Monday, 21 August 2017

साईनाथ से संवाद करने - मन की पारदर्शकता जरूरी !



ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम: ।
साईनाथ से प्रत्यक्ष संवाद करने के लिए मन में भोलाभाव होना, अपने मन में  पारदर्शकता होना अती आवश्यक है। जब मैं अपने मैं को मेरे  साईनाथ के चरणों मे सौंपने की सोचता हू और मेरे मन में यह बात ठान लेता हू तब साईनाथ भी मेरा भार उठाने खुशी खुशी तैयार हो जातें हैं । साईनाथ मेरा भला-बुरा मुझसे भी अधिक अच्छी तरह से जानते हैं क्यों कि वोही सर्वज्ञ है, वो ही त्रिकालदर्शी भी है । मेरे लिए कोई चीज अगर अनुचित है तो मुझसे पहले मेरे साईनाथ जानतें हैं ।  

तात्या कोते पाटील की मां बायजाबाई साईबाबा को अपना पुत्र मानकर ही प्रेम करती थी  । तात्या साईनाथ को मामा कहकर पुकारतें थे और साईनाथ भी अपने भांजे का बहुत खयाल रखतें थे और प्यार भी करतें थे । तात्या पाटील एक दिन बाजार जाने निकलतें हैं और साईबाबा से अनुमती लेने जाते है ।  बाबा उन्हें जाने से रोकना चाहतें हैं पर तात्या को तो जाने की जल्दी पडी रहती है । बाबा के मना करने पर भी तात्या मानते नही और जल्दबाजी में निकल पडतें हैं और कितना बडा हादसा हो जाता है , फिर भी साईनाथ उनका बाल तक बां का नही होने देतें । तात्या को आगे चलकर क्या अनहोनी घटित होनेवाली है इसकी जरा सी भी नहीं पडती फिर भी बाबा की कृपा उन्हें बचा लेती है । यह बात स्पष्ट करती है कि तात्या को उनके लिए उस वक्त उचित क्या ? इस बात का पता  चल नही रहा था  ।

साईनाथ के दर्शन पाने हेतु नाशिक के प्रख्यात धुमाल वकील आते हैं तब साईबाबा उन्हें शिरडी से  बाहर  निफाड गांव जाकर तय हुए दिन कोर्ट का मुकदमा लडने नहीं  देते , और बाद में भी काफी दिन तक अपने पास ही रोख लेतें है शिरडी में । धुमाल वकील साईबाबा की अनुमती के बिना जाना उचित नहीं समझतें और बाद में पता चलता है के जज साहब कोर्ट में नही आ सकें थे । कोर्ट ने दी हुई तीन तारीख भी निकल जाती हैं और धुमाल वकील बाबा के रोकने पर शिरडी ही रूक जातें हैं  किंतु अंतिम निर्णय में उनके मुअकील की ही जय होती है  । इससे साईनाथ अपने बच्चों का, भक्तों का सदैव कल्याण ही करतें हैं , उन्हें विपदाओं से चार हाथ दूर ही रखतें हैं यह समझ में आता है ।

श्रीसाईसच्चरित में ऐसे कई उदाहरण हमें सिखातें हैं कि साईनाथ को हम अपना भार सौंप देतें हैं तो हमारा बेडा पार हो ही जाता है , भले हमें हमारे लिए क्या उचित है क्या अनुचित है इसकी पहचान ना भी हो । किंतु साईनाथ के प्रति हमारे मन में भोला भाव होना अत्यावश्यक होता है , तभी हम अपने परमात्मा से, सदगुरु से संवाद कर सकतें हैं ।  धुमाल वकील के मन में साईनाथ ने मना करने पर भी शंका- कुशंका नहीम पैदा होती ।  मेरे साईनाथ ने मुझे शिरडी में अपने पास रोक के रखा , इस में मेरी ही भलाई होगी, मेरे साईबाबा कभी भी मेरा अहित नही करेंगे, इस बात का पूरा भरोसा उन्हें था यानि साईबाबा के प्रति उनके मन में शुध्द भोला भाव ही था , इसिलिए द्वारकामाई की सिडी बाबा ने उन्हें चढने दी और उनका भला किया । यहां पर धुमाल वकील ने साईबाबा से संवाद कर लिया था  ।  साईनाथ पर पूरा  भरोसा रखना , उनके चरणों में अपना सर रखना और उनके हाथों में अपनी जीवन की बागडोर संभालने देना , उनके हाथॊ में अपना भार सौंप देना इसी में मेरी सब भलाई है यह राज धुमाल वकील जान गए थे और उनके साईनाथ ने भी उनका यह विश्वास, भरोसा टूट्ने नही दिया ।
 
