Friday, 11 May 2018

मेरे साईनाथ - काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप मेरे साईबाबा !

श्रीसाईसच्चरित के अध्याय ३ में हेमाडपंतजी बहुत प्यार से हमें हमारे साईनाथ की सत्ता के बारे में बतातें हैं कि - जो खुद मेरे साईनाथ मे मुझे भी और साथ ही अपने सारे बच्चों को गवाही दी है - अपनी जुबान से !

काल के भी जबड़े में से।
निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा।
करते ही केवल मत्कथाश्रवण
(मेरी कथा का श्रवण)।
रोगनिरसन भी हो जायेगा॥
इस गवाही में यह मालूम हो जाता है कि मेरे साईबाबा की सिर्फ चराचर यानि सजीव , निर्जीव सूष्टी पर ही नहीं बल्कि काल पर भी सत्ता है। हम जानतें हैं कि काल की सत्ता तो हम सभी जीवों पर होती है, फिर भी काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप साईनाथ हमें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि काल के जबड़े में फँसे हुए अपने भक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा अर्थात उसकी रक्षा करूँगा। मृत्यु के जबड़े में फँसे हुए श्रद्धावान को छुड़ाने का सामर्थ्य केवल एकमात्र सद्गुरुतत्त्व के पास ही होता है, अन्य किसी के भी पास नहीं होता।
                                                                         
     

इसी बात का प्रमाण हेमाडपंतजी हमें अध्याय २३ में शामा के जीवन की एक कथा से देतें हैं । माधवराव देशपांडे उर्फ बाबा के लाडले शामा को सांप कांटता है और पूरे बदन में जहर फैलने लगता है । शामा को शिरडी वासी लोग उस वक्त की मान्यता अनुसार बिरोबा (यानि महादेव ) के मंदिर में ले जाना चाहतें हैं ताकि उनका जहर उतर जाए , पर शामा जाने से मना करता है। बाद में शामा के चाचा निमोणकर जी उन्हें बाबा की उदी देतें हैं , उसे भी शामा अस्विकार करतें हैं और सिर्फ अपने साई के चरणों में अनन्य भाव से शरणागती पाने जातें हैं द्वारकामाई में ।   वहां पर पहले तो साईनाथ बहुत क्रोधित होकर शामा को मशीदमाई की पगडंडी भी चढने से मना कर देतें हैं - साईनाथ स्पष्ट शब्दों में आज्ञा देतें हैं कि हे ब्राम्हिन ! चल निकल जा यहां से , नीचे उतर जा । शामा जी ब्राम्हिन थे तो बाबा उन्हें उसीसे पुकारतें हैं । शामा फिर भी वहां से नहीं हट जाता, जो होना है वो मेरा हो जाएगा , किंतु मैं मेरे बाबा के चरणों को छोडकर कहीं ओर नहीं जाऊंगा , यह होता है निजभक्त - साईनाथ का निजभक्त !

अर्थात बाद में साईबाबा का गुस्सा , उनकी आज्ञा जहर को थी , और शामा  को थी ही नहीं इस बात का पता चलता है । हेमाडपंतजी हमें इस कथा का विशेष महत्त्व बतातें हैं कि मेरे साईनाथ ने ना तो कोई मंत्र का उच्च्चारण किया नाही अन्य मांत्रिक -तांत्रिक लोगों की तरह कोई चावल उतारा कें फेंकें नहीं थे , बस्स एक मात्र मेरे साईनाथ की आज्ञा - चल निकल जा नीचे उतर- यह वाक्य ही जहर उतारने के लिए पर्याप्त था । मेरे साईनाथ तो काल के भी काल है ।  काल के भी काल होनेवाले महाकाल स्वरूप मेरे साईनाथ है - तो भला क्या काल उनके शब्दों को कभी धुतकार सकता हैं - कभी नहीं , ये कदापि मुमकीन नहीं । मेरे साईनाथ ही सत्यसंकल्प प्रभु है - उनका हर शब्द केवल सत्य ही सत्य होता है !

हेमाडपंत जी हमें  दूसरी कथा भी ऐसी बतातें हैं जो मेरे साईनाथ की काल पर सत्ता सिध्द करने के लिए पर्याप्त है ।  शामा की कथा में तो हम देखतें हैं कि साईबाबा ने एक मान्व के प्राणों की रक्षा काल के मुंह से की थी , किंतु ४७ अध्याय में हम सांप और मेंढक की कथा पढतें हैं जिस कथा में सांप के मुंह में एक मेंढक इस बुरी तरह से फंसा रहता हैं कि मानों अभी वह सांप उसको निगल जाएगा और वह मेंढक की मौत हो जाएगी । किंतु साईनाथ की आज्ञा सुनने मात्र से ही सांप वहांसे मेंढक को छोडकर भाग खडा हुआ था । यह कथा भी हमें बताती हैं कि मेरे साईनाथ की आज्ञा काल को भी सुननी ही पडती है , चाहे वो इंसान की मौत हो या चाहे किसी अन्य जीव मात्र की मौत हो , सब पर सत्त्ता चलाने वाले काल को मेरे साईनाथ के सामने सिर झुकाना ही पडता है ।

