Thursday, 13 April 2017

रासायनिक दहशतवादाची इशाराघंटा

दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक ०६-०४-२०१७ च्या अंकातील आंतरराष्ट्रीय बातम्या सदरात " सिरीयातील रासायनिक हल्ल्यात १०० जणांचा बळी " - जगभरातून तीव्र प्रतिक्रिया  -ह्या बातमीने काळजाचा खरोखरी थरकांप उडाला. सिरीयाच्या ’इदलिब" प्रांतातील ’खान शेखोन’ ह्या शहरात मंगळवारी अमानुष रासायनिक हल्ला झाला ज्यात किमान १०० जणांचा बळी गेला होता तर ४०० हून अधिक लोक गंभीररित्या जखमी झाले होते. गेल्या ६ वर्षांपासून सिरियामध्ये सुरु असलेल्या गृहयुध्दातील हा सर्वात भीषण रासायनिक हल्ला मानला जातो.’सरीन ’ ह्या विषारी वायूचा वापर केलेल्या रॉकेट्सचे हल्ले ह्या शहरावर करण्यात आले. जगभरातून अतिशय संतप्त आणि तीव्र प्रतिक्रिया उमटत आहेत. 

हा अमानुष घृणास्पद हल्ला कोणीही चढविला असला तरी ह्यात स्त्रिया, लहान मुलांचाच  मोठ्या प्रमाणावर बळी गेला आहे ह्याची दखल  न घेऊन चालणार नाही. 

 

सरीन हा अत्यंत प्राणघातक विषारी नर्व्ह वायू आहे, जो पर्सिस्टन्ट किंवा सेमीपर्सिस्टन्ट द्रव पदार्थाच्या स्वरूपात उपलब्ध असतो, जो न दिसणार्‍या वाफा निर्माण करतो, या वाफांना वासही नसतो. हा वायू डोळे, श्वसनमार्ग, त्वचेतून शरीरात प्रवेश करतो. ह्याचे दृश्य परिणाम म्हणजे डोके दुखणे, छातीवर दडपण येणे/जाणवणे, डोळ्यांची बुब्बुळे लहान होणे. तसेच मज्जासंस्थेवरही ह्या वायूचा गंभीर परिणाम होऊन परिणामी मृत्युही होऊ शकतो. 

सरीन हा सर्वात घातक आणि त्वरीत प्रभावी ठरणारा रासायनिक पदार्थ आहे, जो श्वासावाटे शरीरात गेला असता किंवा त्वचेवाटे शरीरात शोषला गेला असता तात्काळ फुफ्फुसे, स्नायु, आणि मज्जासंस्थेचे भाग ह्यावर परिणाम करतो, आणि ज्यामुळे श्वासाची घुसमट सुरु होऊन गुदमरणे, आंकडी किंवा फिटस येणे, पॅरालिसीसचा झटका येणे, आणि वेळप्रसंगी मत्यु सुध्दा संभवतो.   

सरीन हे रासायनिक अस्त्र १९३८ मध्ये नाझी शास्त्रज्ञांनी शोधून काढले होते आणि आंतरराष्ट्रीय कायद्यानुसार  १९९३ मध्ये त्याच्या वापरावर  प्रतिबंध आणला गेला होता. असे असून देखिल सरीन ह्या विषारी वायूचा वापर युध्दात पूर्वीदेखिल केला गेला होता असे आढळते.
सिरियन सैन्याने २०१३ मध्ये दमास्कस प्रांतात केलेल्या हल्ल्यात १४०० हून अधिक लोक मारले गेले होते. ’इदलिब’ प्रांतात तर मंगळवारी झालेला रासायनिक हल्ला हा दुसर्‍यांदा झाला आहे, त्या आधी २५ मार्च रोजी ’लाताम्नेह’ शहरातील एका रूग्णालयावर झालेल्या हल्ल्यात एका डॉक्टरसह २ रूग्णांचा देखिल बळी गेला होता.

'वर्ल्ड हेल्थ ऑरगनायझेशन' (WHO) च्या एका अहवालानुसार 'सरीन' हा वायू विषारी समजल्या जाणार्‍या सायनाईड वायुच्याही २६ पटीने जास्त प्राणघातक आहे ह्यावरून ह्या हल्ल्याची तीव्रता आणि होणारे विदारक दुष्परिणाम ह्यांची अवाढव्य व्याप्ती किती आवाक्याबाहेरची असेल हे ध्यानी येते.   

सिरियामध्ये ह्या आधी घडलेल्या रासायनिक हल्ल्यांची जबाबदारी ’आयएस’ ने स्विकारली होती. इराकच्या मोसूल प्रांतातील रूग्णालयातून तसेच सिरियन लष्कराच्या शस्त्रास्त्राच्या कोठारातून ’आयएस’च्या दहशतवाद्यांनी  विषारी वायू आणि रासायनिक रॉकेट्सची चोरी केल्यामुळे ’आयएस’चे दहशतवादी त्या रासायनिक शस्त्रास्त्रांचा कसा आणि कधी वापर करतील ह्याबाबत चिंतेचा घोर सार्‍यांच्याच मागे लागून राहिला आहे.      

