए वापस उसी दिन मुंबई अपने घर लौटने की बात कही हो । ये सभी भक्त अपने आचरीत से हमें बताते है कि सदगुरु साईबाबा को कभी क्यों , कैसे , कब ऐसे सवाल पूछने ही नहीं चाहिए , जब बाबा ने बताया तो तुरंत हमें वैसे ही करना चाहिए क्यों कि वैही हमारे लिए सबसे उचित अच्छा मार्ग रहता है ।



यही बात को पहले अध्याय में भी हेमाडपंतजी ने बखुबी बताया है , इस के बारे में हाल हि मैंने एक बहुत ही सुंदर लेख पढा । इस लेख में लेखक महोदय ने  बताया कि  श्रीसाईसच्चरित के प्रथम अध्याय ‘मंगलाचरण’ में मुख्य एवं मध्यवर्ती कथानक है- बाबा के द्वारा गेहूँ पीसा जाना और लेखक बताते है कि यह केवल कथानक नहीं है, सामान्य कथा नहीं है, बल्कि वह है एक घटित होनेवाली अद्भुत घटना। ऐसी घटना जिस घटना से हेमाडपंत का संपूर्ण जीवन ही बदल गया । इस गेहूँ पीसनेवाली घटना को देखकर जिन हेमाडपंत के मन में बाबा का चरित्र लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई उन्हीं हेमाडपंत की भूमिका के बारे में वे हम एक नया नजरीया देतें हैं कि हेमाडपंत जब इस घटना को देखते हैं, तब उस घटना की समाप्ति पश्‍चात् भी वे बाबा से कहीं भी यह प्रश्‍न नहीं पूछते हैं कि ‘‘बाबा, अब इस आटे का आप क्या करोगे?’’ अथवा यह भी नहीं पूछते है कि ‘‘बाबा, आपने इस गेहूँ को पीसने के लिए इतनी मेहनत की और अब इसे सीमा पर डालने के लिए कह रहे हो ऐसा क्यों?’’ इस प्रकार का कोई भी प्रश्‍न हेमाडपंत बाबा से नहीं पूछते हैं। वे स्पष्टत: कहते हैं- ‘‘बाद में मैंने लोगों से पूछा। बाबा ने ऐसा क्यों किया ।

यहीं पर हेमाडपंत और एक सामान्य मनुष्य इनके बीच का अंतर बिलकुल स्पष्ट हो जाता है। हेमाडपंत के सामने साक्षात परमात्मा होने पर भी उन्होंने ‘उनसे’ प्रश्‍न नहीं पूछा। लेकिन हम वे सामने हो (किसी भी स्वरूप में) या ना हो, हमसे संबंधित यदि कोई घटना हमारे मन के विरुद्ध घटित हो जाती है कि तुरंत ही हम उनसे सबसे पहले यह प्रश्‍न पूछते हैं, ‘‘अरे भगवान, तुमने ऐसा क्यों किया?’’ तुरंत ही हमारा दूसरा प्रश्‍न भी तैयार हो जाता है, ‘‘मैं ही मिला तुम्हें ऐसा करने के लिए?’’ और कितनी बार तो मेरा जिन बातों के साथ कोई संबंध ही नहीं रहता, उन बातों के संदर्भ में भी ‘उन्हीं’ से प्रश्‍न पूछते रहता हूँ और मेरी ओर से मेरे इस ‘क्यों’रूपी पूछनेवाली वृत्ति का अंत होता ही नहीं।

लेखक जी इक बात से मैं सहमत हो गयी कि परमात्मा ने कभी यह निश्‍चय कर लिया और हर मनुष्य से उसके हर व्यवहार के बारे में, उसके हर एक कर्म के प्रति पूछना शुरू कर दिया कि ‘अरे बालक, तुमने ऐसा क्यों किया?’ तो हमारी स्थिती क्या होगी, इतना यदि हम जान भी ले तो काफी है।
परन्तु वे अकारण करुणा के महासागर कभी भी मनुष्य से ‘क्यों’ यह प्रश्‍न नहीं पूछते, उलटे उस हर एक मनुष्य के ‘क्यों’ का उत्तर उस हर एक व्यक्ति को वह व्यक्ति उसे सह सके इस कदर देते ही रहते हैं।
इसीलिए हमें भी जीवन के किसी न किसी मोड़ पर परमात्मा से प्रश्‍न पूछने कि इस मनोवृत्ति को बदलना ही चाहिए ऐसे मुझे भी लगता है ।यही बात हेमाडपंत ने जान ली थी और इसी कारण उन्होने बाबा से कभी प्रतिप्रश्न नहीं पूछा था ।