किंतु साईबाबा के शब्दों को हमें गौर से सुनना भी चाहिए - बाबा कहतें हैं कि काल के भी जबड़े में से। निजभक्त को मैं खींचकर बाहर निकाल लूँगा। हमें तो सिर्फ भक्त पता होता है - जो साईबाबा को अपना मानता है, उनकी भक्ती करता है , उनका जप करता है, उनकी पूजा करता है । किंतु साईनाथ चाहतें हैं कि उनके बच्चों का उन्पर अटूट विश्वास हो, उनपर अडिग श्रध्दा हो और इसिलिए ऐसे भक्त को साईनाथ अपना निजभक्त बतातें हैं ।

मेरे साईनाथ मेरी रक्षा करने के लिए और हमारे साईनाथ हमारी रक्षा करने के लिए सर्वथा समर्थ तो हैं ही, परन्तु यह हमारे जीवन में सच होने के लिए, ‘क्या हम साईनाथ के ‘निजभक्त’ हैं’, इस बात का हमें विचार करना आवश्यक है। शामा की कथा तो हमें समझाती है कि साईबाबा का निजभक्त कैसा अटल होता है, अपने साईनाथ के चरणों में उसकी श्रध्दा , भक्ती कैसी अविचल होती है । मेंढक की कथा हमें बताती है कि भले मेरी भक्ती की ताकद कम पड जाए तो भी मेरा साईनाथ - मुझे काल के जबडे से भी निकाल सकता है, इतनी उसकी सत्ता काल पर है ।

इस निजभक्त के बारे में अधिक सविस्तर स्वरूप से मैंने एक बहुत ही सुंदर लेख पढा - जिससे मुझे समझ में आया कि मेरे साईनाथ किसे अपना निजभक्त मानतें हैं , मुझे साईनाथ का निजभक्त बनने के लिए क्या करना चाहिए, मेरी साईनाथ के चरणों में किस तरह की भक्ती होनी चाहिए । मुझे पूरा यकीन है कि आप भी जरूर जानना चाहेंगे , तो चलिए पढतें  है- साईनाथ के निजभक्त होने का राज और प्रयास करतें हैं - हम साईनाथ के निजभक्त बन जाएं ऐसा -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay3-part13/

करते ही केवल मत्कथाश्रवण।
रोगनिरसन हो जायेगा॥

साईनाथ यहां हमें उनकी कथाओं का महत्त्व बता रहें हैं - भीमाजी पाटील की कथा में हम देखतें हैं कि नाना चांदोरकरजी ने साईनाथ के बारे में जो बातें बतायी , उससे ही भीमाजी ने शिरडी जाकर साईनाथ के दर्शन करने की ठान ली थी । हेमाडपंतजी बडी खुबी के साथ हमें यह बात विदीत करतें हैं कि भीमाजीने नाना  को खत लिखा , नाना का स्मरण यानि साईनाथ का स्मरण । वो ही शुभशकुन भी था और वो ही रोग का निरसन भी था । साईनाथ की कथा यानि साईनाथ की लीलाओं का बखान यानि साईनाथ का नाम का जाप । सिर्फ यह करने से भी रोग का निरसन हो ही जाएगा  किंतु क्या मेरे मन में उतना विश्वास है, उतना मेरे मन में साईनाथ पर भरोसा है? हम सामान्य मानव है, हमारे मन में सौ तरीके के बुरे खयाल , संशय , तर्क-कुतर्क आतें ही रहतें हैं जो हमारे विश्वास को कमजोर बनाती है । इसिलिए सिर्फ साईनाथ की ही कथा मुझे सुननी चाहिए, सिर्फ और सिर्फ मेरे साईनाथ के चरणों पर ही मुझे विश्वास रखना चाहिए, मुझे किसी भी अन्य की कथा नहीं सुननी चाहिए , मुझे मेरे मन की कथा भी नहीं सुननी चाहिए , मुझे मेरे खुद से ही जादा भरोसा मेरे साईनाथ पर रखना चाहिए , जैसे शामा ने रखा था , काका दीक्षित ने रखा था , म्हालसापती ने रखा था । तभी मेरे साईनाथ मेरे रो का निरसन करेंगे ही - १०८ % सत्य!         

Wednesday, 21 March 2018

एलॉन मस्क - द्रष्ट्या उद्योजकाची गगनभरारी !

दैनिक प्रत्यक्ष नववर्ष विशेषांक - १ जानेवारी २०१८ चा विशेषांक हा वाचकांसाठी दीपस्तंभच आहे जणू ! समुद्राच्या गर्भात दडलेल्या अनेक भीषण तटरेषा (तटरेखा),प्राणघातक उथळ पाण्याचे प्रवाह, रीफ,  बंदराच्या सुरक्षित प्रवेशासंबंधी जसे एखादा दीपस्तंभ  नाविक व स्थानिक कोळ्यांना (मासेमारी करणार्‍यांना) सूचना देत राहतो व त्यांच्या प्राणांचे अंधारातही सदैव संरक्षण करीत राहतो , त्याप्रमाणेच दैनिक प्रत्यक्षचा नववर्ष विशेषांक हा देखिल नव नवीन विषयांचे  एवढेच नव्हे तर जगात घडणार्‍या विशेष, विलक्षण आणि विक्षीप्त घटनांचे ज्ञान करवून देतो आणि त्याच वेळी काळाबरोबर वास्तवाचे भान ठेवून सजग राहायला, सभानतेने प्र्त्येक पाऊल टाकायला, चालायलाही शिकवितोच !

