Monday, 27 November 2017

मेरे साईनाथ का दर्शन ......





हेमाडपंत की शिरडी में श्री साईनाथ से हुई पहली मुलाकात यह उनके जीवन को पूरी तरह से बदल देनेवाली एक महत्त्वपूर्ण घटना थी ।  उन्होंने यह महसूस किया था कि मेरे साईनाथ का , मेरे सदगुरु का प्रेम कितना अकारण (बिना वजह ) होता है,  बिना किसी लाभ से किए हुए प्यार की  एक अत्यंत सुंदर अनुभूती के वे साक्षी बने थे । हेमाडपंत ही हमें उस अद्भुत तत्त्व को विशद करतें है कि भक्तिमार्ग में भक्त यह भगवान के पास नहीं जाता बल्कि भगवान ही भक्त के पास आते हैं। भगवान जब मेरे पास आते हैं, उस समय ‘उठकर बैठने में’ देर नहीं करनी चाहिए। जो भगवान की दिशा में प्रथम कदम उठाता है, उसके कदम उठते ही भगवान सौ कदम चलकर उसके पास आ पहुँचते हैं। बाबा स्वयं वाडे के कोने तक हेमाडपंत के प्रेम से खींचे चले आये, यही साईनाथ की भक्तवात्सल्य हेतु घटित होनेवाली लीला है।

यही बात हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि मेरे भगवान मेरे लिए स्वयं तकलीफ़ उठाकर मुझसे मिलने के लिए आ पहुँचते हैं।
  
अध्याय ५१ में हम काका दीक्षितजी की कथा  पढतें हैं कि उनकी साईनाथ जी से पहली भेंट , पहली मुलाकात कैसी हुई थी ? काकासाब दीक्षित को १९०९ साल तक ’साई’ नाम भी मालूम नहीं था , पर बाद में जब साईनाथ जी का दर्शन हुआ तो दीक्षित ने इस तरह साईनाथ को अपने मन में बसा लिया कि वे साईबाबा के परम भक्त बनकर सारे लोगों में मशहूर हो गए । काका  दीक्षित को उनके मित्र नाना चांदोरकर ने साईबाबा के बारे में बताया था और तभी से काका दीक्षितजी के मन में साईनाथ का दर्शन करने की प्यास जगी थी ।धारा सभा की चुनाव के वक्त वह लोगों से मत मांगने हेतू अहमदनगर में काका मिरीकर के पास जा पहुंचें थे । तब वहां पर माधवराव देशपांडे शिरडी से आ पहुंचे थे , मानो साईनाथ ने खुदही उन्हें वहां भेजा था जैसे नाना चांदोरकर की बेटी की प्रसूती के समय उदी और आरती लेकर रामगीर बुवा को स्टेशन से नाना के घर पहुंचाने तांगेवाला राजपूत बनकर खुद साई ही दौडे थे , ना? वैसे ही दीक्षित काका मिरीकरजी के घर पहुंचने से पहले ही साईनाथ खुद तसबीर रूप से वहां जा पहुंचे थे , उस की तसबीर याने वो खुद होते ही है - यही भाव खुद साई ने बालाबुवा सुतार को समझाया था - बालाबुवा सुतार ने साईनाथ की तसबीर को प्रणाम किया था चार साल पहले और जो बात वह खुद भूल ही चुकें थे , पर साईबाबा ने बताया था इसकी और मेरी चार साल पुरानी इसके साथ पहचान है ।
उसी स्वरूप से काका दीक्षित ने जब साईनाथ की तरफ जाने का पहला कदम उठाया , तब भगवान साईनाथ खुद सौ कदम आहे चलकर उन्हें मिलने अहमदनगर पहुंचे थे , और वो भी एक तसबीर रूप से । बाबा का भक्त मेघा बाबा की जो तसबीर की पूजा घर में करता था , उसकी कांच टूट गई थी और उसे दुरुस्त करवाने शिरडी से वो तसबीर अहमदनगर लाई गई थी - याने खुद मेरे साईं काका को मिलने हेतू सौ कदम चलकर खुद अहमदनगर आ पहुँचे थे ।

इस परमात्मा के , भगवान के मिलन में ब्याकुल हुए भक्त की उसके भगवान के साथ , सदगुरु के साथ पहली मुलाकात का महत्त्व , उस पहले दर्शन में ही खुद को उसके हाथ कैसे सौंप देना हैं , कैसे समर्पित करना है इस के बारे में एक बहुत ही सुंदर लेख पढने में आया ,
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part49/