आरंभ बाबा का कोई न जान पाये। क्योंकि प्रथमत: कुछ भी न समझ में आये।
धीरज रखकर ही बाद में परिणाम सामने आ जाये । महिमा अपार बाबा की॥

हेमाडपंत की उपर्युक्त पंक्तियों से ही बाबा की गेहूँ पीसने की क्रिया की पहेली सुलझ जाती है। इसीलिए वे कहते हैं कि बाबा का किसी भी क्रिया के आरंभ करने के पीछे का रहस्य समझ में आ ही नहीं सकता है। लेकिन जो धैर्य रखता है उसे अवश्य ही इस कारण का पता चल जाता है।

मेरे खयाल से इस लेख की ओर सारी बातों को जानने के लिए उसे पढना ही बेहतर होगा -

मैंने  साईबाबा को अपना भगवान या सदगुरु माना , तो उन्हें "क्यों " जैसे प्रश्न नहीं पूछने चाहिए , बल्कि जो कुछ भी मेरे साईबाबा करतें हैं वोही मेरे लिए उचित है इस तरह का अटूट भरोसा , विश्वास मुझे अपने साईबाबा के चरणों में रखना चाहिए । यही सही मायनो में अपनापन जताना होगा ।


ओम साईराम

Monday, 14 November 2016

माझ्या लाडक्या डॅड, साठाव्या जन्मदिवसाच्या तुम्हाला अनिरूध्द शुभेच्छा !

हरि ॐ

माझ्या लाडक्या डॅड,  साठाव्या जन्मदिवसाच्या तुम्हाला अनिरूध्द शुभेच्छा  !


तदबीर से बिगडी हुई, तकदीर बना ले
अपने पे भरोसा हैं तो एक दाँव  लगा ले

डरता है जमाने की निगाहों से भला क्यों ?
इन्साफ तेरे साथ है, इल्जाम उठा ले 

क्या खाक वो जीना है, जो अपने ही लिए हो
खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले

टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो गम क्या
हारी हुई बाहों की पतवार बना दे 







गुरुदत्तजींनी दिगदर्शित केलेल्या देवानंद आणि गीता बाली ह्यांच्या १९५१ सालच्या बाजी सिनेमातील हे साहिर लुधियानवीचें  स्वरांनी सजलेले  आणि बर्मनदांच्या संगीताने नटलेले हे जीवनाच्या अजरामर सत्याचे दर्शन घडविणारे हे गीत आजही मनाला तितकीच भुरळ घालते. 

हे गाणे ऐकताना जीवनाच्या हरत चाललेल्या डावाला जिंकायचाच आणि विजय प्राप्तीचा १०८% भरोसा देऊन , आकाशाला गवसणी घालणारे अनिरूध्द  मन:सामर्थ्य प्रदान करणार्‍या माझ्या अचित्यदानी गुरुमाऊलीचा , माझ्या सदगुरुरायाचा , माझ्या लाडक्या , प्राणप्रिय डॅडचा मनमोहक ,लाघवी, हसरा चेहराच डोळ्यांपुढे तरळला आणि नयनांत आनंद-विरहांश्रूची एकच दाटी झाली...  