सर्वसामान्यत: अंधारातच माणसाचा नेहमी घात होत असतो आणि आता "तिसर्‍या महायुध्दाच्या " उभ्या ठाकलेल्या कराल काळाच्या जबड्यातून सही सलामत तरायला हा अज्ञानरूपी अंध:कार छेदणे ही अत्यावश्यक , अत्यंत निकडीची बाब आहे , हे जाणून दैनिक प्रत्यक्ष अशाच सर्वसमर्थ दीपस्तंभाची भूमिका निभावून माणसाला संकटांशी चार हात करायला खंबीर , चाणाक्ष , निडर , निर्भय बनविण्याचे महान कार्य करीत आहे , तेही तब्बल एक तप म्हणजे सातत्याने १२ वर्षे !”

                                                                      
’ एलॉन मस्क - द्रष्ट्या उद्योजकाची विस्मयकारी कथा ’ हा अंबरीष परळकर ह्यांनी लिहीलेला ७ पानांचा प्रदीर्घ लेख अशाच एका विशेष, विलक्षण आणि विक्षिप्त गोष्टींची नुसतीच आवड असणार्‍याच नाही तर तशीच स्वप्ने पाहून ती सत्यात उतरविणार्‍या एका प्रगाढ अभ्यासू वृत्तीच्या, असामान्य बुध्दीमत्तेच्या , अपार मेहनत घेण्याची , धडाडीने अशक्यप्राय वाटणार्‍या जगावेगळ्या संकल्पनांमध्ये सर्वस्व ओतण्याची अद्वितीय जिद्द अंगी बाणविलेल्या, व ते सत्यात उतरविण्यासाठी लागणार्‍या कोणत्याही स्वरूपाचा धोका देखिल पत्करण्याची तयारी व हे सर्व करण्याची अजब क्षमता देखिल असणार्‍या व्यक्तिमत्त्वाचा परिचय करवून देतो.

अवघ्या १५ दिवसांच्या अवधीत अंतराळ, वाहन व उर्जा ह्या तीनही क्षेत्रांमधील विलक्षण संभाव्य बदल व भवितव्याचे संकेत देणार्‍या तीन घटना वाचताना त्यामागील परमेशवराने निर्मिलेल्या ह्या ’अजब मेंदू’ चा आवाका पाहून तोंड विस्मयाने विस्फारले जाते . ’गरज ही शोधाची जननी आहे’ असे वाचले होते पण दूरदृष्टीने माणूस अशी अति विशाल, उत्तुंग गगन भरारी घेऊ शकतो व जगात अशी मानवाच्या सर्वकष, सर्वांगीण विकासाचा विचार करणारी माणसे आहेत हे पाहून त्या जगन्नियत्यांच्या मानव बनविण्याच्या कृतीमागचा उद्देश्यही दृष्टीगोचर होतो.
२१ व्या शतकातील मानवाची अंतराळातील झेप किती आवश्यक आहे हे जाणवले ते त्या द्रष्ट्या उद्योजकाच्या ’स्पेसेक्स’ ने जेव्हा सप्टेंबर २०००८ मध्ये ’फाल्कन १ ’ ह्या रॉकेटने पृथ्वीबाहेरच्या कक्षेत यशस्वी झेप घेतली आणि अंतराळ युगातील एका नव्या पर्वाची सुरुवात झाली त्या मागील चित्तथरारक पार्श्वभूमी वाचताना.!
२०१० साली पहिलं ’रियुजेबल स्पेस्क्राफ्ट’ आणि त्यानंतर अवघ्या पाचच वर्षांत २०१५ साली ’रियुजेबल रॉकेटचे लॅंडींग ’ ह्या घटना केवळ ’स्पेसेक्स’ कंपनीच्या नव्हे तर अंतराळक्षेत्राच्या इतिहासातील देखिल अत्यंत महत्त्वाच्या मानल्या जातात.

लहानपणी आपण सारेच अनेक स्वप्ने पाहतो पण ती सत्यात उतरविण्यासाठी क्वचितच हाताच्या बोटांवर मोजण्या इतकी माणसेच चिकाटीने, जिद्दीने, धडाडीने अपरंपार कष्ट घेतात असे चित्र समाजात दिसते. परंतु एलॉन मस्क ह्यांच्या कर्तुत्त्वाची यशोगाथा वाचताना मात्र माणूस काय करू शकतो परमेश्वरने दिलेल्या अफाट बुध्दीमत्तेच्या जोरावर ह्याचे प्रत्यंतर पदोपदी येते. लहानपणापासूनच पृथ्वीपलिकडील विश्वाने झपाटलेल्या मस्क ह्यांनी शालेय जीवनातच ह्याची सुरुवात केली होती असे म्हटले तर वावगे ठरणार नाही कारन त्यांनी वयाच्या अवघ्या १२ व्या वर्षी ’ब्लास्टर’ नावाचा जो गेम तयार केला होता त्याची संकल्पनाच मुळी परग्रहावरून संहारक क्षेत्रे घेऊन आलेली अंतराळयाने पाडणे ही म्हणजेच अंतराळक्षेत्राशीच जुळलेली होती. आपल्या मराठीत ह्याच करिता म्हण दृढ झाली असावी -’मुलाचे पाय पाळण्यात दिसतात.’