यह लेख में लेखक महोदय ने हेमाडपंत की साईनाथ से पहली मुलाकात का वर्णन किया है और बताया है कि हेमाडपंत की शिरडी में श्री साईनाथ से हुई पहली मुलाकात यह उनके जीवन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। इस पहली मुलाकात में ही उन्होंने भक्तिमार्ग का बहुत महत्त्वपूर्ण मकाम प्राप्त कर लिया।
जो पढकर लगा हमें किस तरह से मेरे भगवान से, मेरे सदगुरु से मिलना चाहिए ? मेरा भाव कैसे होना चाहिए ,मेरे मन में कितनी प्यास, कितनी लगन, कितनी तडप होनी चाहिए उसे मिलने की ....
यहां संत मीराबाई का एक पद याद आ गया -

ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन । 
वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी ॥

महलों में पली, बन के जोगन चली ।
मीरा रानी दीवानी कहाने लगी ॥

कोई रोके नहीं, कोई टोके नहीं,
मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी ।

हेमाडपंत इसी भावोत्कटता से साईनाथ को मिले थे , बस! अब तो बस यही एक! मेरे भगवान! मेरे सखा! यही मेरे सर्वस्व!’ इसी दृढ़भाव के साथ हेमाडपंत बाबा के प्रति अनन्य-शरण हो जाते हैं। इस भगवान के दर्शन कैसे करने चाहिए, यही हमें हेमाडपंत के आचरण से पता चलता है। हेमाडपंत अपनी उस प्रथम मुलाकात में ही साई का दर्शन लेते समय अपनी आँखों के रास्ते भगवान के इस सगुण साकार रूप को अपने दिल में उतार लेते हैं, दृढ़ कर लेते हैं, वह भी हमेशा के लिए!

सचमुच साई के इस दर्शन से हेमाडपंत की स्थिति उन्मनी हो चुकी है। अब बाबा सामने हों या ना हों परन्तु हेमाडपंत को अब अपनी आँखों के सामने सदैव ये साई ही नज़र आने लगते हैं। ‘जहाँ देखे वहाँ पूरणकाम।’ संत एकनाथजी के अभंग की इस पंक्ति के अनुसार अब हेमाडपंत के लिए संपूर्ण सृष्टि ही साईमय हो चुकी है। सभी रूपों में ये साईनाथ ही विराजमान है। यही अभंग दोहे के रूप में औरंगाबादकर के मुंह से साईनाथ ने सुनाया था हेमाडपंतजी को -
गुरुकृपांजन पायो मेरे भाई । रामबिना कछु मानत नहीं ।।
अंदर रामा बाहर रामा । जहां देखे वहां पूरनकामा ।।
जागत रामा सोवत रामा । सपने में देखत सीताराम ।।
एका जनार्दनी अनुभव नीका । जहां देखे वहां राम सरीखा ।।

मन में खयाल आया कि क्या मैंने कभी मेरे साई का ऐसा दर्शन किया है ? अगर नहीं, तो कम से कम अभी यह लेख पढने के बाद तो  मुझे हेमाडपंतजी से यह बात जरूर सिखनी चाहिए कि मुझे मेरे साईबाबा से , मेरे सईनाथ का दर्शन कैसे लेना चाहिए ? एक पल के लिए भी जिनकी झलक पा लेने के लिए योगीजन, ऋषिगण हजारों वर्ष, जन्म-जन्मातरों तक तपश्‍चर्या करते रहते हैं, ज्ञानी ज्ञानमार्ग का मुश्किल प्रवास करते हैं, वे भगवान स्वयं अपने ही अकारण कारुण्य के कारण मुझे दर्शन दे रहे हैं, यह जानकर हेमाडपंत के मन में बाबा के इस प्रेम के प्रति, परिश्रम के प्रति कृतज्ञता का भाव उमड़ पड़ता है।

मेरे साई की तो अनिरूध्द गती है , इसिलिए उसे पकड पाना बहुत कठिन है, यही बात स्वंय साईनाथ ने काका दीक्षित से भी कही थी - कि पंढरी का विठ्ठल पाटील बहुत भगोडा है उसे मेख मार के (अपने मन में, अपने दिल में ) अढल करना चाहिए ।
लेखक महाशय हमें हेमाडपंत जी का भाव आसान तरीके से समझातें हैं कि हेमाडपंत उअनके साईनाथ से हुई उअनकी पहली मुलाकात से हमें यही बताना चाहते हैं कि साईनाथ का दर्शन करते समय हम जितना भी बाबा का रूप को अपने मन में , दिल में उतार सकते हैं, उसे दृढ़ कर सकते हैं, उतना ही उसे दृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए। साई का दर्शन करते समय कम से कम उतने समय तक के लिए तो सब कुछ भूल जाना चाहिए, यहाँ तक कि स्वयं को भी भूल जाना चाहिए, केवल सामने इस साईनाथ को ही जी भरकर निहारते रहना चाहिए। नज़र से मन में उतारने की अधिक से अधिक कोशिश करनी चाहिए। आखिरकार यही तो ध्यान का पहला चरण होता है ।