ह्या गाण्यात वर्णिलेली परिस्थिती माणसाच्या आयुष्यात अनेक वेळा येत असते . जेव्हा स्वत: वरचा आत्मविश्वासच डगमगतो , संकटाचे डोंगर कोसळलेले असतात आणि आयुष्यात सर्व काही संपले असे वाटू लागते, परमेश्वराने बहाल केलेल्या मानवी जन्माचे माहात्म्य ठाऊक असूनही तोच जन्म नकोसा होतो आणि असा नैराश्येच्या गर्तेत सापडलेला तो असहाय्य जीव अगतिकपणे मिळेल त्या प्रत्येकाकडे मदतीचा हात मागतो पण कुठे म्हणून आशेचा किरण तर सोडाच पण प्रकाशाचा कवडसाही दिसत नाही आणि शेवटी हतबल होऊन तो माणूस  शेवटी आपले आयुष्य संपवण्याच्या चुकीच्या , अधोगतीला नेणार्‍या मार्गाकडे झुकू लागतो आणि अचानक त्याच्या आयुष्यात असे काही बदल घडू लागतात ...
तिमीरातूनी पसरूनिया बाहू आले ते उजळीत ....



राखेतून उठण्याचे मन:सामर्थ्य देत आकाशात उंच  भरारी घेणार्‍या फिनीक्स पक्ष्यासम जीवनाचा संपूर्ण कायापालट करविणारे माझे लाडके डॅड- माझे बापू!
 


वाट पहाशील तर आठवण बनून येईन, एकदा मनापासून आठवून तर बघ तुझ्या चेहर्‍यावर "हास्य" बनून येईन ... अनिरूध्द बापू . अंबज्ञ !
क्षणार्धात होत्याचे नव्हते होत असतानाच "तो " येतो आणि भरोसा देतो , ऊठ भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी उभा आहे  असे अभयवचन देत  "तो" अभयदाता स्वामी समर्थ बनून येतो, सर्व जगाने  साथ सोडली असताही भक्कम , खंबीर आधार देतो - "तो" असतो माझा खराखुरा आप्त, जीवीचा जीवलग - माझा सदगुरु !
शरण मज आला आणि वाया गेला दाखवा दाखवा ऐसा कोणी अशी ग्वाही देत  कृपेचा अमाप वर्षाव करीत "कृपासिंधु" बनून "तो" येतो साक्षात ईश्वर बनून - माझा "साई"बनून आणि ग्वाही देतो  मी असताना तू अनाथ नाही , तुझा साईनाथ आहे ना तुझ्या संगे ! - "तो " असतो माझा सदगुरु !
"तू आणि मी मिळून अशक्य असे ह्या जगात काहीच नाही " असे म्हणत मित्रत्वाच्या नाते सदैव सांभाळून , माता-पित्याच्या मायेची पखरण करणारा , कधीही दगा न देता सच्च्या मित्राच्या नात्याने अखंड साथ देणारा, निभावणारा  असतो "तो " माझा मन:सामर्थ्यदाता - माझा आत्मा, माझा प्राण बनून माझे जीवन रसरशीत ठेवणारा, माझ्या जीवनात सत्याला प्रकाशित करून "सत्यप्रवेश " करवून देणारा, प्रेमाचा अविरत स्त्रोत बरसवून
"प्रेमप्रवास" करवून घेणारा , आणि पदोपदी, ठायी ठाय़ी आनंदाच्या राशीवर पहुडायला लावून " आनंद साधना " करवून घेणारा - "तो" असतो माझा सदगुरु !

"मी तुला कधीच टाकणार नाही " ह्याची प्रचिती देत साता-समुद्रांच्या पलिकडे असो वा उंच कड्यावरून दरीत कोसळत असो वा सुनामी , भूकंपासारख्या नैसर्गिक आपत्तीच्या विळख्यात फसलेले असो वा मृत्यूच्या कराल दाढेत अडकलेले असो , "स्मर्तुगामी " बनून अनिरूध्द गतीने धाव घेणारा , चिडीच्या पायाला दोर लावून अलगद आपल्या प्रेमपाशात खेचणारा, आधारवडाच्या सावलीत विसावा देणारा "तो" असतो माझा सदगुरु - माझा DAD- माझा बापूराया - माझे सदगुरु !

नशीब नशीब म्हणून काय रडत बसतो वेड्या, माझ्या राजा "त्या" अनंत करूणामयी परमेश्वरावर विश्वास ठेवून तर बघ एकदा , "तो" लाभेवीण प्रेम करणारा एकच ! "तो" आपल्या लेकरांना कधीच असहाय्य अवस्थेत ठेवत नाही ह्याची ग्वाही आणि जिवंत प्रचिती देऊन जगण्याची आस जागवितो, मरगळलेल्या मनाला चैतन्याची नव उभारी देतो "तो" माझा बापूरायाच !