’टेसला मोटर्स’ ह्या एलॉन मस्क ह्यांच्याच दुसर्‍या कंपनीने जगाला दिलेली देणगी तर अतुलनीयच आहे. जगातील प्रत्येक रस्त्यावर किफायतशीर ’इलेक्ट्रीक कार’ असावी हे आपले स्वप्न सत्यात उतरविण्यासाठी एलॉन मस्क ह्यांनी ’टेसला’ कडून तयार करण्यात आलेल्या इलेक्ट्रीक गाड्यांचे तंत्रज्ञान जगातील सर्व कंपन्यासाठी खुले केले, हे करून त्यांनी वातावरणातील प्रदूषण रोखण्याचा सोपा मार्ग आमच्या समस्त मानवजातीच्या हाती सोपविला.
’सोलर सिटी’ , ’सोलर रूफ’ ह्या संकल्पना म्हणजे तर उर्जा क्षेत्राला  दिलेले वरदानच जणू ज्या योगे जगाला ’शाश्वत उर्जेच्या" दिशेने पुढे नेण्यासाठी एक नवीन पाऊल टाकून आगळी वेगळी दिशाच दाखविली होती.
’हायपरलूप’ - विमानाच्या दुप्पट वेग असणारी , हवामानाचा कोणताही परिणाम न होणारी व कमी उर्जेचा वापर असणारी वाहतूक यंत्रणा व हे तंत्रज्ञान आणि ते विकसित केल्यानंतर त्याचे पेटंट न घेता ,कोट्यावधी डॉलर्सच्या कमाईवर बिनधास्तपणे सोडलेले पाणी पाहता  एलॉन मस्क हा केवळ खोर्‍याने पैसा ओढणारा उद्योजक नसून त्याच्या संशोधनाद्वारे त्याची ठाम भूमिका , उदात्त विचारसरणी आणि मानवजातीसाठी आमूलाग्र बदल घडवून आणण्याची प्रेरणा कारणीभूत असल्याचे आढळते.

हायपरलूप व अंडरग्राउंड टनेलिंग हे तंत्रज्ञान मंगळावर वापरण्यासाठी उपयुक्त ठरेल असे एलॉन मस्क ह्यांनी संकेत दिले होते. पृथ्वीवर काहीतरी आदळून मृत्यु येण्यापेक्षा मंगळावर मृत्यु आलेला आवडेल असे म्हणणार्‍या एलॉन मस्क ह्यांनी आपल्याला ह्याच आयुष्य़ात मानवाने मंगळावर पाऊल ठेवलेले पहायचे आहे अशी बाळगलेली महत्त्वाकांक्षा आणि त्यासाठी मंगळावर आपली ’रोडस्टर’ ही ’ऑल इलेक्ट्रीक कार ’ पाठविण्याची तयारी ह्याची जबरदस्त साक्ष देते.

त्यानंतर अवघ्या सव्वा दोन महिन्यांच्या कालावधीनंतर १२ मार्च २०१८ रोजी अमेरीकेतील टेक्सास येथे झालेल्या एका कार्यक्रमात बोलताना एलॉन मस्क ह्यांनी तिसरे महायुध्द भडकल्यास पृथ्वीवर पुन्हा एकदा ’अंधारयुग’ येण्याची शक्यता वर्तवून , पृथ्वीवर पुन्हा  मानवी जीवनाची सुरुवात करण्यास अंतराळातील चंद्र व मंगळावरील तळ महत्त्वाची भूमिका बजावतील असा दावा केल्याचे दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक १३ मार्च २०१८ रोजीच्या ’तिसरे महायुध्द’ ह्या विशेष भागात प्रतिपादन केले आहे.

गेल्या वर्षीच एलॉन मस्क ह्यांनी चंद्रावर मानवी वस्तीचा समावेश असणारा ’मून बेस अल्फा’ व मंगळावरील मानवी वस्तीची योजना असणारा ’मार्स सिटी प्लॅन’ यांची घोषणा केली होती तर नुकत्याच १२ मार्च २०१८ रोजी ऑस्टिन शहरातील ’एसएक्सएसडब्ल्यू  कॉनफरन्स ’ मधील एका कार्यक्रमात पुढील वर्षाच्या म्हणजे २०१९ च्या पहिल्या ६ महिन्यांतच अंतराळक्षेत्रातील त्यांच्या मालकीच्या आघाडीच्या ’स्पेसेक्स ’ ह्या खाजगी कंपनीकडून ’इंटरप्लॅनेटरी ’ प्रकारातील अंतराळयाने तयार होतील व त्यामुळे दोन ग्रहांमधील प्रवासाचा अवधी खूपच कमी होईल अशी ग्वाही दिली. परंतु त्याच बरोबरीने मंगळावर जाणारे पहिले मानवी पथक मोठा धोका पत्करणारे असेल ह्या वास्तवाचे संकेतही द्यायला मस्क विसरले नाहीत. एलॉन मस्क ह्यांनी स्पष्ट शब्दांत तंबी देखिल दिली की मंगळावरील पहिले मिशन हा श्रीमंत लोकांसाठी सुटकेचा गु्प्तपणे रचलेला कट नाही ( the first missions to Mars will not be "an escape hatch for rich people" ). मंगळावर जाणारे लोक हे अगदी मूलभूत गोष्टीं पासून समाज निर्माण करतील आणि त्याकरिताच प्रचंड आर्थिक पाठबळाची गरज आहे.

’आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स ’ अर्थात कृत्रिम बुध्दीमत्ता ह्याच्या धोक्यांबद्दल सातत्याने आवाज उठविणारा  ’ओपन ए आय’ हा उपक्रम जागतिक पातळीवर बहुतांश व्यासपीठावरून राबविणे ह्यातून एलॉन मस्क ह्यांची जगाला तिसर्‍या महायुध्दातील होऊ घातलेल्या भीषण नरसंहारापासून वाचविण्याची अटाटी दिसते.

’न्यूरालिंक ’ द्वारे मानवी मेंदूला संगणकाशी जोडून मेंदूशी निगडीत गंभीर आजारांवर उपचार करण्यासाठी उत्पादन येत्या ४ वर्षांत  विकसित करण्याची मस्क ह्यांची महत्त्वाकांक्षेला परमेश्वरी वरदहस्त व सहाय्य लाभो अशी त्या परमेश्वराच्या चरणी प्रार्थना !

टीप - " एलॉन मस्क - द्रष्ट्या उद्योजकाची गगनभरारी !  " हा लेख दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक २१ मार्च २०१८ च्या अंकात "व्यासपीठ" ह्या सदरात पान क्रमांक ८ वर प्रथम छापून आला होता.  

Monday, 12 March 2018

गुरुवंचन महादुष्कृती ।पापास नाही तया निष्कृती ।।

दैनिक प्रत्यक्ष में हर रोज एक जाप १२ बार लिखने के लिए दिया जाता है , जिससे उस दिन की हमारी सद्गुरु की या भगवान की प्रार्थना तो होती ही है , पर साथ ही में सद्गुरु के या भगवान के किसी गुण से हमारा परिचय होता है या फिर हमारा उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए और कैसा बर्ताव नही  होना चाहिए इस के बारे में भी अनमोल ऐसा मार्गदर्शन प्राप्त होता है ।
दिनांक १ मार्च २०१८ के दिन ऐसी ही गुरु के साथ शिष्य नें कैसा व्यवहार करना नहीं चाहिए , इस के बारे में एक अनमोल ओवी/ जाप आया था, जो देखकर मन में यकायक भगवान  श्रीकृष्णजी और उनके दोस्त सुदामा की कहानी आ गयी ।
वो जाप/ओवी थी -
गुरुवंचन महादुष्कृती ।पापास नाही तया निष्कृती ।।
अर्थ- अपने गुरु से /सद्गुरु  से वंचना करना , यानि उन्हें फसाने की कोई भी  कृति करना , यह सबसे बडी , महा दुष्कृती  है , जिस के पाप विमोचन के लिए कोई भी कृती होई नहीं सकती है , यानि उसे कोई भी विधान या उपाय नहीं बताया गया है ।
यह ओवी श्रीसाईसच्चरित के अध्याय ३८ में १३९ ओवी के रूप में आती है । 

नाना चांदोरकरजी की गलती से बिनीवाले जी को गोदा के तीर पर होनेवाले भगवान दत्तजी का दर्शन नहीं मिल पाता और तब साईनाथ क्रोध धारण करके नाना को रास्ते में क्या हुआ था पूंछतें हैं ।  नाना चांदोरकरजी को अपनी गलती का एहसास हो जाता है और तभी मन में आता है कि मैं झूठ बोलकर मेरे सदगुरु साईनाथ की वंचना करूंगा, उन्हें फसाने जैसा दुष्कृत्य नहीं है, तो भले ही वो क्रोदित हो जाए, मुझे उन्हें सच ही बताना चाहिए और साईनाथ को फसाने का जादा पाप नहीं ढोना चाहिए । 

श्रीसाईसच्चरित के अध्याय २४ में हेमाडपंतजी उपर निर्देशित की हुई भगवान श्रीकृष्ण और उनके दोस्त, मित्र सुदामा की कहानी हमें बतातें हैं।एक बार कृष्ण , उनके बडे भाई बलराम और उनके मित्र सुदामा , अपने गुरु के आश्रम में उनकी सेवा कर रहें थे।तब गुरू पत्नी ने कृष्ण और बलरामजी को जंगल (अरण्य ) में जाकर लकडी लाने की आज्ञा की और बाद में उनके पीछे से सुदामा को भेजा और उसके साथ में जंगल/अरण्य में घूमतें वक्त अगर भूख (क्षुधा) लगें तो खाने के लिए चने दे दिए और यह तीनों के खाने के लिए यह भी सूचित किया था । 
बाद में जंगल में जब कॄष्ण सुदामा को मिलतें हैं , तब बोलतें हैं कि हे दादा (मेरे बडे भाई) मुझे प्यास लगी है ।  उसपर सुदामा के पास गुरु पत्नी  ने दिए हुए चने होने के बावजूद भी वह झूठ बात बोलतें हैं कि आप भूखे (खाली- बिना कुछ खाए ) पेट पर पानी मत पिजीए , चाहिए तो थोडा विश्राम कर लिजीए । पर सुदामा उनके पास गुरु पत्नी ने दिए हुए चने कृष्ण को खाने नहीं देतें ।  कृष्ण सुदामा के कहने पर उनकी गोदी में अपना सर रखकर विश्राम  कर रहें थें, और उनकी आंख लग गई , यह देखकर सुदामा अकेले ही चने खाने लगे  ।