हेमाडपंत भी यही बात अपने दिल में उतारने को कह रहें हैं कि साई के पास जब तुम आते हो, तब तुम्हारे जीवन में उस व़क्त चाहे अनेक प्रॉब्लेम्स् क्यों न हों, तुम यदि कुछ माँगना भी चाहते हो, तुम्हें कुछ मन्नत माँगनी हो; जो कुछ भी है, वह सब कुछ बाद में, सबसे पहले कहना चाहिए- हे साईनाथ! मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है। हमें कुछ न कुछ माँगना तो अवश्य पड़ता है, लेकिन बाबा के समक्ष खड़े रहने पर, उनका दर्शन करते समय पहले जी भर कर उन्हें निहारना है, उन्हें अपनी आँखों में उतारना है और कम से कम उतनी देर के लिए सब कुछ भूलकर हमें बाबा को ही बाबा से माँगने आना चाहिए। हे साईनाथ, मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है!

बाबा से बाबा को ही माँगना चाहिए। किसी और से नहीं माँगना है, क्योंकि बाबा के पास कोई भी दलाल नहीं हैं, एजंट नहीं हैं। साथ ही केवल बाबा ही स्वयं ही स्वयं को पूर्णत: भक्त को दे देनेवाले हैं, अन्य कोई भी मुझे साई नहीं दे सकता। इसीलिए अन्य किसी से कहकर, अन्य कोई एजंट ढूँढ़कर भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

हे साईनाथ , तेरी अगाध अनिरूद्ध गति की थाह पाना तो नामुमकीन है किंतु तेरी कृपा से तेरा रूप ही हमारे दिलों में उतार दें और तेरे ही चरणों में  हमें  पनाह दे दे -

                                                                                   


                                       सब सौंप दिया है जीवन का भार तुम्हारे  हाथों में ....

Thursday, 12 October 2017

एलफिन्स्टन येथील चेंगराचेंगरीनंतरचा स्वंयशिस्तीचा धडा !

पश्चिम रेल्वेच्या एलफिन्स्टन रोड स्टेशन आणि परळ स्टेशनला जोडणार्‍या फुटओव्हर ब्रिज म्हणजेच पुलावर गर्दीमुळे झालेल्या चेंगराचेंगरीत दुर्दैवाने २३ रेल्वे प्रवाशांना आपला जीव गमवावा लागला. त्यानंतर दुर्घटना घडल्याबद्दल कुणी रेल्वे प्रशासनाला जबाबदार धरले तर कुणी अपुरी यंत्रणा कारणीभूत आहे तर कुणी ढिसाळ नियोजन जबाबदार आहे तर कुणी पायाभूत सुविधा न देणार्‍या सरकारला दोष दिला. दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक ५ ऑक्टोबर २०१७ च्या अंकात तर ’फूल गिर गया ’ च्या ऐवजी ’पूल ’ ऐकल्याने गोंधळ उडाल्याने ही दुर्घटना घडली असण्याची शक्यता वर्तविण्यात आली आहे. सध्या तरी दुर्घटना नेमक्या कोणत्या कारणामुळे घडलीहे निश्चित करणे तूर्तास तरी कठीण असल्याचे आढळत आहे.

ह्या दोषारोपांच्या ,प्रत्यारोपांच्या फैरी झडत असतानाच एक आश्चर्याची बाब सामोरी आली ज्यातून मुंबईच्या सुजाण नागरिकांनी आपला रेल्वे प्रवास सुरक्षित होण्याकरिता उचलेल्या एका अत्यंत सुंदर, स्तुत्य अशा पावलाची सुरुवात केली आहे आणि ते पाऊल म्हणजे स्वंयशिस्तीचे पालन , आचरण! परळ रेल्वे स्टेशनवर रविवारी सकाळी नऊ वाजता प्रवासी रांगेत उभे राहून शिस्तीने पुलावर चढताना काही कॅमेर्‍यांनी टिपले होते.



कोणत्याही समस्येला उत्तर शोधताना , ती समस्या उद्भवली का , कोणामुळे ह्या सारख्या प्रश्नांचा सारासार विचार करणे हे जेवढे गरजेचे असते त्याही पेक्षा भविष्यात पुन्हा नव्याने अशा समस्या येऊच नये म्हनून खबरदारी घेणे , त्यानुसार उपाय योजना आखणे व त्यांचा प्रत्यक्षात अवलंब करणे हे ही तितकेच किंवा त्याहून कैक पटीने अधिक महत्त्वाचे असते. आपण मराठीत एक म्हण म्हणतो की "पुढच्यास ठेच मागचा शहाणा ’ पण व्यवहारात बहुधा आपल्याला स्वत:ला ठेच लगल्याशिवाय आपण शहाणपणा शिकत नाही वा दुसर्‍याच्या अनुभवावरून सहजगत्या खबरदारी घेण्याची , काळजी घेण्याची जागरूकता सहजासहजी बाळगत नाही.