सिरियात झालेल्या रासायनिक हल्ल्यानंतर अमेरिकेने सिरियातील हवाईतळांवर क्षेपणास्त्र हल्ला केला आहे. भूमध्य समुद्रातल्या युद्धनौकांमधून सुमारे ६० टॉमहॉक क्षेपणास्त्रांचा मारा केला गेला. मध्य सिरियातील सरकारनियंत्रित हवाईतळावर हा हल्ला झाला आहे. याच तळावरून सिरियन लष्करी विमानांनी रायासनिक हल्ल्यासाठी उड्डाण केले होते.

हा सर्व विध्वंस पाहता रासायनिक दहशतवादाची इशारघंटा ऐकून आपल्यावर हे संकट अजून ओढावले नाही तोवर शांत बसू असे बघ्याची भूमिका घेऊन चालणार नाही . काही दिवसांपूर्वी पाकिस्ताननेही अफगाणिस्तान सीमेवर रासायनिक हल्ला केल्याच्या बातम्या आल्या होत्या. यानंतर भारताच्या लष्करप्रमुखांनी रासायनिक हल्ल्याविरोधात सज्ज राहण्यास भारतीय यंत्रणांना सांगितले होते. आपल्या शेजारी देशाच्या भारतद्वेषाबद्दल काही नव्याने सांगायला नको. तसेच त्या देशावरील दहशतवाद्यांचा वाढलेला प्रभाव भारतासाठी डोकेदुखी आहे. पाकिस्तानकडील अण्वस्त्रांबरोबर रासायनिक शस्त्रेही दहशतवाद्यांच्या हाती लागण्याची शक्यता नाकारता येणार नाही. त्यामुळे भारताने अशा हल्ल्यासाठी सज्ज राहणे गरजेचे आहे.
संदर्भ:
१. दैनिक प्रत्यक्ष दिनांक ०६-०४-२०१७
२. तिसरे महायुध्द - लेखक डॉ. अनिरूध्द धैर्यधर जोशी
३.  Disasater Management - Aniruddha's Academy of Disasater Management 

सूचना - हा लेख पहिल्यांदा दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक १३-०४-२०१७ रोजीच्या अंकात ’व्यासपीठ" ह्या सदरात प्रसिध्द झाला होता. 

Saturday, 8 April 2017

साईकथा का अचिंत्यदानी फल -जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई।

हरि ॐ.
ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय़ नम:
श्रीसाईसचरित में साईकथा पढ्ते हुए हमें साईकथा को अपने जीवन में कितनी अहमियत देनी चाहिए, ये कथा पढकर हमें साईबाबा के पथ पर हमारे साईबाबा की उंगली थामकर कैसे चलना है, बिना किसी झिझक से, बिना किसी संदेह से ! इन बातों की तरफ गौर फर्माना अत्यंत आवश्यक है ।  हमें श्रीसाईसच्चरित में साईबाबा की कथाएं पढकर छोड नहीं देना है, या भूल नहीं जाना है । जब कोई भक्त साईनाथ की कथा श्रवण कर रहा होता है, उन कथाओं का पठन कर रहा होता है, उनका मनन, चिन्तन कर रहा होता है, साई प्रेम में अपनी सूध बूध खो बैठता है और सिर्फ साईबाबा को ही प्यार से निहारता है, साईबाबा की लीलाओं के रसपान में ही पूरी तरह डूब जाता है , पूरी तरह से तल्लीन हो जाता है, तो ऐसे समय उस भक्त को अपनी चिंता करने की जरूरी नहीं होती क्यों कि साईनाथ खुद अपने ऐसे भक्तों का ध्यान सदैव रखते ही हैं। हम सामान्य मानव ही, आगे क्या घटना घटित होने वाली है, हम इसके प्रति कुछ मालूम नहीं हो सकता ,परन्तु बाबा मात्र सबकुछ जानते हैं इसीलिए हम पर जब कोई संकट-मुसीबत आनेवाला होता है, तब हम साईकथा में, उनकी लीलाओं में खोये रहने के कारण स्वयं साईनाथ ही उस संकट को, उस मुसीबत को मुझ तक आने से पहले ही उस संकट का, मुसीबत का निवारण कर चुके होते हैं। उनकी योजना ही कुछ ऐसी होती है कि वह संकट अथवा मुसीबत हमें छू भी नहीं सकते हैं। 

साईनाथ की इस भक्तवत्सलता के बारे में और उनकी बिना किसी हेतू से अपने भक्तों की भलाई ही करने के स्वभाव के बारे में कुछ अनोखी बातें पढने में आई , जिससे मेरे साईबाबा का मेरे प्रति कितना प्यार रहता है, हमेशा मेरी भलाई हो, मेरे रास्ते के मुसीबत मुझे जरा सी भी तकलीफ भी ना पहुचाए इसिलिए मेरे साईबाबा ही कितनी सभानता रखतें हैं , हमारे लिए हमारे साईबाबा के कितना परिश्रम करतें हैं ,कितनी कठोर मेहनत करतें हैं , इसका अंदाजा आया और साई के चरणो  के प्रति और जादा प्यार उमड आया । लेखक महोदयजीने अपने लेख में -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part15/