सर्वसाक्षी  भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा को उनकी गलती का एहसास दिलाने के लिए एक बार स्पष्ट रूप से पूछा भी कि ," दादा (बडे भाई) आप क्या खा रहें हो? यह आवाज कैसा है? तब भी  सुदामा उनसे झूठ ही बोलतें है कि यहां पर खाने के लिए क्या हैं ? ठंड से मेरे दांत बज रहें हैं और मुख से विष्णुसहस्त्रनाम का उच्चारण भी स्पष्टता से नहीं कर पा रहा हूं । सुदामा का यह (झूठा) उत्तर सुनकर सर्वसाक्षी , सर्वश्रेष्ठ (परात्पर) कृष्ण भगवान बोलें ," मुझे भी वैसे ही सचमुच का सपना आया कि एक की वस्तु जब दूसरा (बिनापूछे या छुपाकर या फसाकर ) खा रहा है और वो जब पूछता है कि आप क्या खा रहें हो? तब वह दूसरा (फसानेवाला) बोलता मैं क्या खाऊं गा ? यहां क्या है, मिट्टी ! तब पहला बोलता है "तथास्तु यानि वैसे ही हो ।  फिर कृष्ण कहतें हैं कि अरें दादा यह तो सपना ही था ।   आप मुझे छोडकर कभी भी , कुछ भी खा सकतें हों क्या? आप को मैंने आप क्या खा रहें हों , यह सवाल पूछा , वो भी इसी सपने के भ्रम में पडकर ।   

बाद में हेमाडपंतजी स्वंय बता रहें हैं कि बचपन में अगर सुदामा कृष्ण भगवान की लीला को जानते होते , तो उनके हाथों से यह बहुतही बडी गलती (बहुत बडा प्रमाद - अपराध ) नहीं होता था और उसका इतना घोर परिणाम भी उन्हें नहीं भगतना पडता था  ।   वो घोर परिणाम यह था कि सुदामा को बहुत ही भयानक दरिद्रता को भोगना पडा ,क्यों कि स्वंय परमात्मा कृष्ण भगवान जिनके सखा थे, फिर भी सुदामा ने अपने भगवान को फसाने का , उनकी वंचना करने का बहुत बडा पाप किया था , जिसके लिए कोई भी छुटकारा देनेवाला उपाय नहीं हैं ।    ऐसे देखा जाए तो लगेगा कि सुदामा तो नीती में थोडा ही चूंक गए थे, किंतु उससे भी उन्हें संसार में बहुत बडी हानी , नुकसान , सहना पडा था ।    फिर भी भगवान कृष्ण स्वंय परम दयालु, कृपा करनेवाले, क्षमाशील होने की वजह से जब सुदामा ने स्व पत्नी के कष्ट से मिलाए हुए एक मुठी चावल(पोवा) कृष्ण भगवान को बडे प्यार से अर्पण किए , तो भगवान कृष्ण ने प्रसन्न चित्त होकर सुदामा को ऐश्वर्य से तृप्त कर दिया था ।  

ऐसी ही और एक कथा स्मरण हुई जो बताती हैं गुरु की वंचना करना , कितनी महा दुष्कृती होता है ।   भृगुशिष्य़ भगवान  परशुरामजी  और कर्ण की ब्रम्हास्त्र की कथा । (महाभारत शान्ति पर्व में ’राजधर्मानुशासन पर्व ’ में इस कथा का उल्लेख आता है )

 महाभारत के उस पर्वकाल में  वेदव्यास , कौरव और पांडवो के राजगुरु द्रोणाचार्य और भगवान परशुरामजी इन्हीं को सिर्फ ब्रम्हास्त्र विद्या  का ज्ञान था और उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी , उनमें से द्रोणाचार्यजी ने यह ब्रम्हास्त्र विद्या  अर्जुन को प्रदान की थी ।  कर्ण का लालन-पालन राधा मा ने किया था और इसी वजह से वह सूतपुत्र कहलाया जाता था , यदपि वह वास्तव में ज्येष्ठ कुंतीपुत्र ही था । (यह सत्य महाभारत के युध्द में कर्ण के मृत्यु तक सिवा कुंती, भगवान कृष्ण और कर्ण के अलावा किसी को पता नहीं था ) ।
द्रोणाचार्य ने कर्ण कि सूत पुत्र होने के कारण से उसे ब्रमास्त्र विद्या सिखाने से मना कर दिया था । अर्जुन को युध्द में  परास्त करने के लिए कर्ण को ब्रमास्त्र विद्या हासिल करना अनिवर्य बन गया था । तब कर्ण ने भगवान परशुराम से ब्रम्हास्त्र विद्या हासिल करने का तय कर लिया था । किंतु परशुरामजीने प्रण किया था कि वे यह ब्रमास्त्र विद्या  सिर्फ ब्राम्हण को ही सिखायेंगें , क्यों कि क्षत्रिय क्रोध और आवेश में आकर ब्रम्हास्त्र विद्या का दुरुपयोग कर सकतें हैं इस बात की संभावना उस वक्त स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी ।