पण ह्या चेंगराचेंगरीच्या दुर्घटनेनंतर नागरिकांनी रांगेतून शिस्तीने पुलावर चढण्याची जी स्वंय शिस्त अंगी बाणविण्याचे पहिले पाऊल उचलले हे खरोखरीच कौतुकास्पद आहेच आणि अत्यंत आवश्यकही आहे. आपली सुरक्षा आपणच घेण्याचा हा छोटासाही प्रयत्न गर्दीच्या नियंत्रणासाठी अत्यंत महत्त्वाची भूमिका नक्कीच बजावेल.     

गर्दीचे व्यवस्थापन व नियंत्रण हा एक खूप सखोल अभ्यासाचा विषय आहे. क्राऊड मॅनेजमेंट म्हणजेच गर्दीचे व्यवथापन ! अनियंत्रित जमावाचे गर्दीत रूपांतरण व्हायला फारसा वेळ लागत नाही अशावेळी कोणत्याही कारणास्तव वाहत्या गर्दीला विरोध करणारा कोणताही अडथळा अचानक पणे समोर आला तर चेंगराचेंगरी सारखी गंभीर, धोकादायक परिस्थिती कधीही उद्भवू शकते.  गर्दी होणार्‍या जागी स्वयंशिस्तीचे पालन करून रांगेचा वापर केल्यास गर्दी होण्याची शक्यता कमी होते.

म्हणूनच आपत्ती व्यवस्थापन करतानाही गर्दीचे व्यवस्थापन हा महत्त्वाचा पैलू ध्यानात ठेवावाच लागतो.  

आपण व्यवहारात अनुभवतो की  " दूधाने जर जीभ पोळली तर माणूस ताक सुध्दा फुंकर मारूनच पितो’ त्याप्रमाणेच नुकत्याच घडलेल्या चेंगराचेंगरीने रोज रेल्वेने प्रवास करणार्‍या मागरिकांची मनात भीतीने धडकी भरली आहे, जीभ पोळली आहेच त्यामुळे पुढची पाऊले उचलताना शक्यतोवर गर्दी होणाची कारणे टाळणे हाच सोपा उपाय आहे.   

गर्दीमध्ये धक्काबुक्की, चेंगराचेंगरी होऊ शकते आणि एलफिस्टन रोड येथील चेंगराचेंगरी अनियंत्रित गर्दीने , धक्काबुक्कीने झाली हे जाणून खबरदारी म्हणून अरूंद जागेत गर्दी करून घुसून , धक्काबुक्की करत राहण्यापेक्षा रांगेचे पालन केल्य्यास, नक्कीच गर्दीच्या नियंत्रणाला मोठा हातभार लागेलच, शेवटी स्वंयशिस्त     हा मर्यादा पालनाचा भाग आहे आणि मर्यादा पाळली की अपघात होतच नाहीत किंवा त्यांची व्याप्ती , प्रभाव कमी होतो. चला तर रांग लावून स्वंयशिस्तीचा कित्ता गिरवू याव गर्दी व्यवस्थापनाला सहकार्य करू या !

सूचना -  हा लेख प्रथम दैनिक प्रत्यक्षच्या दिनांक ९ ऑक्टोबर २०१७ च्या अंकात प्रथम प्रसिध्द्व झाला होता.

Wednesday, 30 August 2017

चीन भारतावर वॉटर वॉर लादू पाहत आहे का?