इस बात को उजागर किया है भली भांति से कि -
मान लो की मेरी उपासना अथवा सेवा में उस समय इतनी शक्ती नही है कि उससे मेरे प्रारब्धभोग का समूल नाश हो सके, तब साईनाथ ऐसी योजना करते हैं कि, उस मुसीबत की घड़ी में मुझे हर प्रकार की सहायता अपने आप मिलते रहती है। लेखक जी ने रोजाना की जिंदगी में आनेवाली आकस्मिक मुसीबत के बारे में बताकर हमें बहुत ही सुंदरता से समझाया है कि मेरे साईबाबा कैसे हर पल मेरा साथ निभाते हैं ।  उस कथा को लेखकजी के जुबानी पढना, सुनना जादा मुनासिब रहेगा । इसिलिए आप सभी उपर दिए हुए लिंक पर जाकर उसें पढें ।

भले ही मेरे पास भक्ती का , उपास्ना का , सेवा का कोई भी पुण्य नहीं जुटा है , फिर भी ऐसा इंसान जब साईबाबा की चौखट पें अपना सिर रखता है, तभी साईबाबा उसे धुतकारतें नहीं, या वापस लौटातें नहीं , बल्कि अपनी  कृपा से उसके प्रारब्धभोग का समूल नाश कर देंते हैं और उसकी फटी झोली खुद ही  सिलाकर अपनी करूणा से, क्रुपा से भर देतें हैं ।  यही बात दिखलाती है भीमाजी पाटील की कथा ।   

अध्याय १३ में भीमाजी पाटील की कथा में हम यह बात अच्छी तरह देख सकतें हैं कि भीमाजी पहले सुखी जीवन बिता रहें हैं , उन्हें कोई दुख नहीं है,ना कोई परेशानी ।  घर में मानो सुख के भांडार भरें पडे है, पर उस समय भीमाजी को भगवान की याद नहीं आती । फिर यकायक उनके जीवन में क्षय की जानलेवा बीमारी आ जाती है। अनगिनत कोशिशों के बावजूद या दवा की कोशिशों के बावजूद  भीमाजी अपने जीने की आशा खो बैठतें हैं और तभी अचानक उन्हें अपने दोस्त नाना चांदोरकरजी की याद उन्हें खुद साईनाथ ही दिलातें हैं - यह है मेरे साईबाबा का अनोखा प्लान ! भीमाजी नाना चांदोरकरजी का खत पढतें ही साईबाबा को मिलाने शिरडी जातें हैं और करूणा के सागर, कृपासिंधु साईबाबा बिना किसी औषधी के सिर्फ अपनी कृपादृष्टी से ही भीमाजी को ठीक कर देतें हैं । रात में दो विचीत्र सपने में आकर साईबाबा इस बीमारी से उन्हें मुक्ती दिलातें हैं ।यहां हमें हमारी साईबाबा का अपने बच्चों के प्रति लगाव , और अनोखा प्यार समझ में आता है ।

यह हो गयी बीमारी या जानलेवा खतरे की बात । किंतु अगर मैं अपनी सुध-बुध खोकर भी  भक्ती करना चाहता  हूं , तो वहां भी मेरा साईनाथ खडा रहता ही है, अपने बच्चे की सहायता के लिए ,तत्पर खडा रहता है, हाजिर रहता है । भले ही उसका वो बच्चा उसे अपनी मुसीबत की घडी में आवाज देकर, बुहार लगाकर, पुकार कर बुलाने में समर्थ ना हो , फिर भी साईनाथ अपने उस बच्चे का खयाल रखने के लिए वचनबध्द है ही -
 जिस जिस पथ पर भक्त साई का , वहां खडा है साई । 

अध्याय २२ में हेमाडपंतजी हमें अपने स्वंय का अनुभव सुनातें हैं कि वो काका दीक्षितजी के मकान पर रात को "रामकथा " का पाठ सुनने जातें हैं और रामकथा सुनने में इतने मगन होजाते है कि अपनी सुध -बुध खो बैठतें हैं । तब उनके दाहिने कांधे पर के उपरण में एक बिच्छू आकर बैठ जाता है। परन्तु रामकथा के चलते काफी समय  बितने के बावजूद भी बिच्छू वहाँ पर बैठे रहने पर भी वह उन्हें दंश नहीं कर सकता है। हेमाडपंत का ‘ध्यान(मन)’ पूर्णत: रामकथा सुनने में मगन  हो गया था, वह बिच्छू कब आकर उनके उपरण में बैठ गया इस बात पर उनका ध्यान भले ही न हो, परन्तु जो हरिकथा में दक्ष है उसकी ओर साईबाबा का पूरा ध्यान है। बाबा ही फ़िर समय रहते ही हेमाडपंत का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हैं और उस संकट से उन्हें बचाते हैं। बिच्छू उनके उपरण में इतने समय तक बैठे रहने के बावजूद भी वह हेमाडपंत को दंश नहीं कर सका।   
हेमाडपंतजी यह बात बतातें हैं कि -
यहाँ पर भी बाबा का ध्यान। मेरा न था वहाँ पर ध्यान।
पर जो हरिकथा में दक्ष। उसके संरक्षक हरि स्वयंता॥

यह बात हमें सिखाती हैं -
मेरे साईबाबा की कथा मुझे  कैसा बिना सोचा हुआ - अचित्यदानी फल देती है और मेरे साईबाबा कैसे मेरे हर पल , हर कदम पर मेरे साथ है ही -१०८ % सच बात - जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

Wednesday, 5 April 2017

मेरे साई को दिल में उतारने का आसान उपाय - साईकथा बारंबार सुनना !