अगर हमारे मन में अगर झूठा अंहकार हो या कोई विकल्प हो या कोई शंका हो तो हमारे इस  परमात्मा से, हमारे साईनाथ से हम संवाद  नहीं कर सकतें  । संवाद करना तो दूर की बात फिर तो साईबाबा द्वारकामाई  की सीढी भी चढने नहीं देतें , दर्शन नहीं देतें । हाजी की कथा हमें दिखाती है कि झूठे अंहकार और गरूर से चूर हाजी के मन में भोला पन नहीं था, उसे मका-मदिना की यात्रा करने का अंहकार था तो साईबाबा ने पूरे  नौ  महिने तक उसे द्वारका माई में पैर भी रखने नही दिया था, दर्शन नहीं दिया था । 

साईबाबा से अगर मुझे संवाद करना है तो मेरा मन साफ होना चाहिए, मेरे मन में भोला भाव होना चाहिए । इसके बारे में एक लेख पढने में आया -
यहां पर लेखक महोदयजी ने बहुत सरलता से , आसानी से यह बात समझायी है । वे शामा का आचरित हमें दिखातें हैं । 

माधवराव देशपांडे अर्थात बाबा का लाड़ला शामा। शामा दिनभर बाबा की सेवा तो करते ही थे पर इसके साथ ही वे आने-जाने वाले भक्तों की सेवा भी बड़े अपनेपन के साथ करते थे। बाबा से प्रत्यक्षरुप में कोई भी बात पूछने का साहस आम तौर पर कोई भी नहीं कर पाता था। माधवराव के कान पर अपनी बात डालकर भक्त अपनी तकलीफ़े आदि बाबा तक पहुँचाते थे। माधवराव भी  बिना किसी स्वार्थ के यह काम बड़ी ही आत्मीयता के साथ करते थे ।

माधवराव बिलकुल सीधे -साधे, भोले भाले भक्त थे । इसीलिए अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और ऐसा उनका स्वभाव बिलकुल नहीं था। उनके आचरण में पारदर्शकता नजर आती थी । बाबा पर उनकी अनन्य निष्ठा थी ।बाबा के चरणों पर अपरंपार प्रेम था एवं बाबाके लिए निरंतर सेवा करना यही उनका जीवन हेतू था । इन्हीं गुणों से परिपूर्ण ये भक्त अत्यन्त शुद्ध एवं स्वच्छ अन्त:करण के थे। इसी कारण वे ‘माध्यम’ बने, बाबा एवं भक्तों के बीच होने वाले संवाद के।

शामा के इस गुण को हमें ध्यान में रखकर अपने जीवन में साईबाबा से संवाद करने सिखना चाहिए ।

हमारे परमात्मा के साथ संवाद होने के लिए इसी प्रकार की पारदर्शकता ज़रूरी है यह बात हमें माधवराव से सीखनी चाहिए। उस समय शिरडी में जैसे यह बात निश्‍चित होती थी कि शामराव के माध्यम से बाबा के साथ संवाद साध्य करना है। वापस लौटने की आज्ञा लेनी हो आदि। शामा इस भोली भाविकता का आदर्श था और इसीलिए बाबा को उनकी चाहत थी। यही भोलीभावना भगवान को अधिक अच्छी लगती है। और यही भोलापन भगवान के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद साध्य करने का माध्यम होता है। इसी भोली भावना के कारण ही माधवराव बाबा के साथ सरलता से पेश आते थे कारण उनके अंदर कोई भी परदा नहीं था।

हेमाड्पंतजी हमे बतलातें हैं कि द्वारकामाई की सीढ़ी केवल भोला भाविक ही चढ़ सकता है। अन्य कोई भी नहीं। हम देखते हैं कि कुछ लोगों को बाबा द्वारकामाई की सीढ़ी भी नहीं चढ़ने देते। जिनके पास जरा सा भी बिलकुल अत्यल्प भी भोलाभाव नहीं होगा ऐसा घमंडी इन्सान भला कैसे द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ेगा? मन में शंका, विकल्प आदि कुछ भी हो, साईं की परीक्षा लेने कोई भी आये परन्तु उसके मन में भोलाभाव है इसलिए बाबा उसे द्वारकामाई में प्रवेश करने देते हैं। जैसे कि काका महाजनी जहां काम करतें थे उसका मालिक - धरमसी , मन में साईनाथ की परीक्षा लेने की ठानकर आया था फिर भी साईनाथ ने उसे द्वारका माई में पैर रखने दिया , इअतना ही नही उसके मन की कुशंकाओं का भी समाधान किया । वही मेघा की कथा में जब पहली बार वो शिरडी में आता है तो मन में विकल्प लेकर कि साईनाथ तो मुस्लिम है , मैं उन्हें अपना गुरु कैसे मान लूं , तो साईबाबा उसे द्वारकामाई में आने से रोक देतें हैं  ।  

‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाई की सीढ़ी है। हेमाडपंत बाबासे अनुमती माँगनेवाली कथा में सर्वप्रथम हमें इसी सत्य को उजागर करके दिखाते हैं। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा से प्रत्यक्षरूप में पूछने का साहस मुझमें नहीं था कारण यह मुझसे होगा या नहीं, मैं कहीं ‘छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ ना? इस तरह के विचार उनके मन में उठ रहे थे। इसके अलावा अपनी योग्यता के प्रतिकूल बाबा से यह पुछना उचित होगा क्या? ऐसा भी उन्होंने सोचा होगा। वे अपना स्थान अच्छी तरह से जानते थे और यही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। इसिलिए हेमाडपंत हमे बता सकतें हैं कि -

अपने ‘मैं’ को अर्पित करते ही साई-चरणों में। सौख्य पाओगे तुम अपरंपार।
संपूर्णत: सुखमय हो जायेगा तुम्हारा संसार। अहंकार दूर हो जायेगा॥

अपने ‘मैं’ को साईं के चरणों में अर्पित करने पर साई की प्रेरणा जीवन में प्रवाहित होती है और इसी कारण हमारा हर एक निर्णय अचूक साबित होता है।


भक्त को हमेशा अपने मन में साई के प्रति भोला भाव ही रखना चाहिए और बस ये कहना है - सब सौंप दिया है जीवन का भार तुम्हारे हाथों में अब हार मिले या जीत मिलें उपहार तुम्हारे हाथो में।और ऐसे शरणागत को साईनाथ कभी मायूस नहीं करतें , खाली हाथ तो कभी नहीं लौटातें क्यों कि उन्ही का यह वचन है कि
शरण मज आला आणि वाया गेला दाखवा दाखवा ऐसा कोणी ।  

जब हम अपना भार साई बाबा के हाथों मे सौंप देतें हैं तब उस हर एक निर्णय को अब ‘मैं’ नहीं बल्कि मेरे साई ही निश्‍चित करते रहते हैं। जिस तरह एक माँ अपने बच्चे के लिए सर्वोचित एवं सर्वोत्तम (APT) का ही चुनाव करती है, उसी तरह यह साईरूपी माता भी अपने बच्चे के लिए यानी मेरे लिए उचित का चुनाव करती रहती है। इसीलिए हमें अपने इस ‘मैं’ को बाबा के चरणों में ही अर्पित कर देना चाहिए। इसी में हमारा हित है, इससे हमें अपरंपार सौख्य प्राप्त होकर हमारा सारा जीवन ही सुखमय हो जाता है। सारा जीवन अर्थात ऐहिक जीवन के अन्तर्गत मन एवं बुद्धि के साथ-साथ पारलौकिक जीवन भी।

हेमाडपंत ने अपने इस ‘मैं’ को कब का श्रीसाई चरणों में अर्पित कर दिया था और इसी कारण साईप्रेरणा उनके जीवन में प्रवाहित हुई। साईप्रेरणा से ही साईसच्चरित विरचना की इच्छा उनके मन में जागृत  हुई। जब सद्गुरु से संबंधित ऐसा कोई कार्य करने की इच्छा मेरे मन में प्रकट होती है, तब इसके लिए प्रत्यक्ष रूप में उनकी अनुमती प्राप्त करना बहुत जरूरी है। यह साईनाथ का चरित्र है इसीलिए उनका अनुमोदन लेना बहुत ज़रूरी है यह बात हेमाडपंत भली-भाँति जानते हैं और वे हमें यही महत्त्वपूर्ण गुण सिखाते हैं कि कार्य चाहे कितना भी अच्छा और पवित्र क्यों न हो पर मुझे बाबा की प्रत्यक्षरुप में अनुमती लेकर ही उसे आरंभ करना है। बाबा के देहधारी होने पर उनसे प्रत्यक्षरुप में मिलकर उनके मुखसे अनुमति प्राप्त कर यह कार्य को आरंभ करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

मेरे मन में है इसलिए वह पूरा होगा ही, ऐसा न होकर हमारा विश्‍वास यह होना चाहिए कि बाबा के मुख से निकलेगा तो ही वह कार्य पूरा होगा, सुसंपूर्ण होगा यही इसके पिछे छिपा हुआ मर्म है। साईसच्चरित लिखना है यह मेरा संकल्प न होकर बाबा का ही संकल्प है यह बाबा के प्रत्यक्षरुप में कहने से ही स्पष्ट होगा। और बाबा का ही संकल्प पूर्ण सत्य है, यह बात हेमाडपंत अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिए हेमाडपंत निश्‍चय करते हैं कि इस कार्य के लिए बाबा की अनुमती प्राप्त करना बहुत ज़रूरी है। इसके बिना मैं मेरा कोई भी कार्य शुरु नहीं करूंगा । मुझे कुछ भी स्वेच्छा से , अपने मन से न करते हुए बाबा की इच्छा से ही करना है। हेमाडपंत का यह विशेष गुण हमारे लिए बहुत महत्त्व रखता है। बाबा जो भूमिका मुझे देंगे उसे मैं पूरी ईमानदारी के साथ निभाऊँगा, किसी अन्य की भूमिका कितनी भी अच्छी क्यों न हो परन्तु मैं उसे करने की कोशिश नहीं करूँगा कारण मेरे साईनाथ ही जानते हैं कि मेरे लिए उचित भूमिका कौन सी है?