तब कर्ण ने भगवान परशुराम के पास जाकर खुद को ब्राम्हण पुत्र बताकर  पहले बहुत  सारे शस्त्रों की विद्या ग्रहण कर ली और बाद मे यह ब्रम्हास्त्र विद्या भी  सीख ली । लेकिन यह उसने बहुत बडे पाप को गले लगाया था क्यों कि आदरणीय, पूज्यनीय गुरु भगवान परशुराम को उसने अंधेरे में रखकर, कपट से , उनकी वंचना कर के, उन्हें फसाकर धोखे से यह विद्या ग्रहण कर ली थी । 

गुरु की वंचना यह महा दुष्कृती बतलाई जाती है, जिसके पाप की कोई दुष्कृती  नहीं होती है । कर्ण ने जो यह महादुष्कृती की थी , उसका परिणाम भी वैसा ही खतरनाक होगा यह बात स्पष्ट थी ।

एक दिन जंगल में परशुरामजी और कर्ण जाते हुए, परशुरामजी विश्राम करने हेतु से कर्ण के गोदी में अपना सिर रखकर सो जातें हैं । तब एक बहुत ही जहरीला कीडा कर्ण की जांघ पर आकर बैठ जाता है और अपने स्वभावानुसार वो कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगता है । अपने गुरु की नींद ना टूटे इस डर से कर्ण बहुत ही असामान्य धैर्य जुटाकर बडी ही सहनशीलता से चुपचाप वह कीडे का डंक , उसकी वेदना सह लेता है । किंतु वह कीडा कर्ण के जांघ पर बडा घाव बना लेता है और उससे लगातार खून बहने लगता है । खून की धारा बहने अगती है और खून के गीले स्पर्श मात्र से भगवान परशुराजी की नींद खुल जाती है । कर्ण की असामान्य सहनशीलता देखकर भगवान परशुराम जी तुरंतही जान जातें हैं कि कर्ण ब्राम्हण हो ही नहीं सकता क्यों कि किसी ब्राम्हण में इअतनी सहनशीलता हो ही नहीं सकती । इसका मतलब स्पष्ट था कि कर्ण ने अपने गुरु भगवान परशुराम की वंचना की है, उन्हें फंसाकर , कपट से , धोखे से उनसे ब्रम्हास्त्र विद्या ग्रहण कर ली है । भगवान परशुराम तुरंत ही जान जातें हैं कि कर्ण जरूर कोई क्षत्रिय ही हो सकता है । भगवान परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठतें हैं और कर्ण से सचाई पूंछतें हैं । कर्ण सच तो बता देता है कि वह ब्राम्हण पुत्र नहीं हैं । तब आग बबूला हुए भगवान परशुराम, क्रोधित होकर, गुरु से वंचना करने की महादुष्कृती करनेका दु:साहस करनेवाले  कर्ण को उसी समय शाप भी दें देतें हैं कि कर्ण ने भगवान परशुराम  जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर, उनकी वंचना करके , उन्हें फंसाकर , धोखे सी सीखी है इसलिए जब भी उसे (कर्ण को ) इस ब्रमास्त्र विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी वह उसे भूल जाएगा , इतना ही नहीं तो और उस वक्त कोई भी अन्य दिव्यास्त्र का उपयोग भी वह (कर्ण ) नहीं कर पाएगा ।    
                                                                  
महाभारत के शांति पर्व में  इसी बात को स्पष्ट करने वाला एक श्लोक भी है -   

ब्राह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।
निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृति:।।

हे राजन्! ब्राह्म हत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रत तोड़ने वाले के लिए शास्त्र में प्रायश्चित का विधान है, परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं बताया गया है।

                                                                                    -वेदव्यास (महाभारत, शान्ति पर्व, 172/25)

शास्त्र में यह बताया जाता है कि - कृतघ्नता एक महापाप !!

शास्त्रों में यदि किसी पाप के प्रायश्चित का विधान नहीं है तो वो एक मात्र पाप है कृतघ्नता । किसी के किये बड़े से बड़े उपकार को न मानना उसके साथ विश्वास घात करना इसे ही कृतघ्नता कहा जाता है ' कृतं परोपकारं हन्तीति कृतघ्न:' । प्रत्येक मनुष्य को कृतज्ञ होना चाहिए यही मनुष्य का आभूषण है । 

कृतज्ञ होना यानि आदिमाता दुर्गा के चरणों में अंबज्ञ रहना , सदा के लिए । इसी लिए हमें अपने गुरु के साथ सदैव कृतज्ञ भाव से, अंबज्ञही रहना है । सर्वसाक्षी गुरु से, परात्पर गुरु से वंचना करना यानि अपने पैर पर अपने ही हाथों कुल्हाडी मारना, खुद कि लिए मौत  का कुंआ खोदने समान ही है, इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए ।  
 

Monday, 26 February 2018

वीरांगना मेजर कुमुद डोग्राला सलाम ...... दिव्यत्त्वाची जेथे प्रचिती तेथे कर माझे जुळती !!!