                                                      ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय नम:


तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है
फिरूँ तुझे संग लेके , नये नये रंग लेके
सपनों की महफिले में 
१९६१ साल का "माया" पिक्चर का यह गाना बहुत ही मशहूर हुआ था , जिसके बोल मजरूह सुल्तानपुरीजी ने लिखे थे और सलीलदा के संगीत का अनोखा जादू भरके उसमें मानों चार चांद जुड गये थे । देखिए यह फिल्मी गीत हमें कितनी आसानी से प्यार की परिभाषा सिखाता हैं । आम जिंदगी में हमें जो चीज भा जाती है  या जो इंसान से हमें प्यार हो जाता है उसे हम बारंबार याद करतें हैं , उसकी तस्वीर मानो दिल में उतार लेंतें हैं , चाहे वो नन्हा सा प्यारा सा बच्चा हो या फिर नौजवान युवक हो या युवती हो या फिर कोई दिल को छू जानेवाली किताब हो या फिर फिल्म हो या फिर कोई मन को लुभानेवाला फिल्मी गाना हो । जो चीज हमें अच्छी लगती हैं , या भा जाती हैं , उस चीज को या इंसान को हम बार बार याद करते रहतें हैं ।
ये हो गयी हमें अच्छी लगनेवाली बात के बारे में पर कभी कभी ना चाहनेवाली बात भी हमें याद रखने के लिए बल जोरीसे ना चाहते हुए भी बार बार करनी पडती है । स्कूल के दिनों में कोई ना कोई बिषय से हमारी दुश्मनी रहती है , जिसे हमें ना चाहते हुए भी पढना पडता था जैसे की मॅथ्स के फॉर्म्युले हो या शास्त्र के नियम हो या इतिहास के साल हो, हमें जो चीज पसंद नहीं उसे भी बारंबार याद करके ही हमारी याददाश्त में वो तस्वीर बन जाती है ।

इससे ये बात तो हम समझ ही जातें हैं कि चाही या अनचाही बात की तस्वीर दिल में उतारने के लिए हमें हमेशा वो  चीज बारंबार करनी पडती है । अभी हेमाडपंतजी तो हमें पहले ही अध्याय में बतातें हैं कि मेरे साई से इतना प्यार किजीए कि हर जगह मुझे बस्स मेरे साईबाबा ही नजर आने चाहिए । तस्वीर तेरी दिल में जिस दिन से उतारी है, फिरूँ तुझे संग लेके , नये नये रंग लेके इसका आसान सा अर्थ मैंने यह जाना ।
हेमाडपंतजी कहतें हैं कि-
ज्या ज्या दुज्या तुज उपमावें । तो तो आहेस तूंचि स्वभावें । 
जें जें काहीं दृष्टीस पडावें । तें तें नटावें त्वां स्वयें ।। ४९ ।। 
                                                                                       - अध्याय १ , श्रीसाईसच्चरित

यानि कि मैं किसी भी चीज की उपमा तुम्हें देने की बात सोचूं भी तो हे मेरे साईनाथ तुजमें तो वो गुण पूरा का पूरा पहले से ही बसता है, और मैं जो भी देखू तो मुझे वहां बस तू ही तू खुद नजर आता है।
आहे दूसरी ओवी में भी हेमाडपंतजी लिखतें हैं कि
साईंनी मज कृपा करून । अनुग्रहिले जैंपासून । 
तयांचेंचि मज अहर्निश चिंतन । भवभयकृतंन तेणेनि ।। ७८ ।।
                                                                                              - अध्याय १ , श्रीसाईसच्चरित

याने हेमाडपंतजी ने जिस दिन साईं की धूलभेंट ली , उसी दिन से अपने साई कीं तस्वीर अपने दिल में उतार ली क्यों कि वे बारंबार अपने साईबाबा का ही चिंतन करने लगे थे । 

यह बात से पता चलता है कि अगर मुझे साईबाबा को अपना है, उन्हें मेरा अपना बनाना है , तो हमें हमारे साईबाबा को बार बार याद करना हैं , निहारना हैं , बारंबार उनकी कथा को सुनना है, पढना है ।