हमारे परमात्मा के साथ संवाद होने के लिए इसी प्रकार की पारदर्शकता ज़रूरी है यह बात हमें माधवराव से सीखनी चाहिए। उस समय शिरडी में जैसे यह बात निश्‍चित होती थी कि शामराव के माध्यम से बाबा के साथ संवाद साध्य करना है। वापस लौटने की आज्ञा लेनी हो आदि। शामा इस भोली भाविकता का आदर्श था और इसीलिए बाबा को उनकी चाहत थी। यही भोलीभावना भगवान को अधिक अच्छी लगती है। और यही भोलापन भगवान के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद साध्य करने का माध्यम होता है। इसी भोली भावना के कारण ही माधवराव बाबा के साथ सरलता से पेश आते थे कारण उनके अंदर कोई भी परदा नहीं था। द्वारकामाई की सीढ़ी केवल भोला भाविक ही चढ़ सकता है। अन्य कोई भी नहीं। हम देखते हैं कि कुछ लोगों को बाबा द्वारकामाई की सीढ़ी भी नहीं चढ़ने देते। जिनके पास जरा सा भी बिलकुल अत्यल्प भी भोलाभाव नहीं होगा ऐसा घमंडी इन्सान भला कैसे द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ेगा? मन में शंका, विकल्प आदि कुछ भी हो, साईं की परीक्षा लेने कोई भी आये परन्तु उसके मन में भोलाभाव है इसलिए बाबा उसे द्वारकामाई में प्रवेश करने देते हैं। ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाईची की सीढ़ी है। हेमाडपंत बाबासे अनुमती माँगनेवाली कथा में सर्वप्रथम हमें इसी सत्य को उजागर करके दिखाते हैं। हेमाडपंत कहते हैं कि बाबा से प्रत्यक्षरूप में पूछने का साहस मुझमें नहीं था कारण यह मुझसे होगा या नहीं, मैं कहीं ‘छोटा मुँह बड़ी बात तो नहीं कर रहा हूँ ना? इस तरह के विचार उनके मन में उठ रहे थे। इसके अलावा अपनी योग्यता के प्रतिकूल बाबा से यह पुछना उचित होगा क्या? ऐसा भी उन्होंने सोचा होगा। वे अपना स्थान अच्छी तरह से जानते थे और यही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है।

ढूँढ रहा था योग्य अवसर । बाबा से पूछने का न था साहस।
आ गए माधवराव ‘सीढ़ी’ पर। उन्हें बता दिया मन का भाव॥

यहाँ पर हेमाडपंत बड़े ही सुंदर तरीके से ‘माधवराव आ पहुँचे सीढ़ी पर’ यह पंक्ति लिखते हैं। यहाँ पार स्थूल रूप में वे द्वारकामाई के सीढ़ी तक आ पहुँचे यह तो एक अर्थ है ही, परन्तु इसके साथ ही ‘माध्यम’ बने यह अर्थ भी निकलता है।

भक्त और भगवान के बीच किसी एजंट व्यक्ति की ज़रूरत नहीं होती। यहाँ पर माधवराव यह रूपक है भक्त के मन में रहने वाले भोले भाव का।

सीढ़ी जिस तरह से दो मंजिलों को जोड़ने का माध्यम होती है, उसी तरह भक्त एवं भगवान को जोड़ने का काम करने वाला ‘भोला-भाव’ यही द्वारकामाई की सीढ़ी है। हम सभी को द्वारकामाई में जाकर दर्शन लेने की, बाबा के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद करने की बहुत इच्छा होती है। यह सब हो यही तो साईनाथ की भी इच्छा होती है, पर द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ने के लिए हमारे अन्त:करण में भोले भाव का होना अत्यन्त महत्त्चपूर्ण है। साईनाथ का भोला-भाविक ही द्वारकामाई की सीढ़ी चढ़ सकता है और साईनाथ के साथ प्रत्यक्ष रूप में संवाद कर सकता है। यही तत्त्व हेमाडपंत यहाँ पर हमें दिखला देतें हैं ।

श्रीसाईसच्चरित यह हेमाडपंतजी ने साईनाथ के साथ किया हुआ एक संवाद ही है , है ना ? 