तू आणि मी मिळून अशक्य असे ह्या जगात काहीच नाही अशी ग्वाही देत , आळसाला घालवून , "जेथे राबती हात तेथे हरी " ह्या उक्तीला जीवनात सत्यात उतरावयाला भाग पाडणारा "माझा बापूराया - तदबीर से बिगडी हुई, तकदीर बना ले

मन:सामर्थ्यदाता असलेला माझा सदगुरुराया मला जीवनाचे फासे फेकताना भरोसा देतो "त्या"च्या चरणांवरचा आणि पर्यायाने " स्वत:" वरचा ! - अपने पे भरोसा हैं तो एक दाँव  लगा ले

भगवंत , परमात्मा, परमेश्वर अन्यायी नाहीच मुळी , "त्या"च्या न्यायीपणावर विश्वास ठेवायला शिकवतो "एक विश्वास असावा पुरता कर्ता हर्ता गुरु ऐसा " हे साईनाथांचे वचन सत्यात उतरविण्याची ग्वाही देत माझा बापूराया मला संकटाशी झुंजायला शिकवतो -    डरता है जमाने की निगाहों से भला क्यों ? इन्साफ तेरे साथ है, इल्जाम उठा ले 

माता-पित्यांच्या ऋणाइतकेच मातृभूमीचे ऋण असते ह्याची जाणीव करवून देऊन , सदैव सभान राहून माझ्याकडून मायभूमीचे पांग फेडून घेतो "तो" माझा बापूरायाच - क्या खाक वो जीना है, जो अपने ही लिए हो  खुद मिट के किसी और को मिटने से बचा ले

अरे माझ्या राजा, जीवनात हे नाही , ते नाही असा नन्ना चा पाढा वाचत , रडत बसण्यापेक्षा आहे त्यातून जीवनाची बाग फुलवायला शिक - माझ्या साईनाथाने उजाड , बंजर जमीनीतूनच चैतन्याची बाग फुलविली हे शिकविणारे हेमाडपंतविरचिते अपौरूषेय ग्रंथ असलेले "श्रीसाईसच्चरीत" जरा डोळे उघडून वाच, मनाची बंद कवाडे उघड आणि मग बघ "तो" आहेच तुझ्या पाठीशी दूधाची वाटी घेऊन उभा ,मग माझ्या लेकरा तुझे प्रयास नको का करायला तू म्हणत प्रेमाने गोंजारत तर कधी रागाने कान पकडून दरडावत तर कधी नाठाळ, टवाळ लेकराला पाठीत धपाटा घालत जीवनाची युध्द्कला आचरणात आणायला शिकवितो ’"तो" माझा नंदारमणा अनिरूध्द ! राम बनून सत्याशी , मर्यादेशी बांधिलकी घालून देणारा, निष्काम कर्माची दीक्षा देणारा कृष्ण बनून , हातातले गळून पडणारे गांडीव धनुष्य सावरीत , तुझ्या जीवनाचे कुरुक्षेत्र होऊ नये म्हणून मी आज येथे उभा आहे हे मनावर बिंबवीत , सत्य-प्रेम -पावित्र्य ह्या त्रिसूत्रीला अनुसरूनच आणि "पावित्र्य हेच प्रेमाण" ह्या आदिमाता चण्डिकेच्या नियमाला कटीबध्द होत , "ठं" बीजाची जीवनात बीज रोवणारा - माझा रणधुरंधर , लढवय्या - बापूराया -   
टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो गम क्या
हारी हुई बाहों की पतवार बना दे


अशा ह्या माझ्या प्राणप्रिय गुरुमाऊलीचा - माझ्या सदगुरु बापूरायांचा  आज ६० वा जन्मदिवस !  त्या निमीत्त्ताने ही गुणसंकीर्तनाची पुष्पांजली त्यांच्या चरणी समर्पित!

अखिल जगताचा समर्थ , मूळ आधार असणारे दत्तगुरु आमच्या बापूंना उदंड आयुष्य देवो,हीच तुमच्या चरणी प्रार्थना !