File image of China's Three Gorges Dam. Reuters


दैनिक प्रत्यक्षच्या २० ऑगस्ट २०१७ च्या अंकातील "भारतातील महापुरामागे चीनचे कटकारस्थान - सामरिक विश्लेषकांचा आरोप " हे पहिल्याच पानावरील वृत्त वाचले आणि बुध्दी चक्रावून गेली. "डोकलाम" प्रश्न सहजासहजी सुटण्याची  दुरान्वये शक्यता दिसत नाही, भारत तर आपले सैन्य तसूभर माघारी घेण्यास तयार नाही, राजनैतिक चर्चेचा भारताने दिलेला प्रस्ताव आपणच धुडकावून लावला आहे त्यामुळे ती संधी आपणच गमावली आहे आणि आता आपल्या साम्राज्य विस्ताराच्या स्वप्नाला सुरूंग लावून भारत चंगलीच खिंडारे पाडीत आहे, आपला शेजारील शत्रू राष्ट्रांना धमकाविण्याचा मनसुबाही त्याने विफल ठरत आहे आणि आपली आंतरराष्ट्रीय पातळीवर चांगलीच नाचक्की होऊ शकते ह्या  न्युनगंडाने ग्रासलेला चीन दिवसेंदिवस नवनवीन क्लुप्त्या लढवून भारताला नामोहरम करण्याची एकही संधी सोडीत नाही असे दिसत आहे. मानसिक दबावतंत्र वापरूनही ना भारत द्बत आहे ना भारताचे नागरिक हे पाहून तर चीन आता इरेलाच पेटला आहे जणू ! त्यातील एक भाग म्हणून १५ ऑगस्ट ह्या भारताच्या स्वातंत्र्य दिवशी भारतीय जनता स्वातंत्र्य्दिन साजरा करीत असताना बेसावध असेल असे समजून चीनच्या सैन्याने लडाखच्या पॅंन्गॉंग सरोवराजवळील भारतीय हद्दीत घुसखोरी केली. पण डोळ्यांत तेल घालून अहोरात्र  जागता पहारा देणार्‍या आमच्या भारतीय जवानांनी चीनच्या घुसखोरीला कडवे प्रत्युत्तर देऊन  तेही मनसुबे हाणून पाडले. चीनच्या अरेरावीला जराही भारत भीक घालीत नाही हे लक्षात घेऊन आता चीन कुटील नीतीचा अवलंब करून भारतात महापूर आणण्याचे सूत्रबध्द कत कारस्थान रचित असल्याचा सामरिक विश्लेषक आरोप करीत आहेत त्यात नक्कीच तथ्य असावे असे दिसत आहे व त्यामागे तसेच सबळ पुरावेही हाती लागत आहेत .           

जपान मध्ये २०११ साली त्सुनामीचे जे अस्मानी संकट ओढावले होते ते सुरुवातीला निसर्गाचा प्रकोप आहे असे आढळले होते आणि नैसर्गिक आपत्ती म्हणून गणलेही गेले होते , परंतु काही काळाने ही त्सुनामी ही मानव-निर्मीत आपत्ती असू शकल्याचे आरोप व त्यावर रंगलेले वाद वाचनात आले होते. तेव्हा बुध्दीला खरेच कोडे पडले होते की मानव हा विज्ञानाचा वापर वरदान म्हणून करत आहे की तो शाप ठरावा इतक्या अधोगतीला जाऊन त्याचा दुरुपयोग करीत आहे. त्यानंतरही बरेच वेळा येणार्‍या काळात तिसरे महायुध्द कधीही भडकू शकते ह्यावर अनेकांनी आपली मते मांडली होती आणि ह्यात पाण्यावरून युध्द पेटण्याचच्या शक्यता असल्याचे मतप्रवाह ही वाचनात आले होते. सध्याची भारतात आसाम, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल ह्या राज्यांमध्ये आलेल्या भयंकर महापुरात होणारी मनुष्यहानी , वित्तहानी पाहता जरी हे निसर्गाचे तांडव आहे असे म्हणावे , तरी त्याच वेळी वास्तव  काही  वेगळ्याच गोष्टींकडे अंगुलीनिर्देश करीत आहे ह्याकडे डोळेखांक करून चालणार नाही.  मानवाचा घात होत असतो अंध;कारातच आणि हा अंध:कार असतो  अज्ञानापोटीच ! तो दूर करण्यासाठीच दैनिक प्रत्यक्ष अविरत परिष्रम घेत आहे. त्यामुळेच  ह्या दुर्लक्षिल्या जाणार्‍या महत्त्वपूर्ण वास्तवाची जाण करून देणार्‍या दैनिक प्रत्यक्ष च्या नागरिकांना सुजाण व  जागरूक बनविण्याच्या कार्याला मनापासून सलाम !

पाणी,अन्न , वस्त्र , निवारा ह्या मानवाच्या अत्यंत मूलभूत गरजा आहेत आणि त्यामुळेच ह्यांचा दुर्भिक्ष्य (अभाव ) म्हणजे जीवन जगण्यावर ओढावलेली आपत्तीच ! सामान्यत: नैसर्गिक आपत्ती (Natural Disasters)  व मानव निर्मित आपत्ती ( Man made disasters) अशा दोन प्रकारांत प्रामुख्याने आपत्तींचे वर्गीकरण होते. वरवर पाहता आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, व बिहार मध्ये उद्भवलेली महापूराची परिस्थिती पाहता हा पूर मुसळधार पावसाने आला असावा असा भारतीयांचा समज झाला होता, पण तो किती फोल आहे हे ह्या बातमीच्या वाचनातून प्रकर्षाने जाणवले. यावर्षी देशातील पावसाचे प्रमाण सरासरीपेक्षा पाच टक्क्यांनी कमी आहे आणि विशेष म्हणजे ईशान्य भारतातही पावसाचे प्रमाण वाढलेले नाही. मग हा महापूर आला कसा ? असा साहजिकच प्रश्न उद्भवू शकतो.