Sunday, 20 August 2017

संत कान्होपात्रा

हरि ॐ
आज दैनिक प्रत्यक्ष में अग्रलेख पढतें हुए भक्तमाता पार्वती ॠषिकुमारों एवं शिवगणों को समझाते हुए जो बातें कही थी , उस में का एक वाक्य ने मन को छू लिया ।  भक्त माता पार्वती ने कहा था  कि मानव के मन में चण्डिकाकुल ( आदिमाता दुर्गा, दतात्रेयजी, हनुमानजी, किरातरूद्रजी, माता शिवगंगागौरी , आदिमाता का वाहन बना देवीसिंह, आदिमाता के चरणों में बालभाव में बैठा उनका पुत्र त्रिविक्रम ) पर श्रध्दा और विश्वास होता है । किंतु ’मेरा तुम पर विश्वास है’ यह केवल मुंह से बोलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह तुम्हारी कृति से भी प्रगट होना चाहिए ।  यह पढकर मन गहरी सोच में डूब गया कि अगर यह बात माता पार्वती बता रही है  और वो भी ऋउषिकुमारों और शिवगणों को , तो अवश्य ही यह बात हम आम आदमियों के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण ही है ।  फिर खयाल आया कि हम भगवान पर हमारा विश्वास है , हमारी श्रध्दा है ऐसे कितने जोर शोर से अपने मुंह से बोलतें हैं , किंतु क्या सचमुच में हमारा भगवान/ भगवति के चरणों पर इतना अटल विश्वास रहता है क्या? इस के बारे में हमें सोअचना आवश्यक हो जाता है ।  हम हमेशा भगवान को अपना माता -पिता, भाए-बहन , सखा कहतें हैं , वो ही एक कर्ता - धर्ता- संहर्ता है , इस बात को भी स्विकार करतें हैं ।  फिर भी छोटी-मोटी मुसिबतों से हम घिर जातें हैं , तब हमारे कदम लडखडाने लगतें हैं , भगवान के चरणॊं पर होनेवाला हमारा विश्वास कम पडने लगता है ।  हमारा मन नाना तरह की भली-बुरी आशंकाओं से दोलने लगता हैं , हमारी रूह  भय से कंपित हो उठती हैं,  हमारे मन की शांति , तृप्ति  , समाधान खो जाता है ।  यह इसिलिए घटित होता हैं क्यों कि हमारा विश्वास चट्टानों की तरह खंबीर , अडिग नहीं होता है ।  मेरा भगवान या मेरी भगवति कोई भी संकट से महान है और वह उसके बच्चे को यानि  मुझे बचाने केलिए कुछ भी कर सकतें हैं , यह विश्वास दृढ नहीं होता हैं ।  यह सोचतें हुए मन में संत कान्होपात्रा की यकायक याद आने लगी और याद आया कि यह एक ऐसी संत थी, जिनका अपने विठ्ठल भगवान पर पूरा विश्वास था और वो कितनी भी बडी मुसिबत में कभी  भी टूटा नही था । 

कौन थी यह कान्होपात्रा ? चलिए उनकी कहानी जानने की कोशिश करतें हैं -
संत कान्होपात्रा
नको देवराया अंत आता पाहू । प्राण हा सर्वथा जाऊ  पाहे ।।
हरिणीचे पाड व्याघ्रे धरियले। मजलागी जाहले तैसे देवा ।।
तुजविण ठाव न दिसे त्रिभुवनी। धावे वो जननी विठाबाई ।।
मोकलूनी आस, जाहले  उदास ।घेई कान्होपात्रेस हृदयास ।।
 

(कान्होपात्रा यह एक मराठी भाषिक संत  थी , इसिलिए उनकी अभंग रचना मराठी में पाई जाती है । ) 
     
यह संत कान्होपात्रा का अभंग बताता है कि उनका उनके भगवान पर कितना अटूट विश्वास था, कितना भरोसा था उअनका पने भगवान विठ्ठल के चरणों पर ।

संत कान्होपात्रा यह १५ वी सदीं के जमाने में  मंगलवेढा गांव में, शामा नामक गणिका (नायकीण/ वेश्या ) के घर में पैदा हुई थी । शामा यह उस वक्त की सबसे रईस गणिका (वेश्या ) थी और उनके कोख से पैदा हुई यह कान्होपात्रा इतनी अधिक सुंदर, रूपमति थी कि उसकी मां ने उसे १६ सालह की उम्र होने तक अपने घर के बाहर कदम भी रखने नहीं दिया था । शामा को यह डर था कि उसकी  इतनी सुंदर बेटी -कान्होपात्रा कहीं दूसरी जगह भाग ना जाए या फिर कोई भी उसे भगाकर ना ले जाएं । यह अपनी आयु के सोलह साल तक अपनी तीन मंझिलों वाले प्रासाद (राजमहल जैसी उंची मकान ) के बाहर कदम भी न रखी हुई  यह कान्होपात्रा , बाहर के पूरे जमाने से अनजान थी । ना तो उसने कभी विठ्ठल भगवान का नाम सुना था , ना वो जानती थी कि विठ्ठल कौन है? पर यही कान्होपात्रा जिसने एक बार भी भगवान विठ्ठल का नाम सुना नहीं था , वही कान्होपात्रा फिर भगवान विठ्ठल की श्रेष्ठ भक्त , संत कैसे बन गयी , यह बहुत ही अचरज में डालनेवाली बात हैं , ना? मानों किचड से कमल का फूल खिल गया था जैसे ! 