कोई कहेगा मैंने एक बार तो श्रीसाईसच्चरित पढ लिया, अब बार बार क्या पढना ? तो इस के बारे में मुझे याद आतें हैं मेरे साई के ही शब्द - स्वयं बाबा ने ही २१ वे अध्याय में एक प्रांत अधिकारी से कहा है, ‘आप्पा ने जो बताया है उसे पूर्ण रूप से आचरण में उतारने से ही भला होगा।’ और वो कैसे होगा  तो -
‘‘ग्रंथ करना है पहले श्रवण।
उसी को फ़िर करना है मनन।
फिर पारायण आवर्तन।
और करें निदिध्यासन।

पढ़ना ही का़फ़ी नहीं है।
ज़रूरी है उसे आचरण में लाना।’’

यह बारंबार ग्रंथ पडने से अपने आप ही मेरे साईबाबा की तस्वीर मेरे दिल में उतरने लगती है , बिना कोई कष्ट उठाए 
‘‘ग्रंथ करना है पहले श्रवण।
उसी को फ़िर करना है मनन।
फिर पारायण आवर्तन।
और करें निदिध्यासन।

पढ़ना ही का़फ़ी नहीं है।
ज़रूरी है उसे आचरण में लाना।’’
यह इतनी आसानी से सच में होता है क्या , इस बारे में मन में सवाल आया , तभी साईबाबा की कृपा से एक लेख पढने में आया जिस में  लेखक महाशय ने  मानव के मन को कोई भी चीज बारंबार क्यों करनी चाहिए इस बात को बहुत ही अनोखी ढंग से पेश किया था -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part14/

लेखक महाशय जी ने बताया-
अकसर हमसे यह कहा जाता है कि परमात्मा के चरित्र का, संतों के चरित्र का बारंबार पठन, मनन एवं चिंतन करना चाहिए। यहाँ पर बारंबार यह शब्द बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह बारंबार की जाने वाली क्रिया मन के लिए अति आवश्यक है। क्योंकि कोई भी बात मन को बारंबार बताने पर ही वह मन में गहराई तक उतर जाती है, अन्तर्मन में दृढ़ हो जाती है और इसके पश्‍चात् ही मन उसके अनुसार क्रिया कर सकता है।

बारंबार क्रिया करना यानि सावधानी बरतने की कोशिश करना ।सावधानी का अर्थ है- दक्षता,और यह दक्षता अकसर बुद्धि के पास होती है परन्तु मन के पास नहीं होती। चंचल रहनेवाले इस मन को बुद्धि बारंबार सचेत करती रहती है और यह मन एक शरारती बच्चे की तरह बुद्धि की बात बहुत कम सुनता है।
हमें सोचना चाहिए कि मैं खुद को साईबाबा का भक्त कहता हूं , लेकिन क्या साईबाबा को सही मायने में मैंने अपनाया हैं क्या ? बाकी सब चींजे मेरी होतीं हैं जैसे की मेरा पती , मेरी पत्नी ,मेरे बच्चे , मेरे मां-बाप, मेरी गाडी , मेरी सायकिल, मेरी कार,मेरा बंगला - सबकुछ मेरा है , पर क्या साई ’मेरा’ है? सच में साईबाबा मेरी जिंदगी में है भी या है ही नहीं ? सच देखा जाए तो साईबाबा अपने असीम प्यार से अपनी करूणा, अपनी क्षमा की वजह से मेरे जीवन में प्रवेश तो कर चुके हैं ही । पर मेरे मन में , दिल-दिमाग में बैठी कुमती रूप कैकयी और संशय रूप से रहनेवाली मंथरा के कारण ही मैं खुद स्वंय ही मेरे साईराम को वनवास भेजता हूं , मेरे जीवन में साईनाथ मेरे अपने बनकर ’कर्ता’ बनकर आना चाहतें हैं पर मैं ही उन्हें साक्षी भाव में बैथा देता हूं ।

मैं कहीं जाना चाहता हूं और आगे का खतरा देखकर मेरे साईबाबा मुझे जाने देना नहीं चाहतें हैं , मेरे रास्ते में वे रूकावट डालतें हैं कभी स्पष्ट रूप से तो कभी अस्पष्ट तरीके से - पर मेरा अंहकार मुझे मेरे साईबाबा की बात मानने नहीं देता - जैसे कभी मैं साईबाबा की बात अनसुनी कहकर तात्या कोते पाटील की तरह साईबाबा ने मना करने पर भी बाजार चला जाता हूं या कभी साईबाबा ने एक जगह रूकने की बात बताने पर भी अनसुनी कर के मैं आमीर शक्कर बन के बाबा से छुपाकर चला जाता हूं । इससे मैं  साईबाबा को नहीं बल्कि अपने आप को धोखा दे रहा हूं ।
जब मैं अपने जीवने में साईबाबा को "कर्ता" बनाता हूं तो मेरा "मैं" मेरे साईं की कृपा से मिट्टी में मिल जाता है और मेरे साईनाथ मेरी झोली आनंद , सुख , शांती , तृप्ती, समाधान से भर देतें हैं ।