दैनिक प्रत्यक्षच्या १६ फेब्रुवारीच्या अंकात एक बातमी वाचताना काळजात कालवाकालव झाली होती की आसाममध्ये ब्रम्हपुत्रा नदीत असलेल्या माजुली बेटावर भारतीय वायूदलाचे विमान कोसळून झालेल्या दुर्घटनेत  जोरहाट येथील १० विंग एअर फोर्सचे विंग् कमांडर जय पॉल जेम्स आणि विंग कमांडर डी वॅट्स ह्या दोन वैमानिकांचा मृत्यु ओढावला. आसाम मध्ये ह्याच माजुली बेटावर लोक मनोरंजनासाठी , पर्यटनासाठी जातात आणि अशाच जागी ह्या दोन्ही वैमानिकांचा मृत्यु ओढावावा ही किती दु:खद घटना आहे. त्या घटनेचे मनातून विचार सरत नाही तोवर ट्विटर ह्या सोशल मिडीयावर जे चित्र दिसले ते पाहून तर काळजाचे पाणी पाणी झाले. 
                                                                      

विंग कमांडर दुष्यंत वॅट्स ह्यांच्या वीरपत्नी मेजर कुमुद डोग्रा ह्या आपल्या शहीद पतीच्या अंतिम संस्कारासाठी ५ दिवसाच्या तान्ह्या मुलीला घेऊन भारतीय सैनिकी गणवेशात हजर झाल्या , तेव्हा प्रत्येकाचे हात ह्या वीरांगनेला सलामी देण्यासाठी उंचावले गेले. पित्याच्या मृत्युची बातमी आली तेव्हा विंग कमांडर डी वॅट्स ह्यांची नवजात कन्या अवघी चार दिवसांची होती. एरव्ही बाळ झाले म्हणजे नुकत्याच जन्मलेल्या त्या बाळाची व बाळंतिणीची  म्हणजेच त्या तान्ह्या बाळाच्या आईची किती किती काळजी  घेतली जाते , किती कौतुक केले जाते. बाळाच्या आईला आरामाची गरज असते. पण येथे नियतीने क्रूर डाव खेळला होता परंतु ह्या भारतमातेच्या शूर वीरांगनेने ना नियतीपुढे हात टेकले ना काळापुढे मान झुकविली. आपल्या लहानग्या मुलाला पाठीशी बांधून इंग्रजाच्या सैन्याला आपल्या तलवारीने पाणी पाजून,नामोहरम करणाऱ्या झाशीच्या राणी लक्ष्मीबाई शिंदे ह्यांचाच जणू पाऊलावर पाऊल ठेवले होते मेजतर कुमुद डोग्रांनी ! अशा वीरांगनेला प्रसवून भारतमातेची कूस आज नक्की धन्यता मानीत असेल नाही?  

कोणत्याही पत्नीला आप ल्या पतीच्या निधनाची बातमी कळल्यावर आभाळच फाटते जणू, किती मोठा आघात असतो हा, किती मोठा दु:खाचा डोंगरच कोसळला असतो ...पण अशाही प्रसंगी जेव्हा एखादी वीरांगना आपल्या पतीला मानवंदना देण्यासाठी असे असामान्य धैर्य एकवटते आणि गाठते तेव्हा अर्थातच धैर्याची परिसीमाच ओलांडली असते तिने... अशा प्रसंगाला शब्दांत काय वर्णन तरी करणार ?

कवी बा,भ, बोरकर ह्यांच्या कवितेच्या ओळी स्मरतात आणि मानवंदनेसाठी हात नकळतच जोडले जातात हेच तर खरे दिव्यत्व !

दिव्यत्वाची जेथ प्रचिती
तेथे कर माझे जुळती ॥धृ.॥

गाळुनिया भाळीचे मोती
हरिकृपेचे मळे उगवती
जलदांपरी येऊनिया जाती
जग ज्यांची न करी गणती ॥१॥

यज्ञी ज्यांनी देऊनि निजशिर
घडिले मानवतेचे मंदिर
परि जयांच्या दहनभूमिवर
नाहि चिरा नाहि पणती ॥२॥

जिथे विपत्ती जाळी उजळी
निसर्ग-लीला निळी काजळी
कथुनि कायसे काळिज निखळी
एकाची सगळी वसती ॥३॥

मध्यरात्रि नभघुमटाखाली
शांतिशिरी तम चवर्‍या ढाळी
त्यक्त, बहिष्कृत मी ज्या काळी
एकांगी डोळे भरती ॥४॥


आदिमाता महिषासुरमर्दिनी आपल्या दुर्गा स्वरूपाने ह्या वीरांगनेला जणू जीवनाची लढाई खेळण्याची असीम प्रेरणा, शौर्याची देणगी १८ हातांनी बहाल करती झाली आहे जणू !

तिच्या मनोधैर्याला खरोखर मन:पूर्वक अनंतवार मानाची सलामी !!!
अशा वीरांगना जिच्या उदरी जन्म घेतात त्या भारतभूमीचा जयजयकार आसमंतात दुमदुमणारच हे निर्विवाद सत्य!
जय हिंद ! जय भारत !

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

Samirsinh Dattopadhye 's Official Blog