एक दिन कान्होपात्रा अपनी मकान के सज्जे में बैठी थी तब उसने संत नामदेवजी के अभंग सुने और उस अभंग में बताये गये विठ्ठल नाम के प्यार का बखान सुनकर , उसके मन में विठ्ठल को मिलने की आंस जाग उठी । वो अपनी दासी से विठ्ठल के बारे में पूछ्ताछ करती है ।  उसकी दासी ने बतायी हुई विठ्ठल नाम की महता सुनकर कान्होपात्रा का मन और भी तेजी से उसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठा था और तेजी से दौडकर भगवान के चरणों में पनाह (शरण )लेना चाहता था । उसे भगवान विठ्ठल से मिलने की, उस पांडुरंग को अपनी आंखो से देखने की, उससे प्यार करनेवालों से मिलने की इच्छा पैदा हुई । यही उद्विग्न अवस्था में अपना सारा ऐश्वर्य, वैभव पिछे छोडकर कान्होपात्रा मंगलवेढा छोडकर सात कोस दूरी पर होनेवाले पंढरपूर पहुंच जाती है।  पंढरपूर इस वैकुंठ नगरी में वह भिक्षा मांगकर और पूरी पवित्रता से अपना पेट पालकर गुजारा करने लगती है ।  

पर एक दिन बिदर के बादशाह (महाराजा) कान्होपात्रा की सुंदरता के बारे में  सुनकर उसे पकडकर ले जाने के लिए अपने सैन्य को भेज देतें हैं ।  उस वक्त कान्होपात्रा दौडते हुए अपने भगवान विठ्ठल के चरणों में शरण लेने पहुंच जाती है । भगवान विठ्ठल के द्वार पर खडे रहकर वह बडी आर्त भाव से बुहार लगाती है अपने भगवान विठ्ठल की  और कहती है हे मेरे भगवन ! मेरी पुकार सुनकर आप जल्दी चलें आईये, आप मेरा अंत ना देखिए , मेरा आप के सिवा इस दुनिया में और दूसरा कोई भी नही है, आप मुझे अपने ह्रुदय से लगा लिजिए ।  उसकी वह पूर्ण  विश्वास से भरी , अंतर से भरी पुकार सुनकर उसके भगवान कैसे चुप बैठतें ? उसी वक्त कान्होपात्रा एक बिजली में रुपांतरित हो गई और उसी जगह पर तरटी नामक एक वृक्ष ( पेड) पनप उठा ।  इसिलिए उसी वृक्ष को कान्होपात्रा माना जाता है  और भगवान विठ्ठल के दर्शन करने से पहए उनके इस श्रेष्ठ भक्त कान्होपात्रा का दर्शन लेना आवश्यक माना जाता है । आज भी वही तरटी का वृक्ष  पंढरपूर में खडा है जो संत कान्होपात्रा की कहानी याद दिलाता है और आनेवाले काल में भी याद दिलाता रहेगा ।                 

हमें हमारी जीवन में अपने भगवान पर ऐसा ही अटूट विश्वास होना चाहिए इस बात का स्बक संत कान्होपात्रा हमें सिखलातीं है ।  इस पूरी दूनिया में मेरा संकट कितना भी गहरा हो, मेरी मुश्किल कितनी भी कठिन हो, मेरे जान पे बन आयी हो तभी मुझे मेरे  भगवान पर विश्वास रखना ही चाहिए , और उसके सिवा कोई दूसरा मुझे मदद कर नहीं सकता , इसीलिए सिर्फ और सिर्फ भगवान को ही मदद के लिए पुकारना चाहिए । 

भक्तमाता पार्वती ने जो बात कही कि सिर्फ अपने मुंह से भगवान पर मेरा विश्वास है यह बोलना पर्याप्त नही है तो मेरी कृति से भी वोही विश्वास प्रगट होना चाहिए ।  यह बात अपनी जिंदगी में वास्तव में जी कर कान्होपात्रा ने हमें बताया है ।  ऐसी महान संत कान्होपात्रा को मेरा शत शत नमन और ऐसा ही अटूट विश्वास भगवान के चरणों पर मैं कर सकूं इसिलिए उस भगवान को भी कोटी कोटी प्रणाम !  

 


Sunday, 6 August 2017

चीनचे मानसिक दबावतंत्र आणि ...

दैनिक प्रत्यक्षच्या ३१ जुलैच्या अंकातील "चिनी लष्करांना आक्रमकांना  पराभूत करण्याची क्षमता" ह्या शीर्षकाखालील राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग यांचा दावा आणि १ऑगस्टच्या अंकातील ’डोकलाम’ नंतर चीनची भारताच्या हद्दीत नवी घुसखोरी हे लेख वाचून पूर्वापार चालत आलेल्या "मानसिक दबाव तंत्र "युध्दाचा चीन अवलंब करून भारतावर अरेरावी करीत आहे असेच वाटते.