हे आदिमाता माय चण्डिके माझ्या प्रेमळ पित्याला, माझ्या गुरुमाऊलीला, माझ्या बापूंना उदंड आयुष्य़ लाभो हीच तुझ्या चरणी प्रार्थना !

माझ्या बापूरायाला आवडेल अशीच भक्ती-सेवा आमच्या हातून सदैव घडो , जेणेकरून माझ्या सदगुरुंच्या चेहर्‍यावर हास्याची, आनंदाची एक लकेर तर झळकू हेच आदिमातेकडे मागणे !  

I LOVE YOU MY DAD ALWAYS AND FOREVER !!!
हरि ॐ. श्रीराम.अंबज्ञ  







Sunday, 16 October 2016

युरेका युरेका ....आर्किमिडीज !

"युरेका युरेका" शब्द उच्चारताच आठवतात ते पटकन जगद्विख्यात शास्त्रज्ञआर्किमिडीज ! " युरेका" हा शब्द प्राचीन ग्रीक भाषेतील εὕρηκα ह्या शब्दावरून प्रचलित झालेला शब्द ! ह्याचा अर्थ इंग्लिश भाषेत I have found it म्हणजेच मला ती मिळाली म्हणजेच मला सापडले, मला गवसले असाच होतो. 

आपण एखादी गोष्ट शोधत असतो बराच वेळ आणि आपल्याला ती सापडता सापडत नाही. आपण  ती हरवलेली गोष्ट म्हणा वा वस्तू बर्‍याच ठिकाणी नेहमीच्या ठेवायच्या वा अनपेक्षित जागीही शोधतो, पण ती काही केल्या सापडत नाही. तेव्हा सतत त्याच हरवलेल्या गोष्टीचा विचार आपल्या मनात घोळत राहतो, आपल्या ध्यानी -मनी तीच गोष्ट दिसत राहते आणि कधी एकदा ती सापडते असे आपणास होऊन जाते, आणि मग अचानक ती गोष्ट सापडते तेव्हा आपल्याला होतो तो आनंद अगदी अवर्णनीय असाच असतो नाही का?  

अप्रगत काळात आणि प्रतिकूल परिस्थितींमध्येही आपल्या विवेकशक्ती आणि तारतम्य ह्यांमुळे आपले विशेष स्थान बनविणार्‍या मान्यवरांमध्ये आर्किमिडीज ह्यांचे नाव विशेषत: गणले जाते. इ.स.पू. काळातील जेता मानल्या गेलेल्या रोमन सैनिकांना आपल्या शहराच्या सीमांवर रोखण्याचे अत्यंत धाडसाचे, शौर्याचे काम करणार्‍या ह्या प्रतिभासंपन्न संशोधकाचे नाव होते ’आर्किमिडीज’.

आर्किमिडीज  हे कल्पक वैज्ञानिक संकल्पनांचा जनक म्हणून प्रसिध्दीस आलेले (इ.स.पू. २८७ – इ.स.पू. २१२) प्राचीन ग्रीक गणितज्ञ, भौतिकशास्त्रज्ञ , अभियंता , संशोधक व खगोलशास्त्रज्ञ होते. त्यांचा जन्म सिसिलीमधील सेरॅक्यूज येथे झाला. सेरॅक्यूजचा राजा दुसरा हीरो व त्यांचा मुलगा गेलो यांच्याशी त्यांची दाट मैत्री होती. स्वत: खगोलशास्त्रज्ञ असलेल्या आर्किमिडीजच्या पित्याने त्यांना शिक्षणासाठी इजिप्तमधील अलेक्झांड्रिया येथे पाठविले होते, तेथीच त्यांचे सर्व शिक्षण झाले.

आर्किमिडीज ह्यांनी गणितातील घनफळ , पॅराबोला इत्यादी विषयांवर अत्यंत मोलाचे संशोधन केले.  तसेच भूमिती ,अभियांत्रिकी इत्यादी क्षेत्रांत त्यांनी महत्त्वाची कामगिरी बजावलीआहे. “पदार्थाचे पाण्यात केलेले वजन हे त्याच्या हवेतील वजनापेक्षा त्याने बाजूला सारलेल्या पाण्याच्या वजनाइतके कमी असते” हे त्यांचे तत्त्व ‘आर्किमिडीजचा सिद्धान्त’ या नावाने सुप्रसिद्ध आहे.