चीनच्या ताब्यात असलेल्या तिबेटमधून उगम पावणार्‍या नद्यांचा प्रवाह भारतातून पुढे जातो. या नद्यांवर चीनने लहान - मोठी धरणे , पाण्याशी निगडीत बांधकामे  ( dams, barrages and other water infrastructure ) उभारली आहेत. जेव्हा काश्मीरमधील दहशतवाद्यांच्या कारवाया पाकिस्तानने वाढविल्यानंतर, भारताने पाकिस्तान सोबतच्या "इंडस वॉटर ट्रिटी " (सिंधु जल वाटप )ह्या कराराचे पुनरावलोकन करण्याची शक्यता दर्शविली तेव्हा चीनच्या गळ्यातील कंठमणी असलेल्या पाकिस्तानला वाचविण्यासाठी चीनने भारताला उलटपक्षी ब्रम्हपुत्रा नदीचे पाणी अडविण्याची धमकीही दिली होती. ब्रम्हपुत्रा ही आसाम आणि ईशान्योत्तर राज्यांची जीवन-संजीवनी आहे हे चीन चांगलेच जाणतो, त्यामुळे भारताची गळचेपी करण्यासाठी ब्रम्हपुत्रेचे पाणी अडविण्याचा आडमुठेपणा तेव्हा चीनने धमकीतून उघड केला होता हे आम्हाला विसरून चालणार नाही. त्याच पाण्याचा वापर विपरीत तर्‍हेने करून आता ही चीन भारताला काटशह देऊ पाहत आहे. दुर्दैवाने ब्रम्हपुतेचा उगम हा चीनमधील Yarlung Tsangpo ह्या नदीपासोन होतो व पुढे ती भारतातून व बांग्ला देशातून वाहत जाते. हे जाणून चीनने अतिशय धूर्तपणाने ब्रम्हपुत्रा व इतर नद्यांवर अवाढव्य धरणे बांधून त्यांचे पाणी अडविले आहे
                                                                    
             

२०१३ व २०१४ मध्ये  भारत व चीन ह्या दोघांमध्ये झालेल्या द्विपक्षीय कराराप्रमाणे (bilateral MOUs) चीनने भारताला १५ मे ते १५ ऑक्टोबर ह्या काळात दर वर्षी तिबेटमधील ब्रम्हपुत्रा आणि इतर नद्यांच्या वरील प्रवाहावरील  ३ महत्त्वाच्या देखरेख करणार्‍या स्टेशन्सकडून हायड्रोलॉजिकल डेटा ( धरणांमधून किती पाणी नद्यांमध्ये सोडले जाते व तत्स्म माहिती ) देणे बंधनकारक आहे. पण ह्या वर्षी१५ मे पासून असा कोणत्याही स्वरूपाची माहिती चीनने भारताला पुअरविली नाही आहे. परंतु करारचे पालन करणार्‍या भारताने मात्र ह्याची रक्कम नियमाप्रमाणे आधीच चीनला दिली आहे असे सूत्रांच्या माहिती नुसार कळते

तसे चीन अनेक वेळा आंतरराष्ट्रीय कायद्यांना आपण मानत नसून, त्याचे पालन करणे चीनला बंधनकारक नाही अशी बेताल वक्तव्ये वारंवार करीत असल्याचेच निदर्शनास येते. त्यामुळे भारत व चीन मधील ह्या द्विपक्षीय करारालाही चीनने झुगारल्याचे नाकारता येत नाही. या उलट भारत मात्र नीती -नियमांचे पालन करून आपल्या शेजारील पाकिस्तान व बांग्लादेश ह्या राष्ट्रांशी झालेल्या पाणी वाटप करारानुसार त्या देशांना आपल्या देशातील नद्यांच्या धरणांवरील हायड्रोलॉगिकल डेटा  पुरविताना कोणतेही मूल्य आकारत नाही अशी माहिती वाचनात आली.
                                                                  
      