मनुष्य की विवेकबुद्धि तो अच्छी होती है, लेकिन उसका मन चंचल होता है।जब कभी भी मन बुद्धि की बात सुनता है तब मनुष्य का फ़ायदा ही होता है। इसीलिए यह सावधानता विशेष तौर पर मन को ही सिखाना होता है। जब तक यह मन थोड़ी-बहुत गलती करता है वहाँ तक तो ठीक है, परन्तु जब वह अपनी मर्यादा की सीमा को तोड़ वाहियात हरकतें करने लगता है तब वह उस मनुष्य का आत्मघात करता है और इसीलिए सावधानी बरतना अति आवश्यक होता है।

साईबाबा की कथा बारंबार सुनने से मेरे साईबाबा को मैं अपने जीवन में "कर्ता" बनाता हूं और फिर साईबाबा मुझे सावधानी बरतने सिखा देतें हैं - जैसे कि काका महाजनी जब साईबाबा से मिलने और कृष्ण जन्म साईबाबा के साथ मनाने का सोचकर आये थे तब साईबाबा ने उन्हें तुरत ही उसी दिन वापिस लोट जाने को कहा था और कृष्ण जन्म भी मनाने के लिए रूकने नहीं दिया था । अभी काका महाजनीजी ने साईबाबा की बात सावधानी से सुनी इसिलिए उनके नौकरी में आनेवाली मुसीबत से वो बच गए । अगर महाजनी के दिल में साईबाबा की तस्वीर ना उतर गयी होती थी तो उन्हें अपनी नौकरी पर मुसीबत आ सकतीं थी ।

हेमाडपंतजी ने खुद अपनी जिंदगी में अपने साईबाबा की  तस्वीर पहली भेंट से ही उतार दी थी , साईबाबा का शब्द बारंबार सुनने  की आदत अपने आप को डाल रखी थी इसिलिए होली के दिन सपने में संन्यासी रूप में दर्शन देकर बात बताने पर भी हेमाडपंतजी घर तस्वीर रूप में पधारे साईबाबा को अपने घर में ही नही, बल्कि अपने दिल के सिंहासन पर बिठा सकें , जहां पर अच्छे भक्त होने के बावजूद अंह भाव के घेरे में पडकर, कुमती कैकयी और संशयरूपी मंथरा के चंगुल में फंसकर देव मामलेदार साईबाबा को अपने घर पर खुद ही न्यौता देकर आए हुए साईबाबा को पहचान नहीं पाए थे ।

चलिए सब बिचार छोडकर सिर्फ अपने साई की तस्वीर अपने दिल में उतारने की कोशिश करतें हैं क्यों कि यही मेरे साईबाबा की चाहत हैं ।

ॐ साईराम

Sunday, 2 April 2017

राम नामाची गोडी मला लाविली हो किती दयाळू गुरु माझी माउली हो....

चैत्र महिन्याची शुंभकरा नवरात्र सुरु झाली की चैत्र प्रतिपदेच्या पहिल्या गुढी पाडव्याच्या दिवसानंतर भारतीय जनमानसाला ओढ लागते ती रामनवमीची. राम नवमी म्हणजे राम जन्माचा उत्सव !
रामनामाशी आम्हा भारतीयांचा अतूट संबंध आहे. राम नाम म्हणजे नवचैतन्य, नवजीवन , नव संजीवनी ! राम म्हणजे सत्य-प्रेम आनंद ह्या त्रयीचा सुंदर पावन संगम ! राम म्हणजे सच्चिदानंद, पावित्र्य हेच प्रमाण ह्याची साक्ष पटविणारे मर्यादा-पुरुषार्थ जीवनी रूजविणारे एकमेवाद्वितीय परमात्म्याचे स्वरूप!

राम नामाची गोडी मला लाविली हो किती दयाळू गुरु माझी माउली हो....
स्टेजवर हा गजर जोरात रंगला होता आणि मनात विचार आला की
किती उचित आहे हा गजर, नाही? आम्ही सामान्य माणसे रोजच्या प्रापंचिक अडी-अडचणींनी, व्यथांनी एवढे गांजलेले असतो आणि तरीही हा काळाच्या कसोटीवर उतरलेला साधा-सोपा असा हा रामनामाच्या स्मरणाचा मार्ग चोखाळण्याची बुद्धी आम्हाला होत नाही. सहस्रनामाच्या तुलनेचे असणारे ताकदवान रामनाम आम्ही घेत नाही. आपण सदैव काम्य भक्तीनेच त्या परमात्म्याकडे वा सद्‍गुरुकडे सतत काही ना काही मागण्याच करीत राहतो आणि ’ह्यांना आपले खरे हित कशात आहे हे कसे कळत नाही’ ह्या विचाराने त्या दयाळू सद्गुरुमाऊलीचे अंत:करण तीळतीळ तुटत राहते.

पुढे हीच हरिनामाची, रामनामाची आवड सर्वसामान्य जीवांना लागण्यासाठी ही दयाळू गुरुमाऊली, सर्वसामान्यांना ओळखीची असलेल्या ’बँक’ संकल्पनेची नव्या रूपात ओळख करून देते - ’रामनाम बँके’च्या रूपात. १८ ऑगस्ट २००५ साली सद्गुरु डॉ. अनिरुद्ध जोशींनी ’अनिरुद्धाज् युनिव्हर्सल बँक ऑफ रामनाम’ ह्या संकल्पनेद्वारे कलिकाळावर मात करण्याचा, प्रारब्धाच्या तडाख्यातून सही-सलामत बाहेर काढण्याचा जणू रामबाण उपायच असलेले ’रामनामवही’रूपी एक शस्त्रच म्हणा, श्रद्धावानांच्या हाती सोपविले!