अशा ह्या विवीध क्षेत्रांत आपले मौलिक योगदान देणार्‍या आर्किमीडीज ह्यांच्या कार्याचा आढावा घेणारा एक सुंदर रीत्या मांडलेला,  माहितीपूर्ण लेख एका संकेतस्थळावर वाचनात आला आणि माझ्या वाचक मित्रांसवे तो वाटून त्यांनाही त्याचा लाभ मिळावा अशी तळमळ लागली.

नक्की जाणून घ्या - आर्किमिडीज ह्यांचे अमूल्य योगदान ...
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/archimedes/

Sunday, 7 August 2016

माझे सदगुरु - माझे एकमेव प्रत्यक्ष मित्र !

नुकतेच एका नवीन विषयाने माझे कुतूहल चाळवले गेले. माझ्या खांद्याचे ऑपरेशन झाले आणि दररोज फिजीओथेरपी करावी लागत असे. त्या दरम्यान त्या फिजीओथेरपीस्टशी बोलताना एक नवीन ज्ञानाचे दालन खुले झाले. त्या हॉस्पिटलमध्ये रिसर्च सेंटर (संशोधन विभाग ) कार्यरत आहे. त्याचा एक हिस्सा म्हणून तेथील सर्व डॉक्टर्सना आपापल्या क्षेत्रातील ज्ञान अद्ययावत (अपडेट) ठेवण्यासाठी सूचना दिली जाते आणि तसाच तो आग्रह कार्यान्वितही केला जातो Corporate Progress Developemnet(CPD) ह्या योजने अंतर्गत !

विवीध देशांत विवीध ठिकाणी वेगेवेगळ्या स्तरांवर शास्त्रज्ञ संशोधन करत असतात मग ते वैद्यकीय क्षेत्रात असेल, कॉम्पुटरमध्ये असेल, नॅनो टेकनॉलॉजीमध्ये असेल , मोबाईलच्या क्षेत्रात असेल. ह्या सार्‍या संशोधनाचे चांगले-वाईट असे परिणाम असू शकतात. परंतु मानव हा  नेहमी ह्याच संशोधनाच्या आधारांनी आपली प्रगती , विकास साधत असतो. "गरज ही शोधांची जननी आहे" असे ह्याच करीता म्हटले जात असावे , नाही का बरे ?

गप्पांच्या दरम्यान मला त्या फिजीओथेरापिस्ट्ने सांगितले की कामाच्या वेळेतील दर आठवड्यातील दोन तासांचा वेळ हा त्या प्रत्येकाला जगामध्ये नाना ठिकाणी मग ते राष्ट्रीय असो वा आंतरराष्ट्रीय पातळीवर जे काही संशोधन त्यांच्या त्यांच्या क्षेत्रांशी निगडीत सुरु असते त्यावर माहिती एकत्रित करण्याच्या उद्देशाने दिला जातो. अर्थात ह्या वेळेत त्यांना त्या वेळेत नियोजित काम करायचे नसून नवीन माहिती , शोध एकत्रित करायचे असतात. दर आठवड्याला त्यांच्या ग्रूपला एक विषय निवडण्याची मुभा असते , जो विषय ते आपापसांत ठरवितात आणि त्यावर इंटरनेटवरून माहिती मिळवतात आणि त्यावर नंतर चर्चा आयोजित होते, प्रेझेंटेशन बनविले जाते आणि नवीन उपचाराच्या पध्द्तींचा सखोल अभ्यासही केला जातो आणि पुढे त्याची सर्व पातळींवर नीट शहानिशा करून नवीन , आधुनिक उपचारासाठी त्याचा अवलंबही केला जातो. 