दैनिक प्रत्यक्षचे कार्यकारी संपादक डॉ अनिरूध्द जोशी ह्यांनी लिहिलेल्या "तिसरे महायुध्द " ह्या  पुस्तकात त्यांनी महायुध्द म्हणजे काय हे सांगताना असे लिहिले आहे की युध्दाचे उद्दिष्ट शत्रुपक्षाला शरण आणून त्याच्यावर आपली इच्छा लादणे हेच असते. ह्यात त्यांनी ’क्लाओसवेत्ज’ (कार्ल फॉन क्लाओसवेत्ज , १७८० ते १८३१)’ ऑन वॉर ’ ह्या महान ग्रंथाच्या लेखकाचे मत प्रतिपादीत केले आहे -
’ ऑन वॉर ’ च्या सिध्दांतानुसार युध्द म्हणजे आपल्या स्वार्थासाठी शत्रूला आपल्या इच्छेनुसार बलप्रयोगाने वाकविणे, ह्यात दयाळूपणा, सौम्यता, वेळकाढूपणा व नैतिकता ह्यांना जराही स्थान उरत नाही. वाटेल ते करून शत्रुपक्षाचे सामर्थ्य व वैभव पूर्णपणे उध्वस्त करणे, हेच युध्दाचे एकमेव उद्दीष्ट असते.चीनचे सद्य परिस्थितीतील महापुराचे कटकारस्थान हेच दाखवून देत आहे. 

चीनवर भारताने कारवाई केली तर त्यांच्या आर्थिक नाड्या भारतालाही आवळता येतील ह्याचेही भान चीनने अवश्य बाळगावे. तिबेटचा लचका चीनला केवळ भारताच्या मूर्खपणामुळे तोडता आला तेव्हाचा भारत वा १९६२ साली हार मानणारा भारत आणि आताचा भारत व भारताचे बलाढ्य व सामर्थ्यस्थान, जागतिक पातळीवरील भारताचे वाढते वर्चस्व ह्यात जमीन-अस्मानचा फरक आहे हे चीननेही नक्कीच ध्यानात ठेवावे. 

सूचना - 
१.  "तिसरे महायुध्द " हे पुस्तक मराठी , हिंदी व इंग्लिश अशा भाषा मध्यें उपलब्ध आहे -
२. `Third World War eBook by Aniruddha D. Joshi - Amazon Kindle Edition
३. हा लेख प्रथम दैनिक प्रत्यक्षच्या ३० ऑगस्ट २०१७ च्या अंकात प्रथम प्रसिध्द्व झाला होता. 

Thursday, 24 August 2017

सदगुरु साईनाथ के भक्ति का महत्त्व !

श्रीसाईसच्चरित में हेमाडपंत अपने खुद के अनुभव से बताते हैं कि अगर कोई गुरु के रहते हुए  भी कोई सामान्य मानव के जीवन में मुसीबतें आने लगती हैं , तो उस इंसान को गुरु की आवश्यकता समझ में नहीं आती ।  हेमाडपंत बिना कुछ छुपाए, अपने स्वंय के अनुभव से बतातें हैं कि उनके खुद के मन में सदगुरु के भक्ति का महत्त्व समझ में नहीं आया था पहली बार । हेमाडपंतजी बतातें हैं कि उनके एक दोस्त के इकलौते बच्चे की लोनावला जैसे शुध्द हवा के स्थान में बिना किसी लंबी बीमारी के बिना यकायक मौत हो जातीं हैं, जबकि उस वक्त उसके पास उअसके गुरु बैठे हुए थे । तो यह देखकर हेमाडपंत का जी विचलित हो गया कि अगर गुरु के होते हुए भी संकट आ सकतें है, तो गुरू को मानने की क्या आवश्यकता है? अगर अपने नसीब में जो होनी लिखी है , वो होकर ही रहने वाली है और गुरु भी अगर उसे बदल नहीं सकतें हैं तो गुरु के होने न होने से कुछ फरक नहीं पडता ऐसा उन्होंने अपना विचार कर लिया था , जो गलत था , किंतु उन्हें उसका एहसास तब नहीं हुआ था ।
हम भी देखतें हैं कि आम तौर पर हमारे मन में भी गुरु के बारे में बहुत सारी गलतफहमियां होती है , जैसे हेमाडपंतजी के मन में थी  ।  तब मान लो अगर हमें भी साईबाबा की भक्ति के बारे में , साईबाबा के भक्तों पर होनेवाली रहम नजर , उनकी कृपा के बारे में मालूम नहीं होता और कोई साई भक्त हमें बताता है कि मेरे साईबाबा इतने महान है, वो इतने कृपालु है, दयालू है , तो क्या हम आसानी से मान जातें हैं ? बहुत बार हमें यही लगता है कि हम किसी का बौरा नहीं सोचते, बुरा नहीं करतें , हम हमारा काम इमानदारी से, पूरी वफा से करतें हैं फिर हमें सदगुरु की जीवन में क्या आवश्यकता है ?
                                                                           