दैनिक प्रत्यक्षचे कार्यकारी संपादक डॉ अनिरूध्द जोशी ह्यांनी दिनांक १०-०८-२००६ रोजी दैनिक प्रत्यक्ष मध्ये लिहिलेल्या व नंतर "तिसरे महायुध्द" ह्या पुस्तक स्वरूपात प्रकाशित झालेल्या "आधुनिक शस्त्रास्त्रे आणि प्रभाव -१० मानसिक दबाव युध्दतंत्र " ह्या अग्रलेखाची आठवण झाली. त्यात डॉ अनिरूध्द जोशी ह्यांनी नमूद केल्या प्रमाणे मानसिक दबाव युध्दतंत्र ह्या अत्यंत प्रगल्भ झालेल्या युध्दशास्त्राच्या अंगाचा चीन पुरेपूर वापर करीत असलेला स्पष्टपणे आढळत आहे.

मानसिक दबाव युध्दतंत्राचा प्रभावी वापर तेराव्या शतकात क्रूर , आक्रमक चंगीजखानने जगाचा खूप मोठा भूभाग जिंकताना केला होता. ज्या प्रदेशावर हल्ला करावयाचा त्या प्रदेशातील लोकांचे मानसिक धैर्य खच्ची करून मगच आक्रमण करायचेह हा मार्ग त्याने अवलंबिला होता. चंगीजखानचा आपल्या प्रचंड सैन्यताकदीच्या व क्रौर्याच्या कथा प्रत्यक्ष युध्द पीडितांच्या तोंडातून ऐकून हल्ला करावयाच्या राज्यातील नागरिकांचे व शासकांचे मनोधैर्य ढासळून टाकावयाचे असा त्यामागील मूळ हेतु असायचा. 
                                                                 


अशाच रणकुशलयुध्दनीतिचा वापर करून चर्चिलने जग जिंकण्याची महत्त्वाकांक्षा असलेल्या हिटलरच्या मनात सदैव अमेरिका व रशियाच्या प्रभावाविषयी व सहभागाविषयी भयगंड निर्माण केला होता आणि रशियावरील आक्रमणात हिटलरला चूक करण्यास भाग पाडून सैबेरिया प्रांतात मनुषयबळा ऐवजी नैसर्गिक बळाच्या आधाराने ६ लाख जर्मन सैनिकांचा पराभव करून बळी घेतला होता. अमेरिकेने ह्याच तंत्राने इराकवर आक्रमण करण्याआधी इराकला एकटे पाडले होते. आता सध्याच्या परिस्थितीत चीन भारतावर ह्याच मानसिक दबाव तंत्राचा प्रयोग करताना जराही कसूर सोडीत नाही आणि आपल्या कणखोर भूमिकेने भारतही चीनला पुरेपूर पुरुन उरला तर आहेच.

                                                                   


सिक्कीमच्या सीमेवरील ’डोकलाम’ येथे भारत व चीनचे जवान एकमेकांसमोर उभे ठाकले आहेत आणि तडजोडीची भाषा करायला चीन मुळीच तयार नसल्याचे दिसत असतानाच चीनची वर्तमानपत्रे , त्यांचे संबंधित अधिकारी  सतत भारताला वेगवेगळ्या प्रकारच्या धमक्या देऊन भारतीय नागरिकांचे  व शासनकर्त्यांचे मनोधैर्य खच्ची करण्याचे जबरदस्त प्रयत्न करीत आहे. जरी प्रत्यक्षात भारताविरूध्द चीनला युध्द पुकारणे ही दिसते तितकी सहज , सोपी बाब नाही हे चीनला पुरते ठाऊक असले तरी  चीन ह्या प्रकरणी भारतावर दडपण टाकण्याची एकही संधी न सोडता मानसिक दबावतंत्राचा वापर अधिकाधिक करीत असल्याचेच उघडकीस येत आहे असे म्हणणे चुकीचे ठरणार नाही. चीनच्या नेत्यांच्या मनातील जगातील सर्वात मोठी महासत्ता बनण्याचे मनसुबे तर उघडच आहेत सर्व जगासमोर. ह्या त्याच्या ध्येयाच्या पूर्तीसाठी चीनला आधी आशिया खंडात पूर्ण वर्चस्व स्थापन करणे अत्यावश्यक आहे व ह्याही उद्दिष्टाच्या आड जर कॊण येत असेल तर फक्त ’भारत’ . 

त्यामुळे भारताची चोहो बाजूंनी कोंडी करून भारताच्या नाकीनऊ आणण्याचे चीन पराकोटीचे प्रयत्न करीत आहे. भारताचा शत्रू तो चीनचा मित्र हे जणू चीनचे सहज सोपे समीकरण आहे. भारतची कट्टर शत्रूता निभावणारा पाकिस्तान हा तर चीनच्या गळ्यातील ताईतच आहे जणू आणि भारताच्या जवळच्या सर्वच राष्ट्रांशी चीनचे प्रेम अगदी भरभरून वाहात असते ते ह्याच करिता मग तो श्रीलंकेच्या हंबंटोटो बंदराचा विकास असो की पाकिस्तानचा सीपीईसी प्रकल्प . 