बदलत्या काळानुसार माणसाने स्वत:ला बदलणे आणि स्वत: मध्ये आणि आजूबाजूच्या वातावरणात , कामाच्या स्वरूपात बदल करणे हे अत्यंत आवश्यक आहे, आजच्या युगात अनेक नवनवीन स्थित्यंरे, संशोधन सतत घडत असतात आणि बदलत्या काळाबरोबर आपण पाऊले टाकायला नाही शिकलो तर आपण कधी काळाच्या प्रवाहातून बाहेर फेकले जाऊ ह्याची शक्यता नाकारता येत नाही. 

आपण नेहमी दोन पिढ्यांमध्ये चाललेला संघर्ष अगदी घराघरांतूनही अनुभवतो बर्‍याच वेळेस. तरूण युवा पिढीला आपले आई-बाबा, आजी-आजोबा हे जुन्या मतांचे वाटतात. त्यांना आपल्या बरोबर जुळवून घेणे कठीण वाटू लागते. आणि ह्याला "जनरेशन गॅप" असे गोंडस नाव दिले जाते. पण खरेच नीट विचार करता ही विचारांतील तफावत, जीवनशैलीतील चढ-उतार ह्यांच्याशी आपण मिळते-जुळते घ्यायचे ठरवले तर काहीच अवघड बनत नाही. आता हेच बघा ना हळू हळू का होईना आपण नवीन मोबाईल. संगणक(कॉम्पुटर) , टॅब अशा अनेक गोष्टी नव्यानेच शिकतो ना. बदलत्या काळाची गरज ओळखून जो माणूस स्वत: मध्ये असे सकारात्मक बदल घडविण्याचा प्रयास करतो , तेव्हा मग त्याला  कधीच अपयशाला सामोरे जात नाही, कासवाच्या धीम्या गतीने का होईना , तो विकासाच्या दिशेने पुढेच पाऊले टाकत असतो. 

ह्यावरून मला माझ्या सदगुरु डॉक्टर अनिरूध्द जोशी ह्यांच्या एका अभिनव संकल्पनेची आठवण झाली . त्यांनी "रामराज्य-२०२५" ह्या त्यांच्या ६ मे २०१० रोजीच्या प्रवचनातून आमच्या पुढे "द एक्स्पोनंट ग्रुप ऑफ जर्नल्स " ही एक नवीन संकल्पना मांडली होती. माझे सदगुरु हे स्वत: एका प्रथितयश, नावाजलेले डॉक्टर असल्यामुळे त्यांना त्यांच्या वैद्यकीय क्षेत्रातील ज्ञान अद्ययावत ठेवणे हे अत्यंत आवश्यक असते. त्यांनी सांगितल्या प्रमाणे मेडीकल क्षेत्रात अशासाठी मेडीकल जर्नल्स प्रसिध्द होतात , मग ती मासिक असतील वा वार्षिक ! त्या जर्नल्सच्या आधारे डॉक्टर्स आपले ज्ञान अपडेट ठेवू शकतात. ह्याच प्रकारे जर Electronics, Information Technology, Shares and Stock Market, Health and Health Services Information, CA, General Engineering, Professional Medicine, MBA ह्या विवीध क्षेत्रातील तज्ञमंडळीनी एकत्रित येऊन सुसंघटीतपणे अशी जर्नल्स तयार केली , तर समाजात नवीन प्रकारे प्रबोधन करता येऊ शकते असा पर्याय मांडला होता त्या प्रवचनात . 

सदगुरु हा आपला खरेच एक सच्चा मित्रही असतो, मार्गदर्शक ही असतो. तो नेहमीच आपल्याला संकट समयी उचित मार्गदर्शन करतो. भलेही कुणी मला साथ देवो , मला एकटे पाडो परंतु सदगुरु मात्र एकमेव असा मित्र असतो जो मला कधीच दगा तर देतच नाही. पण माझी सदैव साथ ही देतो. साक्षात भगवंत कृष्ण आणि सुदाम्याच्या मैत्रीच्या गोष्टी आपण वाचतो. कृष्ण आणि अर्जुनाची सख्य भक्तीही हेच "मैत्री" चे अनमोल नाते, निरपेक्ष प्रेमाचे, अतूट बंध दाखविते. अगदी संत तुकाराम सुध्दा आपल्या भगवंताबरोबर हेच नाते मैत्रीचे स्थापयाला शिकवतात - "जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती "    



कृष्ण भगवंताने सुदाम्याला शिकविलेल्या निरपेक्ष म्हणजेच विना मतलब, विनाकारण प्रीतीचा खरा भाव मला माझ्या सदगुरुंच्या कृतीतून उमगला - "बोले तैसा चाले त्याची वंदावी पाऊले." 