श्रीसाईसच्चरित में हम शेवडे वकिल की कहानी में पढते है कि सपटणेकर नाम के उनके एक दोस्त थे , उन्हें शेवडे ने वकिली की परीक्षा देते समय अपने विद्यार्थी दशा में साईबाबा की भक्ति के बारे में , साईबाबा की महानता के बारे में बताया था किंतु सपटणेकर ने नहीं माना , बाद में कितने साल गुजर गए, उनकी शादी हो गयी, और फिर इकलौता बेटा कंठरोग से गुजर गया और उनका चित्त अस्थिर हो गया और ऐसी स्थिती में उन्हें अपने दोस्त शेवडे वकिली ने बतायी बात याद आती है और वह शिरडी जाते है।  किम्तु जब तक उनके मन में सदगुरु साईनाथ के प्रति होनेवाला संदेह, झूठी गलतफहमियां दूर नहीं होती, साईनाथ उन्हें अपनी शरण में नहीं लेते ।  वैसे ही गुजरात के खेडा जिले के ब्राम्हण मेघा की कहानी बतलाती है कि अपने गुरु साठे ने बताया इसिलिए मेघा जाने के लिए बहुत मुश्किल से तैय्यार हो जाता है , पर उसके मन में साईबाबा के प्रति होनेवाला संदेह मित नहीं जाता , साईनाथ उसेअपने करीब भी आने नही देते, प्रलय रूद्र के समान  भयावह रूप धारण करतें हैं ।बाद में मेघा जब अपनी  गलती का एहसास होने के बाद वापिस शिरडी जाता है, तब उसे सच के बारे में पता हो जाता   है और वह साईबाबा को अपना गुरु मान लेता है । 

इस के बारे में हाल हि में एक लेख पढा जो सदगुरु के भक्ति का महत्त्व सुंदरता से वर्णन करता है -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part35/

यहां पर लेखक महोदयजी बता रहें है कि कर्म का अटल सिद्धान्त जब चुक नहीं सकता है, तो फिर सद्गुरु की क्या आवश्यकता? इस प्रकार के प्रश्‍न हमारे मन में भी उठते ही हैं। परन्तु यहीं पर हमें ध्यान देना चाहिए कि कर्म के अटल सिद्धान्त के अनुसार जो भोग मेरे हिस्से में आते हैं, उन भोगों की शुरुआत होते ही हमारे सहनशक्ति के अनुसार उचित कर्म करवा कर पुण्य का, भक्ति का संचय बढ़ाना, यह काम केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं। प्रारब्धभोग की तीव्रता को कम करना, उसे सहन करने की शक्ति प्रदान करना और उस भोग से पुन: बुरे प्रारब्ध का जन्म न हो और साथ ही उचित पुरुषार्थ करवाकर भक्ति की जमापूँजी बढ़ाना, यह कार्य केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं।

वैसे ही एक जगह से दूसरी जगह अगर मुझे प्रवास करना है और मै भक्ति मार्ग पर हू, सदगुर साई के चरणों में शरण हूं तब साईनाथ ही मेरे पूरे प्रवास के लिए जिम्मेदारी अपने सर पे उठा लेतें हैं  । ३३वे अध्याय में नाना चांदोरकरजी के घर उनकी बेटी की डिलिव्हरी आसानी से नही होती तब वह साईनाथ को पूरे मन से पुकारने लगतें हैं , तब साई उनके बेटी के लिए उदी और "आरती साईबाबा " यह आरती देकर रामगीर बुवा को भेजतें हैं ।  रामगीर बुवा के प्रवास के लिए पैसे की तजवीज भी साईनाथ ही करतें हैं , रास्तें में देर ना हो इसिलिए खुद तांगेवाला बनकर आतें हैं और गुड और पापडी खाने देकर खाने का भी इंतजाम कर देतें हैं ।
 
दूसरी ओर अमीर शक्कर की कहानी में जब वह साईबाबा की बात न मानके, उनसे  जाने के लिए अनुमति लिए बिना रात में अहमदनगर भाग जाता है और फिर कैसी भयावह परिस्थिती  में फंस जाता हैं ।  पानी पिलाने जैसा पुण्य़ कर्म भी जान लेनेवाला गुनाह बन जाता है । 

सदगुरु हमारी जीवन नौका को बिना पानी में डूबे पैल तीर में पहुंचा देतें हैं , बीच में मंझदार में कभी नही छोडतें , इसिलिए मुझे सदगुरु साईनाथ की भक्ति दिल-दिमाग सेकरनी चाहिए ।    

         

प्रत्यक्ष मित्र - Pratyaksha Mitra

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