’रामनाम वही’ ही एक २२० पानांची वही आहे; ज्यात ’राम’, ’कृष्ण’, ’दत्तगुरु’, ’श्रीराम जय राम जय जय राम’, ’जय जय अनिरुद्ध हरि’ अशा वेगवेगळ्या नामांच्या द्वारे भक्ताला - सुखी, आनंदी करणाऱ्या सहजसोप्या नामस्मरणाची तोंडओळख करून दिली जाते.ह्या रामनामवहीच्या प्रत्येक पानावर भक्तिमार्गाचा अग्रणी श्रीरामभक्त हनुमंताचा वॉटरमार्क असतो, ज्यावर भक्त ही विविध नामे लिहीत असतो. ह्या हनुमंताच्या चित्राकृतीवर नाम लिहिण्यामागची खूप सुंदर कथाही सदगुरु डॉ. अनिरुद्ध जोशींनी विशद केली प्रवचनातून, ती म्हणजे - लंकेला जाण्यासाठी सेतू बांधताना हनुमंताने पाषाणांवर रामनाम लिहून त्या पाषाणांनी वानरसैनिकां करवी थेट ’श्रीरामेश्वर ते लंका’ असा अभेद्य सेतू समुद्रावर बांधून घेतला. सेतू बांधून पूर्ण झाल्यावर श्रीरामांनी स्वबंधू लक्ष्मणासह पहिले पाऊल टाकताच ’श्रीराम जय राम जय जय राम’ ह्या गर्जनेने वानरसैनिकांनी त्यांचे स्वागत केले. तेव्हा प्रसन्नचित्त श्रीरामांनी हा वर दिला होता की ’जो कुणी श्रीहनुमंताच्या रेखांकित चित्रावर रामनाम लिहील, त्याचे नाम दशगुणे वाढेल.’त्यामुळे साक्षात श्रीरामांनी दिलेल्या ह्या ग्वाहीचे स्मरण ठेवून रामनाम वहीची रचना तशीच केली गेली.
  
मनुष्याचे मन बहुतांश वेळा कुठलीही गोष्ट करू पाहते, ते केवळ फायद्यासाठीच. जसे व्यवहारात आपण पाहतोच की एखादा ’सेल’ लागला किंवा काही सवलती मिळणार असतील, तर ग्राहकराजा कशी धाव घेतो ते! मग ह्याचेही भान राखूनच ’रामनामवही लेखनाचे’ लाभ - श्रध्दावानांना समजावून दिले गेले. स्वत:च्या वैयक्तिक फायद्याबरोबरच रामनाम वही लिहीणार्‍या  श्रध्दावानांच्या गांठी दुहेरी पुण्य़ कसे जॊडले जाते ह्याची जाणीव करून देऊन.

ते म्हणजे रामनाम वहीचा अजून एक महत्त्वाचा फायदा असा की ही वही भक्त स्वत:साठीही लिहू शकतो किंवा दुसऱ्यासाठीही लिहू शकतो. आपल्या आप्तांच्या वाढदिवस किंवा तत्सम महत्त्वाच्या दिवशी त्या आप्ताच्या नावाने रामनामबँकेत जमा करू शकतो. उदा. आजी, आजोबा आपल्या नातवासाठी लिहू शकतात, मुले आपल्या आईवडिलांकरता-भावाबहिणीकरिता लिहू शकतात. तसेच एखाद्या आजारी आप्ताच्या किंवा दिवंगत आप्ताच्या नावाने लिहूनही जमा करू शकतात. म्हणजे कोणीही कोणाकरिताही ही वही लिहू शकतो. ह्यामुळे अमूल्य लाभ मिळाल्याचे अनेक भक्तांचे अनुभव आहेत - वही लिहिणाऱ्या व्यक्तीलाही आणि ज्याच्या नावे वही लिहिली गेली त्या व्यक्तीलाही!!!
  
रामनाम वही लिहिण्याचा महिमा बघायचा झाला तर एक उदाहरण वाचनात आलेले आठवले ते नमूद करावेसे वाटते -
’कृपासिंधु’ ह्या मराठी मासिकाच्या नोव्हेंबर २०१२ च्या अंकात आलेला रेखावीरा जोशी ह्या स्त्री श्रद्धावानाचा बोलका अनुभव ह्याविषयी आपल्याला खूप काही सांगून जातो!