माझ्या सदगुरुंनी आम्हां सर्व श्रध्दावान मित्रांना असेच मैत्रीचे अभयवचन दिले की "मी तुला कधीच टाकणार नाही." आणि सच्चा मित्रच उचित वाटेवर आपल्या मित्राला चालवितो. माझ्या सदगुरुंनी आमच्या साठी असेच काळाबरोबर पावले टाकण्यासाठी एक ज्ञानाचे आगळे-वेगळे भांडार उघडले ते ह्या "द एक्स्पोनंट ग्रुप ऑफ जर्नल्स " .

ह्यात ही ई-जर्नल्स ही इंटरनेट वर असल्याकारणाने २४ तास उपलब्ध असतात, आणि कुठुनही वाचता येतात; शिवाय आपल्याला कुठलेही ओझे जवळ घेऊन वावरावे लागत नाही. हा याचा अत्य़ंत महत्त्वपूर्ण उपयोग आहे. विविध विषयांमध्ये उपलब्ध असलेली ही ई-जर्नल्स खूपच माहितीपूर्ण आहेत आणि त्या त्या विषयातील पारंगत लोकांनी लिहिली आहेत. तर अश्या ह्या ई-जर्नल्सचा आपण नक्कीच उपयोग करू शकता. http://exponentjournals.com/ या website वर The Exponent Group of Journals launch झाली आहेत. या संचात एकूण ८ प्रकारातली ई-जर्नल्स उपलब्ध झाली आहेत, ती पुढीलप्रमाणे:

मी स्वत: Electronics and Telecommuniction Engineer आहे आणि माझी दोन्ही मुले ह्याच क्षेत्रातील Engineer आहेत. त्यांच्या शिक्षणादरम्यान त्यांना अनेकदा अवघड वाटणार्‍या बर्‍याच Topics ना ह्या ई-जर्नल्स मुळे खूप सहाय्य झाले.

ह्या व्यतिरिक्त दुसर्‍या क्षेत्रांतील अमूल्य माहिती अत्यंत सुलभ व सोप्या पध्दतीने समजण्यास खूप मोलाचा हातभार ही जर्नल्स लावतात. समजा आपण मेडीकल फिल्डचे नाही आहोत तरी एखाद्या आजाराची माहिती , त्याची संभाव्य कारणे, समज-गैरसमज ह्याबद्दल देखिल अत्यंत महत्त्वाची माहिती येथे अनेक निष्णात डॉकटरांनी इतक्या सहजपणे समजावून दिली आहे की आपल्या मनातील भीती पार दूर पळून जाते आणि आपल्याला त्या विषयाचे छान ज्ञान ही मिळते, तेही विना सायास , ना कोठे शोधाशोध करायची गरज, ना कुठे फी भरायची गरज, अगदी बसल्या जागी ! म्हणूनच सदगुरु हा प्रत्यक्ष मित्रच असतो - अनेक जन्मांचा कधीही साथ न सोडणारा एकमेवाद्वितीय सखा !      

विशेष महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे "लाभेवीण प्रेम" करणार्‍या ह्या माझ्या सदगुरुंनी आपल्या मित्रांसाठी हे ज्ञानाचे दालन विनामूल्य अगदी फुकट उपलब्ध करून दिले आहे. म्हणतात ना खर्‍या मैत्रीत देवाण घेवाण नसते व्यवहारी पैशाची, असते फक्त नि:स्वार्थ प्रेमाची उधळण ! 


ह्या माझ्या एकमेव प्रत्यक्ष मित्राला - माझ्या सदगुरुंना मैत्रीदिनाच्या अनिरूध्द शुभेच्छा ! त्याच बरोबरीने वाचकांनाही अनिरूध्द शुभेच्छा ! 

संदर्भ: 

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

Samirsinh Dattopadhye 's Official Blog