चीन हा देश स्वत:चा नकाशा कमीत कमी चार पट करण्याच्या विचारात आहे हे डॉ अनिरूध्द जोशींचे वक्तव्य ह्याची प्रचिती देते       
आग्नेय आशियातील छोट्या देशांसह आशिया प्रशांत क्षेत्रातील ऑस्ट्रेलियासारख्या देशांनाही चीन सातत्याने इशारे व धमक्या देत आहे. "ईस्ट चायना सी " क्षेत्रावरून जपान्शी सुरु असलेल्या वादात चीन जपानलाही अद्द्ल घडविण्याची भाषा बोलत आहे. ’साऊथ चायना सी’ क्षेत्रावरून चीन अमेरिकेलाही धमक्या देत आहेच. चीन हा देश स्वत:चा नकाशा कमीत कमी चार पट करण्याच्या विचारात आहे हे डॉ अनिरूध्द जोशींचे वक्तव्य ह्याचीच खूण पटविते. यावरून आणि पूर्वीच्या अनेक घटनांवरून चीन आपल्या साम्राज्यवादाच्या महत्वाकांक्षेचा झटका सर्व देशांना दाखवून देत आहे हे जाणवते.

चीनने अरूणाचल प्रदेशाच्या ६ जागांची बदलेली नावे , ’डोकलाम’ नंतर भारतच्या हद्दीत उत्तराखंड येथेल चमोलीच्या ’बाराहोटी’ येथील घुसखोरी ही सारी मानसिक दबाव टाकून थिथावण्याची युध्दतंत्रेच नाहीत का? 

अशा परिस्थितीत भारतीयांनी आपल्या सैन्यावर, जवानांच्या सामर्थ्यावर पूर्ण विश्वास ठेवणे अत्यंत आवश्यक आहे. दिवसागणिक अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितींशी सामना करून आपले भारतीय जवान दहशतवाद्यांशीही कडवी झुंज देत आहेत , प्राणपणाने निकराने लढत आहेत. त्याच वेळी चीनचे नेते, वर्तमानपत्रे सतत युध्दाच्या धमक्या देत असूनही भारतीय लष्कर डोकलाम येथून तसूभरही मागे हटले नाही किंवा आपण माघार घेऊ असे चिन्ह ही दिसत नाही.त्यामुळेच चीनच्या ह्या मानसिक दबावतंत्र युध्दाला आम्ही भारतीय भीक घालीत नाही हेच चीनला सप्रमाण दाखविणे हे आम्हां नागरिकांच्याच हातात आहे.

१९६२ सालच्या युध्दाच्या पराभवाची चीन भारताला आठवण करून देतो. आम्ही भारतीय "हिंदी -चीनी भाई भाई " असे जरी गात असलो तरी आमच्या पाठीत सुरा भोसकणार्‍याचे हात देखिल वेळप्रसंगी उखडून टाकतो ह्याचे चीनने स्मरण ठेवणे तेवढेच आवश्यक आहे  मानसिक दबाव तंत्र ह्या युध्दतंत्राला आम्ही भारतीय मुळीच घाबरणार नाहीत , तुझ्यासारख्या नाठाळाच्या माथी सोटा हाणायला शिकविणारी रणनीतिचे धडे आम्हां  भारतीयांकडून आमच्या आर्य चाणक्यांनी आपल्या राज्यअर्थव्यवस्थेवरील ग्रंथातून कधीच गिरवून घेतले आहेत आणि ह्याच रणनीतिच्या आधारे संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परीषदेतही भारत चीनच्या डावपेचांना उलथवून आपले स्थायी सदस्यत्व १०८ % मिळविणारच आहे आणि त्याच बरोबरीने चमोलीतून जशी माघार चिनी सैन्याला घ्यावी लागली तशीच माघार डोकलाममधून घ्यावीच लागेल भारताच्या कणखर भूमिकेपुढे हाच विश्वास प्रत्येक भारतीयाच्या मनात आहे आणि असाच वाढत राहील ! 

संदर्भ : 
१. दैनिक प्रत्यक्ष 
२. तिसरे महायुद्ध पुस्तक - लेखक डॉ अनिरूध्द जोशी 
३.http://www.defencenews.in/article/China-claims-Doklam-Plateau-in-Bhutan-to-gain-strategic-edge-over-India-262876

सूचना : "चीनचे मानसिक दबावतंत्र आणि ...  " हा लेख प्रथम दैनिक प्रत्यक्षच्या दि, ०६ ऑगस्टच्या अंकातील "व्यासपीठ" सदरात प्रसिध्द  झाला आहे.  
 

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