वाघोटण सिंधुदुर्ग येथे राहणाऱ्या रेखावीरा जोशी - ’रामनाम वहीनेच तारले’ ह्या आपल्या अनुभवात सांगतात की १३ मार्च २०१२ ला रात्री ९.३० च्या सुमारास त्यांच्या आजोबांची अचानक डाव्या हाताची व पायाची हालचाल होईनाशी झाली होती. डॉक्टरने सीटीस्कॅन करून संभाव्य अटॅकची शक्यता सांगून त्वरित उपाय केले आणि चौथ्या दिवशी आजोबा सुखरूप घरी आले. पण ही गोष्ट घडायच्या साधारण एक महिना अगोदर ह्या स्त्री भक्ताने १८ फेब्रुवारी २०१२ ला आजोबांच्या नावे एक रामनाम वही लिहून रामनाम बँकेत जमा केली होती. येथे त्या श्रद्धावान स्त्रीचा हा दृढ भाव आहे की ही रामनाम वही लिहिल्यानेच तिच्या आजोबांना रामनामाने तारले.

तसे पाहता ह्या ’पॉवरफुल’ रामनामाची गोडी जनसामान्यांना लावण्यासाठी सद्गुरुतत्त्व हे  युगानुयुगे झटत आलेले आहे असे आढळते .सद्गुरु नारदांकडून मिळालेल्या रामनामाच्या दीक्षेने ऋषिश्रेष्ठ वाल्मीकिंनी भक्तिमार्गावर एवधा मोठा पल्ला गाठला की प्रभू श्रीरामांच्या जन्माआधीच "रामायण" हे महान काव्य रचून रामचरित्र लिहिते झाले.

कालांतराने समाजाला रामनामाचे विस्मरण होते आहे असे दिसताच, साक्षात भगवान शिवशंकरांनी बुधकौशिक ऋषींना स्वप्नात दृष्टांत देऊन श्रीरामरक्षा रचवून घेतली.

संत रामदास स्वामींनीही गावोगाव फिरून श्रीरामनामाची गोडी जनमानसांत रुजविली. संत तुलसीदासांनीही ’श्रीरामचरितमानस’ ही रचना केली. हा एवढा अट्टाहास करण्याचे कारण ह्या सर्व संतांनी रामनामाचे महत्त्व जाणले होते.
  
रामनामाने पतित पावन होतात, रामनामाचा लाभ गहन - खूप मोठा आहे, रामनामाच्या आवर्तनाने तुम्हाला जन्ममरणांचे धरणे सोडवता येईल. ’एका रामनामाचे हे कोटींगुणे लाभ माझ्या लेकरांना लाभोत’ ह्या सद्गुरु डॉ. अनिरुद्ध जोशींच्या कळवळ्यापोटीच श्रद्धावानांच्या  जीवनी रामनामवही अवतरली.
 
सदगुरु हा  नेहमी साध्या सोप्या प्रकाराने भक्तांना प्रपंच न सोडताही परमार्थ करायला शिकवतात तो असा. म्हणूनच एरवी ज्यांनी कदाचित रामनाम घ्यायला कंटाळा केला असता, असे असंख्य श्रध्दावान भक्त आज न कंटाळता रामनामवही लिहीताना आढळतात . ते प्रारब्धाच्या तडाख्यांना न घाबरता तोंड देतात, संकटांना न डगमगता सामोरे जातात ते ह्याच रामनाम वहीच्या ताकदीने... फावला वेळ असो की प्रवास असो, सच्चा श्रद्धावान हा हाती रामनाम वही घेतोच. किती सहज सोपा मार्ग त्या दयाळू गुरुमाऊलीने आम्हाला दाखवला.

म्हणूनच तर गजरात बेधुंद होऊन श्रद्धावानांचा नामघोष दुमदुमत होता ----
    "रामनामाची गोडी मला लाविली हो, किती दयाळू गुरु माझी माऊली हो"

ही कृतज्ञता व्यक्त होत होती श्रद्धावानांची आपल्या सद्गुरुपोटीची.

देवाने माणसाला चांगल्या घरी जन्म दिला, शिक्षण दिले, नोकरी-धंदा देऊन पोटापाण्याची व्यवस्थित सोय लावली, लग्न लावून संसार थाटून दिला. हे सगळे जर देवाने आपल्याला तरुण वयात दिले आहे, तर त्याच देवाचे आपण आभारही तरुण वयातच मागू. ही कृतज्ञता व्यक्त करणे म्हणजेच आपण देवाच्या चरणीं खर्‍या अर्थानें नतमस्तक होणे आणि हीच आहे ’अंबज्ञता’, जी देवाला अत्यंत प्रिय आहे - भक्ताचा भोळाभाबडा कृतज्ञतेचा भाव.

चला तर मग....आपणही  सारे रामनाम वही लिहून ही अंबज्ञता ’त्या’ रामाच्या आणि त्याच्या परमप्रिय आदिमातेच्या म्हणजेच रामनामाला तारक मंत्राचा वर देणा‍र्‍या श्रीरामवरदायिनीच्या चरणी वाहूया आणि ’अंबज्ञ’ होऊया...

सूचना: हा लेख पहिल्यांदा २०१४ मध्ये रामनवमीला http://ramnavamiutsav.aniruddhabapu.in/2014/04/aniruddhasuniversalbankoframanam.html ह्या बेवसाईटवर प्रसिध्द झाला होता. 

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

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